भाग 40: धूम्राक्ष, अकंपन और प्रधान सेनापति प्रहस्त का वध

नागपाश से मुक्त होकर जब राम और लक्ष्मण पुनः पूर्ण शक्ति और तेज के साथ युद्ध भूमि में खड़े हुए, तो वानर सेना के गगनभेदी सिंहनाद से लंका की दीवारें कांप उठीं। रावण अपने महल में जीत का जश्न मना रहा था, तभी उसके गुप्तचरों ने कांपते हुए उसे यह समाचार दिया कि दोनों भाई न केवल जीवित हैं, बल्कि पहले से भी अधिक भयानक रूप में युद्ध कर रहे हैं।
रावण के हाथ से मदिरा का प्याला गिर पड़ा। उसे अब पहली बार यह आभास हुआ कि उसका सामना केवल मनुष्यों और वानरों से नहीं, बल्कि किसी दैवीय और अजेय शक्ति से है। क्रोध और बौखलाहट में रावण ने अपने अत्यंत क्रूर और मायावी सेनापति 'धूम्राक्ष' को आदेश दिया कि वह तुरंत जाकर वानरों का संहार करे।
धूम्राक्ष एक भयंकर रथ पर सवार होकर, अपनी विशाल सेना के साथ पश्चिमी द्वार से बाहर निकला। उसे देखते ही वानर सेना उस पर टूट पड़ी। धूम्राक्ष ने अपने तीरों से वानरों को काटना शुरू कर दिया।
वानरों को मरते देख पवनपुत्र हनुमान आगे आए। हनुमान जी ने एक विशाल चट्टान उठाई और धूम्राक्ष के रथ पर दे मारी। रथ चकनाचूर हो गया। धूम्राक्ष अपनी गदा लेकर हनुमान जी की ओर दौड़ा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ, परंतु अंततः हनुमान जी ने एक विशाल पर्वत का शिखर (चोटी) उखाड़ा और उसे धूम्राक्ष के सिर पर इतनी जोर से मारा कि वह वहीं कुचल कर मारा गया।
धूम्राक्ष की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण ने अपने दूसरे महाबली सेनापति 'अकंपन' को भेजा। अकंपन का अर्थ ही था जो युद्ध में कभी कांपता न हो। अकंपन ने युद्ध भूमि में आते ही अपने तीरों की ऐसी भयंकर वर्षा की कि दिन में ही अंधकार छा गया।
हनुमान जी ने जब देखा कि अकंपन वानरों का विनाश कर रहा है, तो वे एक विशाल साल का वृक्ष उखाड़कर उसकी ओर दौड़े। अकंपन ने हनुमान जी पर दर्जनों बाण चलाए, परंतु हनुमान जी ने उन बाणों की परवाह किए बिना वह विशाल वृक्ष अकंपन के सिर पर दे मारा। वृक्ष के प्रहार से अकंपन धरती पर गिर पड़ा।
धूम्राक्ष और अकंपन जैसे अजेय योद्धाओं की मृत्यु से रावण की सभा में सन्नाटा छा गया। अब रावण ने अपने सबसे विश्वस्त, अनुभवी और लंका के प्रधान सेनापति 'प्रहस्त' को युद्ध के लिए बुलाया।
प्रहस्त पूरी लंका की सेना का मुख्य संचालक था। वह एक काले मेघ के समान रथ पर सवार होकर भयंकर अस्त्र-शस्त्रों के साथ युद्ध भूमि में उतरा। प्रहस्त के आते ही राक्षसों का उत्साह फिर से बढ़ गया। उसने वानरों का भयंकर संहार आरंभ कर दिया।
प्रहस्त को रोकने के लिए वानर सेनापति 'नील' आगे आए। नील अग्नि देव के पुत्र थे और अत्यंत तेजस्वी थे। नील और प्रहस्त के बीच अत्यंत भयंकर और लंबा युद्ध हुआ। प्रहस्त ने नील पर अपने भयंकर बाणों की वर्षा की। नील ने प्रहस्त के रथ के घोड़ों को मार डाला और उसका धनुष तोड़ दिया।
क्रोधित होकर प्रहस्त एक अत्यंत भारी और भयंकर लोहे का 'मूसल' लेकर नील की ओर दौड़ा। प्रहस्त का वह रूप साक्षात यमराज के समान लग रहा था।
नील ने अपनी पूरी शक्ति बटोरी और धरती से एक अत्यंत विशाल और भारी चट्टान उठा ली। जैसे ही प्रहस्त अपना मूसल लेकर नील के पास पहुँचा, नील ने वह पूरी चट्टान प्रहस्त के सिर पर दे मारी। लंका का अजेय प्रधान सेनापति प्रहस्त वहीं युद्ध भूमि में निष्प्राण होकर गिर पड़ा।
प्रहस्त की मृत्यु राक्षसों के लिए एक बहुत बड़ा झटका थी। लंका की सेना अपना मनोबल खोकर वापस लंका के भीतर भागने लगी।
जब रावण को यह समाचार मिला कि उसका सबसे बड़ा सेनापति प्रहस्त भी मारा गया है, तो उसकी आंखें क्रोध से लाल हो गईं और उसका हृदय प्रतिशोध की आग में जलने लगा। रावण अपने सिंहासन से उठ खड़ा हुआ और उसने एक अत्यंत भयानक गर्जना करते हुए कहा:
"अब बहुत हो गया! जिन वानरों ने मेरे इतने वीर सेनापतियों को मारा है, उनका संहार कोई साधारण राक्षस नहीं कर सकता। आज मैं स्वयं युद्ध भूमि में उतरूँगा और उस राम और लक्ष्मण को उनके किए का दंड दूँगा!"
अब त्रेता युग का वह क्षण आ गया था, जब लंकापति रावण पहली बार अपने पूर्ण प्रताप और क्रोध के साथ युद्ध भूमि में साक्षात भगवान श्रीराम के सामने आने वाला था।
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