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"दूध का जला छाछ भी फूँक कर पीता है"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"दूध का जला छाछ भी फूँक कर पीता है"

'रतनचंद' नाम का एक बहुत ही सीधा-सादा और भोला व्यापारी था। वह एक गाँव से दूसरे गाँव जाकर रेशम के कपड़े बेचता था।

एक बार रतनचंद अपना सामान बेचकर बहुत सारा पैसा लेकर घर लौट रहा था। रास्ते में उसे कुछ अजनबी लोग मिले। वे लोग बहुत ही मीठी-मीठी बातें कर रहे थे। उन्होंने रतनचंद को अपना दोस्त बना लिया और बातों-बातों में उसे 'मीठा दूध' पीने को दिया।

रतनचंद ने उन पर भरोसा करके दूध पी लिया। लेकिन उस दूध में 'नींद की तेज़ दवा' मिली हुई थी। रतनचंद बेहोश हो गया और जब सुबह उसकी आँख खुली, तो वे ठग उसका सारा पैसा और बचा हुआ सामान लूट कर भाग चुके थे। रतनचंद सड़क पर रोता हुआ किसी तरह अपने घर पहुँचा। इस घटना ने रतनचंद के दिमाग में एक बहुत ही गहरा 'डर' बैठा दिया।

हद से ज़्यादा शक: इस धोखे के कई महीनों बाद, रतनचंद ने फिर से अपना व्यापार शुरू किया। एक दिन वह गर्मियों की चिलचिलाती धूप में एक गाँव के कच्चे रास्ते से गुज़र रहा था। धूप इतनी तेज़ थी कि रतनचंद का गला सूख गया, उसे चक्कर आने लगे और वह एक पेड़ के नीचे हाँफते हुए बैठ गया।

तभी गाँव का एक बहुत ही गरीब और नेकदिल किसान वहाँ से गुज़रा। उसने रतनचंद की यह बुरी हालत देखी। किसान दौड़कर अपने घर गया और मिट्टी के कुल्हड़ में 'एकदम ठंडी और ताज़ी छाछ' लेकर आया।

किसान ने प्यार से कुल्हड़ रतनचंद की तरफ बढ़ाते हुए कहा: "मुसाफिर भाई! बहुत तेज़ धूप है। यह ठंडी-ठंडी छाछ पी लो, तुम्हारे शरीर में जान आ जाएगी।"

डर का ड्रामा: छाछ का रंग सफेद था, बिल्कुल उस 'दूध' की तरह जिसमें ठगों ने दवा मिलाई थी। जैसे ही रतनचंद ने उस सफेद छाछ को देखा, उसे वह पुरानी ठगी और अपना लुटा हुआ पैसा याद आ गया।

हालाँकि कुल्हड़ बाहर से बिल्कुल ठंडा था और उसमें से बर्फ जैसी ठंडक आ रही थी, लेकिन रतनचंद के हाथ डर के मारे काँपने लगे। उसने कुल्हड़ को अपने मुँह के पास लाया, लेकिन पीने के बजाय, वह उस ठंडी छाछ पर ज़ोर-ज़ोर से 'फूँक मारने लगा' — "फूँ... फूँ... फूँ..."।

वह एक घूँट पीता, फिर चारों तरफ शक की नज़रों से देखता, और फिर ठंडी छाछ पर ज़ोर से फूँक मारता।

किसान यह देखकर बहुत हैरान हुआ। उसने हँसते हुए पूछा: "अरे मुसाफिर भाई! चाय या गरम दूध को तो फूँक मारकर पीते देखा है, लेकिन तुम इस बर्फ जैसी ठंडी छाछ पर फूँक क्यों मार रहे हो? यह तुम्हें जलाएगी नहीं।"

रतनचंद ने हाँफते हुए और डरी हुई आँखों से जवाब दिया: "भाई! तुम नहीं समझोगे। कुछ महीने पहले मुझे सफेद रंग के 'दूध' ने ऐसा जलाया है (यानी धोखा दिया है) कि अब मुझे हर सफेद चीज़ से डर लगता है। मुझे डर है कि कहीं इसमें भी कोई धोखा न हो।"

किसान मुस्कुराया और उसने रतनचंद के कंधे पर हाथ रखकर कहा: "मैं समझ गया भाई! जब इंसान एक बार बुरी तरह धोखा खा लेता है, तो उसका भरोसा दुनिया से उठ जाता है। तुम्हारी हालत देखकर तो हमारे गाँव की वह पुरानी कहावत बिल्कुल सच लगती है— 'दूध का जला, छाछ भी फूँक कर पीता है!'"

रतनचंद ने राहत की साँस ली और समझ गया कि दुनिया में हर इंसान ठग नहीं होता।

🎉 कहानी समाप्त

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