भाग 39: मेघनाद का अदृश्य युद्ध, नागपाश का संकट और गरुड़ देव का आगमन

प्रथम दिन के युद्ध में अपने महाबली सेनापतियों के कटने और वानर सेना के भयंकर पराक्रम को देखकर रावण का सिंहासन डोल गया था। उसने अपने सबसे बड़े और अजेय पुत्र 'मेघनाद' (इंद्रजीत) को बुलाया। रावण की आज्ञा पाकर मेघनाद अपने मायावी रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि में उतरा।
मेघनाद को आते देख वानर सेना उसकी ओर दौड़ी, परंतु मेघनाद ने तुरंत अपनी तामसी माया का प्रयोग किया। वह अपने रथ सहित आकाश में उड़ गया और बादलों के पीछे छिपकर पूर्णतः अदृश्य हो गया।
अब युद्ध भूमि का दृश्य बदल गया। मेघनाद आकाश से तीरों, भालों और आग की वर्षा कर रहा था, परंतु किसी भी वानर को यह दिखाई नहीं दे रहा था कि प्रहार कहाँ से हो रहा है। अंगद, हनुमान और सुग्रीव जैसे महाबली योद्धा भी इस अदृश्य प्रहार से लहूलुहान होने लगे। वानरों की यह दुर्दशा देखकर श्रीराम और लक्ष्मण आगे आए। लक्ष्मण ने आकाश में बाण चलाकर मेघनाद को खोजने का प्रयास किया, परंतु मेघनाद की माया अत्यंत प्रबल थी।
अदृश्य मेघनाद ने जब देखा कि राम और लक्ष्मण उसके साधारण तीरों से विचलित नहीं हो रहे हैं, तो उसने अपना सबसे भयानक अस्त्र निकाला— 'नागपाश' (सांपों का फंदा)।
मेघनाद ने नागपाश को राम और लक्ष्मण की ओर छोड़ दिया। वे बाण धरती पर आते ही लाखों भयंकर, विषैले और फुफकारते हुए काले नागों में बदल गए। उन नागों ने श्रीराम और लक्ष्मण के पूरे शरीर को कसकर जकड़ लिया। नागों के भयंकर विष और उनकी जकड़न से राम और लक्ष्मण अचेत (मूर्छित) होकर धरती पर गिर पड़े।
श्रीराम और लक्ष्मण को धरती पर गिरा देखकर पूरी वानर सेना में शोक की लहर दौड़ गई। सुग्रीव, अंगद, और जाम्बवंत फूट-फूट कर रोने लगे। मेघनाद ने आकाश में भयंकर सिंहनाद किया और लंका लौटकर रावण को यह समाचार दिया कि उसने दोनों भाइयों को मार गिराया है। रावण की खुशी का कोई ठिकाना न रहा।
पुष्पक विमान से युद्ध भूमि का दृश्य: रावण अत्यंत क्रूर और कूटनीतिज्ञ था। उसने सोचा कि यह अवसर सीता का मनोबल तोड़ने के लिए सबसे उत्तम है। रावण ने त्रिजटा और अन्य राक्षसियों को आदेश दिया: "सीता को मेरे पुष्पक विमान में बैठाकर युद्ध भूमि के ऊपर ले जाओ। उसे दिखाओ कि जिन राम-लक्ष्मण के भरोसे वह बैठी थी, वे अब धूल में पड़े हैं। यह देखकर वह टूट जाएगी और स्वयं मेरी शरण में आ जाएगी।"
राक्षसियां सीता माता को पुष्पक विमान में बैठाकर युद्ध भूमि के ऊपर ले आईं। जब सीता जी ने नीचे धरती पर अपने प्राणनाथ श्रीराम और देवर लक्ष्मण को धूल में सना और भयंकर नागों से बंधा हुआ देखा, तो उनके मुख से एक हृदय विदारक चीख निकल गई। वे विलाप करते हुए रोने लगीं।
परंतु उनके साथ बैठी अत्यंत ज्ञानी राक्षसी 'त्रिजटा' ने सीता जी को सांत्वना देते हुए एक बहुत बड़ा रहस्य बताया: "हे माता! शोक न करें। आपके पति जीवित हैं। ध्यान से देखिए, उनके मुख पर अभी भी वह अलौकिक तेज है, जो मृत्यु के बाद कभी नहीं रहता। और सबसे बड़ी बात, यह 'पुष्पक विमान' एक दिव्य विमान है। इसका यह नियम है कि यह किसी भी 'विधवा' स्त्री को लेकर आकाश में उड़ ही नहीं सकता। यदि श्रीराम की मृत्यु हो गई होती, तो यह विमान आपको लेकर कभी नहीं उड़ता।" त्रिजटा के इन वचनों से सीता जी के हृदय में आशा जगी और वे पुनः अशोक वाटिका लौटा दी गईं।
गरुड़ देव का आगमन: नीचे युद्ध भूमि में वानर विलाप कर रहे थे। तभी अचानक... आकाश का रंग बदलने लगा। एक अत्यंत भयंकर आंधी उठी। समुद्र की लहरें पीछे हटने लगीं, पेड़ उखड़ने लगे और एक अद्भुत दिव्य प्रकाश आकाश से नीचे उतरने लगा।
वह आंधी किसी और की नहीं, बल्कि साक्षात भगवान विष्णु के वाहन, पक्षीराज 'गरुड़' के पंखों की थी। गरुड़ देव सर्पों (नागों) के जन्मजात शत्रु हैं। नागपाश के उस भयंकर प्रभाव और अपने आराध्य पर आए संकट को मीलों दूर से ही महसूस करके, वे स्वयं उनकी रक्षा के लिए युद्ध भूमि में खिंचे चले आए थे।
जैसे ही गरुड़ देव उतरे, उनके तेज और उनकी दृष्टि मात्र से ही राम-लक्ष्मण को जकड़ने वाले वे भयंकर नाग भयभीत होकर उनके शरीर से छूट गए और धरती में छिपने के लिए भागने लगे। गरुड़ देव ने अपने कोमल पंखों से श्रीराम और लक्ष्मण के घावों को स्पर्श किया। गरुड़ का दिव्य स्पर्श पाते ही उनके शरीर के सारे घाव पल भर में भर गए, विष उतर गया और उनके शरीर में पहले से भी दोगुना बल आ गया।
श्रीराम ने अनजान बनकर पूछा, "हे सुंदर पक्षी! आप कौन हैं जिन्होंने हमारे प्राणों की रक्षा की है?" गरुड़ देव ने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! मैं आपका सखा गरुड़ हूँ। जब यह युद्ध समाप्त होगा, तब आप मुझे स्वयं पहचान लेंगे।" यह कहकर गरुड़ देव ने श्रीराम की परिक्रमा की और वापस आकाश में उड़ चले।
श्रीराम और लक्ष्मण को पुनः जीवित और पूर्णतः स्वस्थ खड़ा देखकर वानर सेना की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। सुग्रीव और हनुमान ने अपनी पूरी शक्ति से "जय श्रीराम" का ऐसा भयंकर सिंहनाद किया कि उसकी गूंज से रावण के महल की दीवारें कांप उठीं। रावण को अब यह आभास होने लगा था कि वह किसी साधारण मनुष्य से नहीं लड़ रहा है।
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