"एक म्यान में दो तलवारें"

'दंगलपुर' नाम का एक बहुत ही खुशहाल गाँव था। इस गाँव की पंचायत और चौपाल बहुत मशहूर थी। गाँव के अखाड़े में 'शेर सिंह' नाम का एक बहुत ही मगरूर और ताक़तवर पहलवान रहता था। शेर सिंह की मूँछें बहुत बड़ी थीं और वह पूरे गाँव में अपनी छाती तानकर चलता था। गाँव के लोग उससे डरते थे और चौपाल की सबसे बड़ी और ऊँची 'सरपंची कुर्सी' पर हमेशा शेर सिंह ही बैठता था। उसे लगता था कि इस गाँव का इकलौता "शेर" वही है।
सब कुछ ठीक चल रहा था, जब तक कि गाँव में शहर से लौटकर एक और पहलवान नहीं आ गया। उसका नाम था 'गजराज'।
गजराज शरीर में शेर सिंह से भी ज़्यादा चौड़ा था। वह भी बहुत घमंडी था और अखाड़े में कई पदक जीत चुका था। गजराज को भी अपनी ताक़त का बहुत दिखावा करने की आदत थी।
अहंकार का टकराव: जैसे ही गजराज गाँव में रहने आया, शेर सिंह की आँखों में खटकने लगा। गाँव का अखाड़ा एक था, लेकिन अब वहाँ दो ताक़तवर पहलवान थे। जब शेर सिंह अखाड़े में कसरत करता, तो गजराज जानबूझकर उसके सामने भारी 'मुगदर' (Wooden Clubs) घुमाने लगता। जब गजराज बाज़ार से गुज़रता, तो शेर सिंह जानबूझकर रास्ता रोक कर खड़ा हो जाता। दोनों एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। गाँव वाले रोज़ उनका यह डरावना और हास्यास्पद टकराव देखते थे।
कुर्सी की लड़ाई: एक दिन शाम के समय गाँव की चौपाल लगी। सभी लोग ज़मीन पर दरी बिछाकर बैठे थे और बीच में वह 'एकलौती ऊँची कुर्सी' रखी थी।
सबसे पहले शेर सिंह वहाँ पहुँचा और अपनी मूँछों पर ताव देते हुए उस कुर्सी की तरफ बढ़ा। लेकिन ठीक उसी समय, दूसरी तरफ से गजराज भी भारी कदमों से चौपाल में आ पहुँचा। उसकी नज़र भी उसी कुर्सी पर थी।
दोनों पहलवानों की आँखें मिलीं। दोनों ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। शेर सिंह ने दौड़कर कुर्सी के दाईं तरफ का हत्था पकड़ लिया, तो गजराज ने बाईं तरफ का हत्था कसकर पकड़ लिया।
शेर सिंह गुर्राया: "गजराज! यह कुर्सी मेरी है। दंगलपुर का सबसे ताक़तवर आदमी मैं हूँ, इसलिए यहाँ मैं बैठूँगा।" गजराज ने अपनी लाल आँखें दिखाते हुए कहा: "चुप रह शेर सिंह! मैं शहर का चैंपियन हूँ। यह कुर्सी अब मेरी है!"
दोनों ने अपनी-अपनी तरफ कुर्सी को पूरी ताक़त से खींचना शुरू कर दिया। दोनों के माथे पर पसीने की बूँदें चमकने लगीं। गाँव वाले डर के मारे पीछे हट गए।
"यह मेरी है!" "नहीं, मेरी है!"
तभी दोनों ने अपना सारा ज़ोर लगाया और... 'कड़ाक्!'
वह पुरानी और मज़बूत लकड़ी की कुर्सी बीच में से 'दो टुकड़ों में टूट गई'! शेर सिंह एक तरफ मिट्टी में धड़ाम से गिरा और गजराज दूसरी तरफ औंधे मुँह जा गिरा। दोनों के हाथों में कुर्सी का एक-एक टूटा हुआ हत्था था।
गाँव के सबसे बुजुर्ग और समझदार व्यक्ति ने यह नज़ारा देखकर ज़ोर से ठहाका लगाया। उन्होंने दोनों पहलवानों को मिट्टी झाड़ते हुए देखकर कहा:
"अरे मूर्खो! तुम दोनों ताक़तवर हो, लेकिन तुम्हारी अक्ल घुटनों में है। एक जंगल में कभी दो शेर नहीं रह सकते और एक चौपाल पर दो चौधरी नहीं बैठ सकते। तुम दोनों ने अपने घमंड में इस कुर्सी को ही तोड़ दिया। सच ही कहा गया है कि— 'एक म्यान में दो तलवारें' कभी नहीं रह सकतीं!" (यानी जिस तरह तलवार रखने के कवर (म्यान) में केवल एक ही तलवार आ सकती है, वैसे ही एक अधिकार की जगह पर दो घमंडी इंसान साथ नहीं रह सकते)।
दोनों पहलवान शर्मिंदा हुए और उस दिन के बाद उन्होंने चौपाल पर ज़मीन पर बैठना ही ठीक समझा।
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