भाग 41: रावण का रणभूमि में उतरना, हनुमान का मुक्का और श्रीराम की महान क्षमा

प्रधान सेनापति प्रहस्त की मृत्यु के पश्चात, प्रतिशोध की ज्वाला में जलता हुआ लंकापति रावण अपने सबसे भव्य और मायावी स्वर्ण रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि में उतरा। रावण का रूप अत्यंत भयानक और तेजस्वी था। उसके मुकुट सूर्य के समान चमक रहे थे, उसकी दसों आंखों में क्रोध था और बीसों भुजाओं में भयंकर अस्त्र-शस्त्र सुशोभित थे।
रावण को रणभूमि में आते देख वानर सेना भय से कांप उठी। रावण ने आते ही अपने धनुष की टंकार की और वानरों पर बाणों की ऐसी झड़ी लगा दी मानो प्रलय आ गया हो। सुग्रीव, जाम्बवंत और नील जैसे महाबली योद्धा भी रावण के तीरों का वेग नहीं सह पाए और घायल होकर गिरने लगे।
रावण को वानर सेना का संहार करते देख लक्ष्मण आगे आए, परंतु उनके बीच पवनपुत्र हनुमान आ गए। हनुमान जी ने रावण के रथ के सामने खड़े होकर गर्जना की, "हे दशानन! यदि तुझमें बल है तो मेरे एक प्रहार को सहकर दिखा!"
यह कहकर हनुमान जी ने अपनी पूरी शक्ति से रावण की छाती पर अपना वज्र के समान कठोर मुक्का (घूंसा) मारा। उस मुक्के की चोट इतनी भयंकर थी कि तीनों लोकों को रुलाने वाला रावण अपने रथ पर ही चक्कर खाकर घुटनों के बल गिर पड़ा। उसके मुँह से रक्त (खून) निकल आया।
कुछ क्षण बाद जब रावण संभला, तो उसने आश्चर्य से कहा, "हे वानर! तेरी शक्ति अद्भुत है। तू वास्तव में एक योग्य शत्रु है।" हनुमान जी ने कहा, "धिक्कार है मेरे इस बल को कि मेरे प्रहार के बाद भी तू जीवित बच गया!"
रावण ने क्रोध में आकर हनुमान जी की छाती पर प्रहार किया, जिससे हनुमान जी कुछ पल के लिए पीछे हट गए।
रावण और लक्ष्मण का युद्ध: हनुमान जी को हटाकर रावण लक्ष्मण की ओर बढ़ा। दोनों के बीच एक अत्यंत रोमांचक और भयंकर युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने अपने तीरों से रावण के धनुष के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। जब रावण ने देखा कि लक्ष्मण को साधारण अस्त्रों से नहीं जीता जा सकता, तो उसने ब्रह्मा जी द्वारा दी गई एक अत्यंत अमोघ और मायावी 'शक्ति' (एक प्रकार का जादुई भाला) निकाली।
रावण ने वह शक्ति पूरी ताकत से लक्ष्मण की छाती पर चला दी। शक्ति अचूक थी, वह लक्ष्मण के सीने में जा लगी और लक्ष्मण मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े।
वाल्मीकि रामायण का एक अत्यंत अद्भुत रहस्य: लक्ष्मण को मूर्छित देखकर रावण अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने सोचा कि यदि वह राम के भाई को बंदी बनाकर लंका ले जाए, तो राम का मनोबल पूरी तरह टूट जाएगा। रावण अपने रथ से उतरा और उसने अपनी बीसों भुजाओं से मूर्छित लक्ष्मण को उठाने का प्रयास किया।
रावण ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। जिस रावण ने अपने हाथों से साक्षात कैलाश पर्वत को उठा लिया था, आज वह पसीने से लथपथ हो गया, परंतु मूर्छित लक्ष्मण का शरीर धरती से एक सूत (inch) भी नहीं हिला! रावण समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा क्यों हो रहा है।
वाल्मीकि जी लिखते हैं कि लक्ष्मण वास्तव में अनंत ब्रह्मांड को धारण करने वाले 'शेषनाग' के अवतार थे। रावण के भीतर अहंकार और पाप था, इसलिए वह अनंत ब्रह्मांड के उस भार को नहीं उठा सका।
