"घर का भेदी लंका ढाए"

'काल भैरव' नाम का एक बहुत ही खूँखार और अजेय डाकू था। उसका खौफ पूरे इलाके में फैला हुआ था। काल भैरव ने लूट-पाट करके बहुत खज़ाना जमा कर रखा था। पुलिस सालों से उसे पकड़ने की कोशिश कर रही थी, लेकिन वह कभी पुलिस के हाथ नहीं आता था।
इसका कारण यह था कि काल भैरव का छिपाने का अड्डा एक घने जंगल में 'झरने के पीछे बनी एक गुप्त गुफा' में था। इस गुफा का रास्ता पुलिस तो क्या, जंगल के परिंदों को भी नहीं पता था।
काल भैरव का एक छोटा सगा भाई था— 'शेरा'। काल भैरव शेरा से बहुत प्यार करता था और उस पर अपनी जान से भी ज़्यादा 'भरोसा' करता था। केवल शेरा ही था जो उस गुप्त गुफा का रास्ता और खज़ाने का राज़ जानता था।
लालच का ज़हर: पुलिस ने हार मानकर काल भैरव को पकड़वाने वाले के लिए 'एक लाख रुपये' के बहुत बड़े ईनाम की घोषणा कर दी।
जब शेरा ने इतने बड़े ईनाम के बारे में सुना, तो उसके मन में 'लालच' का ज़हर भर गया। उसने सोचा कि अगर वह अपने भाई को पुलिस के हवाले कर दे, तो ईनाम का पैसा भी उसका होगा और गुफा का सारा खज़ाना भी!
एक रात, शेरा छुपकर शहर गया और सीधे 'इंस्पेक्टर साहब' के पास पहुँच गया। उसने एक लाख रुपये के लालच में पुलिस को उस गुप्त गुफा का नक्शा और झरने के पीछे जाने का खुफिया रास्ता बता दिया।
विनाश और पर्दाफाश: उसी रात, काल भैरव अपनी गुफा में चैन की नींद सो रहा था। उसे लगा कि वह दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह पर है।
तभी अचानक गुफा के अंदर भारी बूटों की आवाज़ गूँजी— 'ठप... ठप... ठप!' इससे पहले कि काल भैरव अपनी बंदूक उठा पाता, पुलिस ने उसे चारों तरफ से घेर लिया।
"हथियार डाल दो काल भैरव! तुम चारों तरफ से घिर चुके हो!" इंस्पेक्टर ने बंदूक तानते हुए कहा।
काल भैरव सन्न रह गया। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ कि पुलिस यहाँ कैसे पहुँच गई। तभी उसने इंस्पेक्टर के पीछे अपने सगे भाई 'शेरा' को लालची आँखों से मुस्कुराते हुए और ईनाम के पैसों का बैग पकड़ते हुए देखा।
काल भैरव का दिल टूट गया। वह दहाड़ते हुए बोला: "शेरा! तूने अपने ही भाई के साथ गद्दारी की? मेरे अपनों ने ही मेरी पीठ में छुरा घोंपा!"
इंस्पेक्टर ने काल भैरव को हथकड़ी पहनाते हुए बहुत ही गंभीर आवाज़ में कहा: "काल भैरव! बाहर का कोई भी दुश्मन तुम्हारी इस सुरक्षित गुफा को कभी नहीं ढूँढ सकता था। तुम्हारा विनाश पुलिस ने नहीं, बल्कि तुम्हारे अपने सगे भाई के धोखे ने किया है। हमारे देश में सदियों से यह कहावत मशहूर है कि रावण की लंका भी राम ने नहीं, बल्कि उसके भाई विभीषण के राज़ बताने के कारण ही गिरी थी। इसीलिए कहते हैं— 'घर का भेदी... लंका ढाए!'"
काल भैरव अपने ही भाई के लालच के कारण हमेशा के लिए कालकोठरी में चला गया।
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