गधे की पढ़ाई — घमंडी विद्वान और घास की किताब

एक बार विजयनगर के दरबार में एक बहुत ही अक्खड़ और घमंडी विद्वान आया। उसने कई ग्रंथ और वेद पढ़े थे, परंतु उसे अपनी विद्या पर बहुत ज़्यादा घमंड था। उसने महाराज कृष्णदेवराय और अष्टदिग्गजों (विद्वानों) का मज़ाक उड़ाते हुए एक खुली चुनौती दी:
"महाराज! आपके दरबार के विद्वान तो बस साधारण किताबें बांचना जानते हैं। मेरी विद्या इतनी महान है कि मैं चाहूँ तो किसी भी मूर्ख जानवर को भी वेद और शास्त्र पढ़ा सकता हूँ! क्या आपके दरबार में कोई ऐसा है जो मेरी बराबरी कर सके?"
विजयनगर का अपमान होते देख तेनालीरामा तुरंत अपनी जगह से उठे और बोले: "विद्वान महोदय! इसमें कौन सी बड़ी बात है? जानवरों को पढ़ाना तो मेरे बाएं हाथ का खेल है। मैं तो पिछले एक महीने से एक गधे को शास्त्र पढ़ना सिखा रहा हूँ!"
घमंडी विद्वान ज़ोर से हंसा और बोला: "गधा और शास्त्र? तुम झूठ बोल रहे हो! अगर तुम यह साबित कर दो कि तुम्हारा गधा किताब पढ़ सकता है, तो मैं विजयनगर छोड़कर हमेशा के लिए चला जाऊँगा। और अगर नहीं कर पाए, तो तुम्हें मेरी गुलामी करनी होगी।"
महाराज ने तेनालीरामा को अगले दिन अपना 'पढ़ा-लिखा गधा' दरबार में लाने का आदेश दिया।
गधे का पठन-पाठन: अगले दिन सुबह, तेनालीरामा सचमुच एक गधे को लेकर राजदरबार में पहुँचे। उन्होंने दरबार के बीचों-बीच एक बहुत बड़ी और मोटी किताब रख दी।
तेनालीरामा ने गधे की रस्सी खोली और उसे किताब के पास ले गए। गधे ने मोटी किताब को देखा और तुरंत अपने जीभ से किताब के पन्ने पलटने लगा! वह एक-एक करके पन्ने पलटता, पन्नों के बीच गहराई से कुछ सूंघता, और फिर अगला पन्ना पलट देता।
जब गधे ने पूरी किताब के पन्ने पलट लिए, तो उसने अपना सिर ऊपर उठाया और बहुत ज़ोर-ज़ोर से रेंकना शुरू कर दिया— "ढेंचू! ढेंचू! ढेंचू!"
तेनालीरामा ने गर्व से मुस्कुराते हुए घमंडी विद्वान से कहा: "देखिए महोदय! मेरे गधे ने पूरी किताब पढ़ ली है और अब वह आपको वही शास्त्र पढ़कर 'सुना' भी रहा है!"
घमंडी विद्वान गुस्से में तिलमिला गया: "यह क्या मज़ाक है? गधा पन्ने पलट रहा था, इसका मतलब यह नहीं कि वह पढ़ रहा था! और यह तो रेंक रहा है, कोई श्लोक नहीं बोल रहा!"
तेनालीरामा ने हंसते हुए कहा: "विद्वान जी! गधा तो गधों की भाषा में ही शास्त्र सुनाएगा ना, वह इंसानों की भाषा में संस्कृत के श्लोक थोड़ी बोलेगा! रही बात पन्ने पलटने की, तो आप खुद आकर देख लीजिए कि उसने कैसे पढ़ा।"
विद्वान ने चिढ़कर ज़मीन से वह मोटी किताब उठाई। जैसे ही उसने किताब खोली, उसे सारी बात समझ आ गई।
दरअसल, तेनालीरामा ने पिछले दो-तीन दिनों से उस गधे को भूखा रखा था। वे रोज़ उस मोटी किताब के पन्नों के बीच 'हरी घास और चने' रखकर गधे को खाने को देते थे। गधे को पन्नों के बीच अपना खाना ढूंढने की आदत हो गई थी।
आज दरबार में किताब के पन्नों के बीच कोई घास नहीं थी। इसलिए गधा घास ढूंढने की उम्मीद में जीभ से पन्ने पलट रहा था, और जब उसे अंत तक कोई खाना नहीं मिला, तो वह भूख के मारे ज़ोर-ज़ोर से रेंकने लगा था!
यह सच्चाई जानकर घमंडी विद्वान हक्का-बक्का रह गया। वह समझ गया कि तेनालीरामा ने अपनी 'व्यावहारिक बुद्धि' से उसकी खोखली 'किताबी विद्या' को बुरी तरह मात दे दी है। उसने बिना कुछ कहे अपना सिर झुकाया और चुपचाप विजयनगर दरबार से चला गया। पूरा दरबार तेनालीरामा की इस अद्भुत तरकीब पर ठहाकों से गूंज उठा।
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