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😄 शेखचिल्ली

एक गज़ दूध

लोक परंपरा4 मिनट का पठन
एक गज़ दूध

शेख चिल्ली दुनिया की हर चीज़ को अपनी ही अजीबोगरीब नज़र से देखता था। उसे इस बात की बिल्कुल भी समझ नहीं थी कि किस चीज़ को कैसे नापा या तौला जाता है।

एक दिन सुबह-सुबह शेख चिल्ली की माँ को खीर बनानी थी। घर में दूध खत्म हो गया था। माँ ने शेख चिल्ली को एक बड़ा सा पीतल का बर्तन (लोटा) और कुछ पैसे दिए।

माँ ने समझाते हुए कहा, "बेटा शेख! बाज़ार जा और 'कल्लू दूध वाले' की दुकान से पूरे 'एक सेर' (एक लीटर) दूध ले आ। ध्यान से लाना, रास्ते में गिराना मत।"

शेख चिल्ली पैसे और लोटा लेकर बाज़ार की तरफ चल दिया।

बाज़ार में काफी भीड़ थी। कल्लू दूध वाले की दुकान बाज़ार के बिल्कुल आखिरी कोने पर थी। रास्ते में शेख चिल्ली एक 'कपड़े वाले की दुकान' के सामने से गुज़रा।

शेख ने देखा कि वहाँ एक आदमी पगड़ी का कपड़ा खरीद रहा था। कपड़े वाले सेठ ने अपने हाथ में लोहे की एक लंबी सी 'छड़ी' पकड़ रखी थी, जिसे 'गज़' कहा जाता है। सेठ उस लोहे की छड़ी से नाप-नाप कर कपड़ा काट रहा था।

"एक गज़... दो गज़... तीन गज़..." सेठ कपड़े को नापते हुए बोल रहा था।

शेख चिल्ली वहीं खड़ा होकर बड़े ध्यान से यह सब देखने लगा। उसके बेवकूफ़ दिमाग में एक नया ही 'ज्ञान' पैदा हो गया। उसने सोचा: "अच्छा! तो बाज़ार में जो भी बढ़िया चीज़ मिलती है, वह इस 'लोहे की छड़ी' (गज़) से नाप कर ही दी जाती है। मेरी अम्मा ने तो मुझे 'एक सेर' दूध लाने को कहा था। वह तो बहुत पुराना तरीका है। मैं भी आज दूध वाले से कहूँगा कि मुझे दूध 'गज़' से नाप कर दे, ताकि दूध बिल्कुल सही और बढ़िया मिले!"

यह नया ज्ञान प्राप्त करके शेख चिल्ली सीधा कल्लू दूध वाले की दुकान पर पहुँचा। कल्लू अपनी दुकान पर बड़े से कड़ाहे में दूध उबाल रहा था और अपने पास रखे छोटे से 'नापने वाले बर्तन' से लोगों को दूध दे रहा था।

शेख चिल्ली ने अपना खाली लोटा कल्लू के सामने रखा और बहुत ही रौब से कहा: "कल्लू भाई! मुझे बढ़िया वाला ताज़ा दूध दे दो। लेकिन ध्यान रहे, मुझे उस छोटे से बर्तन से नाप कर मत देना। मुझे पूरे 'एक गज़ दूध' चाहिए। अपना वह लोहे का डंडा निकालो और नाप कर दो!"

कल्लू दूध वाला शेख चिल्ली की यह बात सुनकर हक्का-बक्का रह गया। उसने अपने कानों को खुजाते हुए पूछा, "क्या कहा शेख? एक गज़ दूध? अरे भाई, दूध कोई कपड़ा या ज़मीन थोड़ी है जो गज़ से नापा जाए। दूध तो 'तरल' चीज़ है, इसे तो सेर या लीटर वाले बर्तन से नाप कर दिया जाता है।"

शेख चिल्ली ने अपनी अज्ञानता पर अड़ते हुए कहा, "अरे तुम मुझे बेवकूफ़ मत बनाओ! मैंने अभी-अभी अपनी आँखों से देखा है, कपड़े वाला सेठ सब कुछ 'गज़' से नाप कर दे रहा था। मुझे तो दूध गज़ से नाप कर ही चाहिए, वरना मैं तुम्हारे यहाँ से दूध नहीं लूँगा!"

कल्लू दूध वाला बहुत ही चिड़चिड़े स्वभाव का आदमी था। उसे शेख चिल्ली की इस बेतुकी ज़िद पर बहुत ज़ोर का गुस्सा आ गया। उसने सोचा कि इस बेवकूफ़ को सबक सिखाना ही पड़ेगा।

कल्लू ने अपना दूध नापने वाला बर्तन (लीटर) उठाया। उसने शेख चिल्ली के पैसे अपनी जेब में रखे और फिर वह दूध से भरा बर्तन शेख चिल्ली के 'पीतल के लोटे' में डालने के बजाय, सीधे दुकान के बाहर 'धूल भरी ज़मीन पर' एक लंबी धार बनाते हुए उड़ेल दिया!

दूध ज़मीन पर गिरकर एक लंबी सी सफेद लकीर बनाता हुआ मिट्टी में बहने लगा।

कल्लू ने अपनी दुकान का एक लंबा सा डंडा उठाया और ज़मीन पर फैले हुए उस दूध को डंडे से नापते हुए कहा: "लो शेख चिल्ली! यह ज़मीन पर पड़ा है तुम्हारा पूरे 'एक गज़ दूध'! मैंने नाप दिया है। अब इसे ज़मीन से उठा लो और अपनी अम्मा को जाकर दे दो!"

शेख चिल्ली ज़मीन पर मिट्टी में सने हुए और बहते हुए दूध को देखकर हक्का-बक्का रह गया। उसने ज़मीन पर हाथ मारा, लेकिन दूध तो मिट्टी में सोख लिया गया था।

"अरे! यह तुमने क्या किया? मेरा दूध तो मिट्टी में मिल गया! अब मैं इसे लोटे में कैसे उठाऊँ?" शेख चिल्ली रोनी सूरत बनाकर बोला।

कल्लू ने हँसते हुए कहा, "अरे भाई! गज़ से नापी हुई चीज़ें तो ज़मीन पर ही नापी जाती हैं। कपड़ा तो तूने उठा लिया होता, अब दूध को भी उठा ले! यही सज़ा है बिना सोचे-समझे हर जगह अपनी अक्ल दौड़ाने की।"

शेख चिल्ली को अब जाकर समझ में आया कि 'तरल' और 'ठोस' चीज़ों को नापने का तरीका अलग-अलग होता है। वह अपना खाली लोटा हाथ में लटकाए, अम्मा की डांट खाने के डर से रोता हुआ घर वापस लौट गया।

🎉 कहानी समाप्त

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