तभी वहां हनुमान जी आ गए। हनुमान जी ने रावण को अपनी एक ज़ोरदार लात मारी, जिससे रावण दूर जा गिरा। इसके बाद, राम के परम भक्त हनुमान जी ने अत्यंत कोमलता और प्रेम के साथ मूर्छित लक्ष्मण को अपने हाथों में उठाया। जो लक्ष्मण रावण के लिए कैलाश से भी भारी थे, वे हनुमान जी की सच्ची भक्ति के कारण उनके हाथों में एक फूल के समान हल्के हो गए। हनुमान जी लक्ष्मण को लेकर श्रीराम के पास आ गए। (राम के स्पर्श से लक्ष्मण तुरंत स्वस्थ हो गए)।
श्रीराम और रावण का प्रथम आमना-सामना: अपने भाई पर रावण का प्रहार देखकर श्रीराम की आंखें क्रोध से लाल हो गईं। श्रीराम हनुमान जी के चौड़े कंधों पर सवार होकर सीधे रावण के रथ के सामने आ गए। यह रामायण का वह ऐतिहासिक क्षण था जब त्रेता युग के दो सबसे बड़े योद्धा—धर्म के अवतार श्रीराम और अधर्म का प्रतीक रावण—पहली बार एक-दूसरे के सामने खड़े थे।
श्रीराम ने अत्यंत गंभीर और गरजते हुए स्वर में कहा:
"हे दशानन! तूने छिपकर मेरी पत्नी का हरण किया और स्वयं को शूरवीर समझता है? आज तू मेरी दृष्टि के सामने आया है। यदि तू आज भागकर पाताल या देवलोक में भी छिप जाए, तो भी मेरे बाण तुझे जीवित नहीं छोड़ेंगे!"
श्रीराम ने अपने 'कोदंड' धनुष पर बाण चढ़ाया। उनका निशाना इतना अचूक और प्रहार इतना तीव्र था कि रावण की आंखें चौंधिया गईं।
श्रीराम ने अपने पहले बाण से रावण के रथ के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। दूसरे बाण से उन्होंने रावण के घोड़ों और सारथी को मार डाला। तीसरे बाण से श्रीराम ने रावण के हाथ का धनुष और उसके सारे अस्त्र-शस्त्र काट दिए। और अंत में, श्रीराम ने एक ऐसा अमोघ बाण चलाया, जो सीधा रावण के मस्तक पर जाकर लगा। उस बाण ने रावण का वह अत्यंत बहुमूल्य और चमचमाता हुआ स्वर्ण मुकुट धरती पर गिरा दिया।
बिना रथ, बिना अस्त्र और बिना मुकुट के, तीनों लोकों का अजेय विजेता रावण आज युद्ध भूमि में एक अनाथ और भिखारी के समान खड़ा था। वह भय से कांप रहा था।
श्रीराम चाहते तो उसी क्षण एक और बाण चलाकर रावण का वध कर सकते थे। परंतु श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम थे। उन्होंने एक निहत्थे और थके हुए शत्रु पर प्रहार करना अपने धर्म के विरुद्ध समझा।
श्रीराम ने अपने धनुष को नीचे किया और एक अत्यंत महान, ऐतिहासिक और क्षमाशील वाक्य कहा:
"कृतकर्मासि श्रान्तस्त्वं... गच्छानुजानामि रणार्दितस्त्वं प्रविश्य रात्रिंचरराज लंकाम्।" (अर्थात: हे लंकापति! तुमने आज बहुत युद्ध किया है, अब तुम थक चुके हो। जाओ, मैं तुम्हें प्राणदान देता हूँ। आज लौटकर लंका में विश्राम करो और कल जब तुम्हारा शरीर स्वस्थ हो जाए, तब नए रथ और नए अस्त्र-शस्त्र लेकर आना, तब मैं तुम्हें युद्ध दिखाऊँगा।)
श्रीराम की इस महान क्षमा और अपनी इस घोर पराजय ने रावण के अहंकार को तार-तार कर दिया। लज्जा और अपमान से रावण का सिर झुक गया। वह चुपचाप, बिना कुछ बोले, अपना टूटा हुआ अहंकार लेकर पैदल ही लंका की ओर लौट गया।
लंका लौटकर रावण को यह भली-भांति ज्ञात हो गया कि राम से जीतना उसके बस की बात नहीं है। अब उसे लंका के उस महादैत्य की आवश्यकता थी, जो अब तक गहरी नींद में सोया हुआ था—उसका मंझला भाई, 'कुंभकर्ण'।
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