शाही दावत और फटे कपड़े

गाँव में शेख चिल्ली की पहचान एक बहुत ही गरीब और फटेहाल इंसान के रूप में थी। उसके कपड़े हमेशा गंदे, फटे हुए और कई जगह से सिले (पैबंद लगे) हुए होते थे।
एक बार गाँव के सबसे बड़े और अमीर ज़मींदार ने एक बहुत ही शानदार 'शाही दावत' का आयोजन किया। इस दावत में गाँव के सभी लोगों को आमंत्रित किया गया था। तरह-तरह के पकवान, पुलाव, कोरमा, ज़र्दा और मिठाइयाँ बन रही थीं। पूरे गाँव में देसी घी की खुशबू महक रही थी।
शेख चिल्ली को भी दावत का बहुत शौक था। शाम होते ही वह अपने उसी रोज़मर्रा के 'फटे-पुराने और गंदे कपड़ों' में ज़मींदार की हवेली पर पहुँच गया।
हवेली के दरवाज़े पर ज़मींदार के कुछ कठोर पहरेदार खड़े थे। जब उन्होंने शेख चिल्ली को उन भद्दे और मैले कपड़ों में हवेली के अंदर जाते देखा, तो उन्होंने उसे एक भिखारी समझ लिया।
पहरेदार ने शेख चिल्ली को सीने पर हाथ लगाकर धक्का दिया और कहा, "चल पीछे हट! यह शाही दावत है, कोई खैरात बँटने की जगह नहीं। जा यहाँ से, वरना बहुत मार पड़ेगी!"
शेख चिल्ली ने बहुत कोशिश की यह बताने की कि उसे भी दावत में बुलाया गया है, लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी। अंदर ज़मींदार भी अच्छे कपड़े पहने मेहमानों का स्वागत कर रहे थे, उन्होंने भी शेख की तरफ ध्यान नहीं दिया।
शेख चिल्ली बहुत दुखी और अपमानित होकर हवेली से बाहर आ गया।
उसे बहुत ज़ोर की भूख लगी थी और वह किसी भी कीमत पर उस शाही दावत का मज़ा लेना चाहता था। शेख चिल्ली ने अपना दिमाग दौड़ाया। वह सीधा अपने एक दोस्त 'करीम' के घर गया, जो गाँव का एक रईस व्यापारी था।
शेख ने करीम से कहा, "भाई करीम! मुझे कुछ घंटों के लिए अपनी सबसे महँगी 'रेशमी शेरवानी, एक शानदार पगड़ी और मखमली जूतियाँ' उधार दे दो।"
करीम ने अपने दोस्त की मदद की और उसे अपने सबसे बढ़िया कपड़े दे दिए।
शेख चिल्ली ने नहा-धोकर जब वह रेशमी शेरवानी और पगड़ी पहनी, तो वह बिल्कुल किसी 'नवाब' जैसा लगने लगा। कोई पहचान ही नहीं सकता था कि यह वही फटेहाल शेख चिल्ली है।
इस नवाब वाले भेष में शेख चिल्ली दोबारा ज़मींदार की हवेली पर पहुँचा।
इस बार नज़ारा बिल्कुल अलग था। दरवाज़े पर खड़े पहरेदारों ने जब शेख चिल्ली को उन शानदार रेशमी कपड़ों में देखा, तो उन्होंने झुककर सलाम किया और सम्मान के साथ उसे अंदर जाने का रास्ता दिया।
ज़मींदार की नज़र जब शेख पर पड़ी, तो वह भी उस 'रईस मेहमान' को देखकर बहुत प्रभावित हुआ। ज़मींदार खुद चलकर शेख के पास आया और उसे सबसे आगे, इज़्ज़त वाली जगह पर ले जाकर बिठाया।
कुछ ही देर में खाना परोसा जाने लगा। शेख चिल्ली के सामने कोरमा, बिरयानी, रायता और गुलाब जामुन से भरी हुई एक बहुत बड़ी थाली रखी गई।
अब जो हुआ, उसे देखकर वहाँ मौजूद सभी मेहमानों और ज़मींदार की आँखें फटी की फटी रह गईं।
शेख चिल्ली ने खाना खाने के लिए अपना हाथ तो बढ़ाया, लेकिन उसने वह खाना अपने मुँह में डालने के बजाय, बिरयानी का एक मुट्ठी भर चावल उठाया और उसे अपनी 'शेरवानी की जेब' में डाल दिया!
फिर उसने एक कटोरी कोरमा उठाया और उसे अपनी 'पगड़ी' पर उड़ेल दिया! इसके बाद उसने एक गुलाब जामुन उठाया और उसे अपनी शेरवानी की 'आस्तीन' पर मलने लगा!
"खाओ मेरी शेरवानी! खाओ मेरी पगड़ी! यह शाही दावत तुम्हारे लिए ही है, मज़ा लो!" शेख चिल्ली अपने कपड़ों से बातें करते हुए उन पर खाना मल रहा था।
यह पागलपन देखकर ज़मींदार से रहा नहीं गया। वह दौड़कर शेख के पास आया और गुस्से और हैरानी से बोला: "अरे भाई! यह क्या बदतमीज़ी है? तुम ये क्या कर रहे हो? इंसान खाना अपने मुँह से खाता है या कपड़ों को खिलाता है?"
शेख चिल्ली ने बहुत ही मासूमियत और शांति से अपने कपड़ों से बिरयानी पोंछते हुए ज़मींदार की आँखों में देखा और एक ऐसा जवाब दिया जिसने पूरे पंडाल को खामोश कर दिया।
शेख चिल्ली ने कहा: "ज़मींदार साहब! इसमें बदतमीज़ी कैसी? मैं तो बिल्कुल सही कर रहा हूँ। अभी एक घंटे पहले, जब मैं इसी दावत में 'फटे-पुराने कपड़ों' में आया था, तो आपके पहरेदारों ने मुझे धक्के मारकर हवेली से बाहर निकाल दिया था। मुझे किसी ने एक गिलास पानी तक नहीं पूछा।"
शेख ने अपनी रेशमी शेरवानी दिखाते हुए आगे कहा: "और अब, जब मैं इन महँगे रेशमी कपड़ों और पगड़ी में आया हूँ, तो मुझे सबसे इज़्ज़त वाली जगह पर बिठाया गया और यह शाही खाना परोसा गया। इसका मतलब तो बिल्कुल साफ़ है कि यह इज़्ज़त और यह दावत मुझे नहीं, बल्कि 'इन महँगे कपड़ों' को दी जा रही है! इसलिए जब दावत कपड़ों के लिए है, तो खाना भी मुँह को नहीं, इन कपड़ों को ही खाना चाहिए ना!"
यह गहरा और करारा व्यंग्य सुनकर ज़मींदार का सिर शर्म से झुक गया। उसे अपनी गलती का अहसास हो गया कि उसने इंसान की पहचान उसके कपड़ों से की थी।
पूरे पंडाल में सन्नाटा छा गया। ज़मींदार ने शेख चिल्ली से हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी और उसे अपने साथ बिठाकर पूरे सम्मान के साथ खाना खिलाया। यह शेख चिल्ली के जीवन का एक ऐसा किस्सा था जहाँ उसकी अज्ञानता ने एक बहुत ही बड़ी और समझदारी वाली सीख दे दी थी।
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