"जान बची तो लाखों पाए"

'व्यापार नगर' में 'सेठ धनीराम' नाम के एक बहुत ही बड़े व्यापारी रहते थे। सेठ जी के पास अपार दौलत थी, लेकिन वे दुनिया के सबसे बड़े 'कंजूस' इंसान थे। उन्हें अपनी जान से भी ज़्यादा अपने 'सोने-चाँदी' से प्यार था। अगर उनके हाथ से एक रुपया भी गिर जाता, तो वे उसे ढूँढने के लिए पूरे घर की खुदाई कर सकते थे।
एक बार सेठ धनीराम दूसरे शहर से व्यापार करके लौट रहे थे। उनकी बैलगाड़ी में 'सोने के सिक्कों और ज़ेवरों से भरा एक बहुत भारी संदूक' रखा था।
रात का समय था। बैलगाड़ी एक सुनसान और भयानक जंगल के बीच से गुज़र रही थी। सेठ जी अपने संदूक को कसकर गले से लगाए बैठे थे।
डाकुओं का हमला: तभी अचानक झाड़ियों में से खौफनाक आवाज़ें आईं और घोड़ों पर सवार कुछ बहुत ही खूँखार 'डाकुओं' ने बैलगाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया।
डाकुओं के सरदार ने अपनी चमकती हुई 'बड़ी सी तलवार' सीधे सेठ धनीराम की गर्दन पर रख दी— 'खचाक्!'
सरदार ने अपनी खुरदरी और डरावनी आवाज़ में चिल्लाकर कहा: "ऐ सेठ! चुपचाप यह सोने का संदूक हमारे हवाले कर दे, वरना एक सेकंड में तेरी गर्दन धड़ से अलग कर दूँगा!"
कंजूस का बदला हुआ रूप: आमतौर पर जो सेठ एक रुपया भी नहीं छोड़ता था, आज अपनी गर्दन पर ठंडी और नंगी तलवार महसूस करते ही उसके पसीने छूट गए। सेठ जी के घुटने काँपने लगे और उन्हें अपनी आँखों के सामने अपनी मौत नाचती हुई दिखाई देने लगी।
सेठ जी ने एक सेकंड भी नहीं सोचा। दौलत का सारा प्यार हवा हो गया। उन्होंने तुरंत वह 'सोने से भरा भारी संदूक' अपने हाथों से डाकू सरदार की तरफ बढ़ा दिया और रोते हुए हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगे: "मालिक! यह सारा सोना आप रख लीजिए। मेरे कपड़े और बैलगाड़ी भी ले जाइए, बस मुझे मत मारिए! मुझे ज़िंदा छोड़ दीजिए!"
डाकू सरदार ने संदूक लिया और ज़ोर-ज़ोर से हँसते हुए अपने साथियों के साथ जंगल में गायब हो गया।
सेठ धनीराम खाली हाथ, रोते और काँपते हुए अपने घर पहुँचे। जब सेठ जी की पत्नी ने देखा कि सारा सोना लुट गया है और सेठ जी खाली हाथ लौटे हैं, तो वह छाती पीट-पीट कर रोने लगी: "हाय रे! हमारा सारा खज़ाना लुट गया! हम तो बर्बाद हो गए जी!"
सेठ धनीराम ने लंबी राहत की साँस ली। उन्होंने अपनी पत्नी को शांत करते हुए कहा: "अरे भाग्यवान! रोना बंद कर। दौलत का क्या है, वह तो कल फिर कमा लूँगा। अगर आज उस डाकू की तलवार मेरी गर्दन काट देती, तो वह सोना मेरे किस काम आता? जब मैं मौत के मुँह में था, तब मुझे समझ आया कि इस दुनिया में साँसों से महँगी कोई दौलत नहीं है। मैं ज़िंदा अपने घर आ गया, मेरे लिए यही सबसे बड़ा खज़ाना है। सच ही कहा गया है— 'जान बची... तो लाखों पाए!'"
यह सुनकर सेठानी भी शांत हो गई और उन्होंने भगवान का शुक्रिया अदा किया कि उनके पति की जान सुरक्षित बच गई।
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