डूबता हुआ लालची पुजारी — 'देने' और 'लेने' का मनोविज्ञान

विजयनगर में एक बहुत ही प्रसिद्ध पुजारी रहता था। वह धार्मिक कर्मकांडों का बड़ा ज्ञानी तो था, परंतु स्वभाव से वह दुनिया का सबसे बड़ा कंजूस और लालची इंसान था। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में लोगों से केवल दान 'लिया' था, परंतु कभी किसी गरीब को एक फूटी कौड़ी भी अपनी जेब से 'दी' नहीं थी।
एक दिन सुबह-सुबह वह पुजारी तुंगभद्रा नदी के किनारे स्नान कर रहा था। अचानक उसका पैर फिसला और वह नदी के गहरे पानी में जा गिरा। पुजारी को तैरना नहीं आता था। वह पानी में गोते खाने लगा और ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगा— "बचाओ! बचाओ! मैं डूब रहा हूँ!"
बचाने का असफल प्रयास: नदी के किनारे कपड़े धो रहे कुछ लोग तुरंत उसकी मदद के लिए दौड़े। एक आदमी ने नदी के किनारे खड़े होकर अपना हाथ आगे बढ़ाया और ज़ोर से चिल्लाया: "पंडित जी! अपना हाथ दो! मुझे अपना हाथ दो! मैं तुम्हें खींच लूँगा!"
परंतु यह क्या! पुजारी पानी में डूब रहा था, उसकी जान जा रही थी, लेकिन वह अपना हाथ उस आदमी को 'दे' नहीं रहा था!
एक और आदमी ने कोशिश की और कहा, "जल्दी अपना हाथ दो पंडित जी!" परंतु पुजारी ने फिर भी अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया और पानी में और गहरे डूबने लगा। लोग हैरान थे कि यह आदमी जान बचाने के लिए अपना हाथ क्यों नहीं दे रहा।
तेनालीरामा का प्रवेश और मनोविज्ञान की समझ: उसी समय तेनालीरामा वहाँ से गुज़र रहे थे। उन्होंने भीड़ देखी और मामला समझ गए। तेनालीरामा उस लालची पुजारी की फितरत को बहुत अच्छी तरह जानते थे।
तेनालीरामा तुरंत भीड़ को चीरते हुए आगे आए और लोगों से बोले: "तुम लोग गलत शब्द बोल रहे हो। यह पुजारी तुम्हें अपना हाथ कभी नहीं देगा। तुम सब पीछे हटो, मैं इसे बचाता हूँ।"
तेनालीरामा नदी के बिल्कुल किनारे गए। उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया और पूरे ज़ोर से चिल्लाकर कहा: "पंडित जी! घबराइए मत... मेरा हाथ लो!"
चमत्कार: जैसे ही पुजारी के कानों में 'लो' शब्द पड़ा, डूबते हुए पुजारी ने तुरंत बिजली की फुर्ती से अपना हाथ पानी से बाहर निकाला और तेनालीरामा का हाथ कसकर पकड़ लिया!
तेनालीरामा ने ज़ोर लगाकर उसे खींचकर सुरक्षित किनारे पर निकाल लिया।
लोग हैरानी से यह सब देख रहे थे। एक आदमी ने पूछा: "तेनालीरामा जी! यह क्या चमत्कार था? जब हम कह रहे थे कि 'अपना हाथ दो', तो इसने नहीं दिया। परंतु आपके 'मेरा हाथ लो' कहते ही इसने तुरंत हाथ बढ़ा दिया। ऐसा क्यों?"
तेनालीरामा ने हंसते हुए उस हांफते हुए लालची पुजारी की ओर इशारा किया और कहा: "भाइयो! यह कोई चमत्कार नहीं, बल्कि 'मानव मनोविज्ञान' है। इस पुजारी ने अपनी पूरी ज़िंदगी में केवल लोगों से दान 'लिया' है। इसने आज तक किसी को कुछ 'दिया' नहीं है। इसके दिमाग को 'देने' की आदत ही नहीं है!"
तेनालीरामा ने आगे कहा: "जब तुम कह रहे थे 'अपना हाथ दो', तो इसके लालची दिमाग ने संकट के समय भी कुछ 'देने' से इंकार कर दिया। परंतु जैसे ही मैंने कहा 'मेरा हाथ लो', तो इसे मुफ्त में कुछ 'मिलने' की आदत याद आ गई और इसने तुरंत मेरा हाथ 'ले' लिया!"
वहाँ खड़े सभी लोग तेनालीरामा के इस अचूक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण पर ठहाके लगाकर हंस पड़े। पुजारी शर्म के मारे पानी-पानी हो गया। तेनालीरामा ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इंसान की मूल फितरत संकट के समय भी नहीं बदलती!
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