गधा चोरी और अल्लाह का शुक्र

शेख चिल्ली के पास कोई बहुत बड़ी दौलत नहीं थी। उसने अपनी ज़िंदगी भर की सारी जमा-पूंजी इकट्ठी करके, अपने लिए एक बहुत ही सुंदर और हट्टा-कट्टा 'गधा' खरीदा था। शेख चिल्ली को अपने उस गधे पर बहुत गर्व था।
एक दिन शेख चिल्ली अपने उसी नए गधे पर बैठकर बाज़ार गया। बाज़ार में एक हलवाई की दुकान पर ताज़ी जलेबियाँ बन रही थीं। शेख चिल्ली को जलेबियाँ खाने का मन हुआ।
उसने गधे से उतरकर उसे दुकान के बाहर एक पेड़ से बाँध दिया और खुद दुकान के अंदर जाकर मज़े से जलेबियाँ खाने लगा। शेख चिल्ली को खाने में इतना मज़ा आ रहा था कि वह बाहर गधे की तरफ देखना ही भूल गया।
बाज़ार में कुछ शातिर चोर घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि एक बहुत ही अच्छा गधा लावारिस बँधा हुआ है। चोरों ने चुपके से गधे की रस्सी खोली और उसे लेकर रफूचक्कर हो गए।
कुछ देर बाद, जब शेख चिल्ली जलेबियाँ खाकर और अपने हाथ पोंछते हुए बाहर आया, तो उसने देखा कि पेड़ के पास उसका गधा गायब है! वहाँ सिर्फ एक खाली रस्सी पड़ी थी।
शेख चिल्ली ने इधर-उधर देखा, बाज़ार में लोगों से पूछा, लेकिन किसी ने उसका गधा नहीं देखा था। यह बिल्कुल साफ़ हो गया था कि किसी ने उसका 'ज़िंदगी भर की कमाई' वाला गधा चुरा लिया है।
जब बाज़ार के लोगों को पता चला कि शेख चिल्ली का गधा चोरी हो गया है, तो वे सब उसके पास इकट्ठा हो गए। लोग शेख चिल्ली से हमदर्दी जताने लगे।
एक आदमी ने कहा, "अरे शेख भाई! बड़ा बुरा हुआ। तुम्हारी तो सारी जमा-पूंजी लुट गई।" दूसरे ने कहा, "बेचारा शेख! अब यह पैदल कैसे जाएगा?"
लोग सोच रहे थे कि शेख चिल्ली अभी ज़मीन पर बैठकर छाती पीट-पीट कर रोने लगेगा। लेकिन शेख चिल्ली ने जो किया, उसे देखकर वहाँ खड़े सभी लोगों की आँखें फटी की फटी रह गईं।
शेख चिल्ली रोने के बजाय, तुरंत ज़मीन पर अपने घुटनों के बल बैठ गया। उसने अपने दोनों हाथ आसमान की तरफ उठाए और बहुत ही खुशी और सुकून के साथ ज़ोर-ज़ोर से अल्लाह का शुक्रिया अदा करने लगा!
"या अल्लाह! तेरा लाख-लाख शुक्र है! तूने आज मुझ पर बहुत बड़ा करम किया है। हे परवरदिगार, मैं तेरा यह अहसान ज़िंदगी भर नहीं भूलूँगा!" शेख चिल्ली की आँखों में खुशी के आँसू थे।
भीड़ में खड़े लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। उन्हें लगा कि शायद सदमे के कारण शेख चिल्ली पागल हो गया है।
गाँव के सरपंच ने आगे बढ़कर शेख चिल्ली के कंधे पर हाथ रखा और पूछा: "अरे शेख! तेरा दिमाग तो ठीक है? तेरा इतना महँगा गधा चोरी हो गया है, तेरी सारी दौलत लुट गई है, और तू रोने के बजाय अल्लाह का शुक्र अदा कर रहा है? इसमें खुशी की क्या बात है?"
शेख चिल्ली ने अपनी जगह से उठते हुए, बहुत ही गहरी दार्शनिक मुस्कान के साथ सरपंच की तरफ देखा और एक ऐसा जवाब दिया जिसे सुनकर पूरी भीड़ लोट-पोट हो गई।
शेख चिल्ली ने कहा: "सरपंच जी! आप लोग सिर्फ मेरा गधा चोरी होने का दुख देख रहे हैं, लेकिन अल्लाह की उस बड़ी मेहरबानी को नहीं देख रहे जिसने आज मेरी जान बचा ली!"
सरपंच ने हैरानी से पूछा, "कैसी मेहरबानी? तेरी जान कैसे बच गई?"
शेख चिल्ली ने अपना सीना तानते हुए बहुत ही फख्र से जवाब दिया: "अरे सरपंच जी! मैं इसलिए अल्लाह का शुक्र अदा कर रहा हूँ क्योंकि जिस वक़्त उन चोरों ने मेरे गधे को चुराया, उस वक़्त मैं दुकान में जलेबियाँ खा रहा था। ज़रा सोचिए! अगर उस वक़्त 'मैं उस गधे के ऊपर बैठा होता', तो आज गधे के साथ-साथ 'मैं' भी चोरी हो जाता! फिर मेरी बेचारी अम्मी का क्या होता? अल्लाह का शुक्र है कि मैं गधे पर नहीं बैठा था और आज चोरी होने से बच गया!"
शेख चिल्ली का यह अद्भुत तर्क और उसकी सकारात्मक सोच देखकर लोग अपनी हँसी नहीं रोक पाए। पूरा बाज़ार ठहाकों से गूँज उठा और शेख चिल्ली खुशी-खुशी पैदल ही अपने घर की तरफ चल दिया, क्योंकि उसे यकीन था कि उसने आज अपनी जान बचा ली थी!
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