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"खोदा पहाड़ निकली चुहिया"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"खोदा पहाड़ निकली चुहिया"

'कंचनपुर' गाँव के पास एक बहुत ही पथरीली और ऊँची 'पहाड़ी' थी। गाँव में यह अफ़वाह फैली हुई थी कि सैकड़ों साल पहले किसी राजा ने उस पहाड़ी के नीचे अपना 'सोने-चाँदी और हीरों से भरा खज़ाना' गाड़ रखा है।

गाँव में तीन बहुत ही लालची और मूर्ख दोस्त रहते थे— रंगा, बिल्ला और छंगा। जब उन्होंने खज़ाने की बात सुनी, तो उनकी आँखों में लालच की चमक आ गई।

रंगा ने फुसफुसाते हुए कहा: "भाइयो! अगर हम उस पहाड़ी को खोद दें, तो हम गाँव के सबसे अमीर आदमी बन जाएँगे। हमें ज़िंदगी भर काम नहीं करना पड़ेगा!"

लालच और भयंकर मेहनत: तीनों ने फावड़े और गैंती उठाईं और छुपकर पहाड़ी पर पहुँच गए। उन्होंने कसम खाई कि जब तक खज़ाना नहीं मिलेगा, वे रुकेंगे नहीं।

"खच... खच... खच..." तीनों दोस्तों ने ज़ोर-शोर से खुदाई शुरू कर दी। सूरज की तेज़ गर्मी में उनके पसीने छूटने लगे। उनके हाथों में छाले पड़ गए। दिन बीते, हफ्ते बीते, यहाँ तक कि पूरे 'तीन महीने' बीत गए! उन्होंने उस विशाल पहाड़ी का आधा हिस्सा खोदकर एक बहुत बड़ा और गहरा गढ्ढा बना दिया।

बिल्ला हाँफते हुए बोला: "भाई, मेरे तो हाथ टूट गए। क्या सच में यहाँ खज़ाना है?" छंगा ने डांटते हुए कहा: "चुपचाप खोद! बस खज़ाना मिलने ही वाला है।"

मेहनत का फल: अचानक रंगा के फावड़े से कुछ टकराने की आवाज़ आई— 'ठक्!' तीनों की आँखें खुशी से फटी रह गईं। उन्होंने जल्दी-जल्दी मिट्टी हटाई। मिट्टी के नीचे से एक छोटा सा, जंग लगा हुआ 'लोहे का संदूक' निकला!

तीनों दोस्त खुशी से नाचने लगे। "हम अमीर हो गए! हम राजा बन गए!" उन्होंने ज़ोर लगाकर उस संदूक का ताला तोड़ा।

संदूक खुलते ही तीनों ने अपनी आँखें बंद कर लीं कि कहीं हीरों की चमक से उनकी आँखें न चौंधिया जाएँ। लेकिन जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

उस संदूक में कोई सोना, चाँदी या हीरा नहीं था। संदूक के बिल्कुल बीचों-बीच केवल एक 'हरा पड़ा हुआ, घिसा-पिटा और पुराना तांबे का सिक्का' रखा था, जिसकी कीमत एक कौड़ी भी नहीं थी!

तीनों लालची दोस्त अपना माथा पीट-पीट कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। उनके महीनों की भयंकर मेहनत और पसीने का फल केवल एक बेकार तांबे का सिक्का निकला।

तभी गाँव के सरपंच जी वहाँ से गुज़रे। उन्होंने वह गहरा गढ्ढा, रोते हुए तीनों दोस्त और उनके हाथ में वह 'तांबे का सिक्का' देखा।

सरपंच जी ने ज़ोर से हँसते हुए कहा: "अरे मूर्खो! तुम तीनों ने बिना कुछ सोचे-समझे खज़ाने के लालच में इस पूरी विशाल पहाड़ी को खोद डाला। महीनों पसीना बहाया, हड्डियाँ तुड़वाईं, और अंत में मिला क्या? बस यह एक खोटा सिक्का! तुम लोगों की हालत देखकर तो बस यही कहने का मन करता है— 'खोदा पहाड़... और निकली चुहिया!'"

(यानी पहाड़ खोदने जैसी भयानक मेहनत करना, लेकिन फल के नाम पर केवल एक छोटी सी चुहिया मिलना)। तीनों दोस्त शर्मिंदा होकर अपने छिले हुए हाथ मलते हुए गाँव वापस लौट गए।

🎉 कहानी समाप्त

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