हिन्दी कहानियाँ
📖 मुहावरों की कहानियाँ

"घर की मुर्गी दाल बराबर"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"घर की मुर्गी दाल बराबर"

'हरिपुर' गाँव में एक बहुत ही ज्ञानी और बूढ़े 'वैद्य जी' रहते थे, जिनका नाम था 'पंडित दीनानाथ'। दीनानाथ जी नाड़ी देखकर ही इंसान की बड़ी से बड़ी बीमारी पकड़ लेते थे। उनका इलाज इतना अचूक था कि जड़ी-बूटियों की एक खुराक से ही बीमार आदमी दौड़ने लगता था।

सबसे बड़ी बात यह थी कि वे गाँव वालों से इलाज का कोई पैसा नहीं लेते थे। वे चौपाल पर पेड़ के नीचे बैठते और मुफ्त में सबको दवा देते थे।

लेकिन, गाँव वालों की मानसिकता बहुत अजीब थी। चूँकि दीनानाथ जी गाँव के ही थे, सादे कपड़े पहनते थे और मुफ्त में दवा देते थे, इसलिए गाँव वाले उन्हें बहुत 'मामूली' इंसान समझते थे। उन्हें लगता था कि जो चीज़ मुफ्त और गाँव में मिल रही है, वह अच्छी कैसे हो सकती है?

शहर के डॉक्टर का दिखावा: उसी गाँव में 'रमेश' नाम का एक पैसे वाला किसान रहता था। एक दिन रमेश के इकलौते बेटे के पूरे शरीर पर लाल रंग के बहुत ही अजीब और डरावने चकत्ते (Rashes) निकल आए। बेटा बुखार से तपने लगा।

रमेश की पत्नी ने रोते हुए कहा: "जी सुनते हो! जल्दी से पंडित दीनानाथ जी को बुला लाओ, वे कोई जड़ी-बूटी दे देंगे।"

रमेश ने बहुत ही घमंड और लापरवाही से मुँह बनाते हुए कहा: "अरे पागल हो गई है क्या? मेरा इकलौता बेटा है, और मैं उसका इलाज इस गाँव के मामूली वैद्य से कराऊँगा जो पेड़ के नीचे मुफ़्त में बैठता है? उसे क्या आता होगा! मैं अपने बेटे को शहर के सबसे बड़े और महँगे अस्पताल में 'डॉक्टर साहब' को दिखाऊँगा।"

रमेश अपने बीमार बेटे को बैलगाड़ी में डालकर शहर ले गया। शहर के डॉक्टर ने महँगा सूट पहना हुआ था। उसने रमेश से 'एक हज़ार रुपये' फीस ली और बहुत सारी रंग-बिरंगी महँगी अंग्रेज़ी दवाइयाँ लिख दीं।

रमेश बहुत खुश हुआ कि उसने शहर के बड़े डॉक्टर से इलाज कराया है।

असलियत का अहसास: लेकिन तीन दिन बीत जाने के बाद भी, शहर की उन महँगी और रंग-बिरंगी दवाइयों का रमेश के बेटे पर कोई असर नहीं हुआ। बल्कि उसका बुखार और भी तेज़ हो गया और बच्चा बेहोश होने लगा। शहर के डॉक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिए कि यह बीमारी उनकी समझ से बाहर है।

रमेश फूट-फूट कर रोने लगा। वह अपने मरणासन्न बेटे को लेकर वापस गाँव आया। जब वह रोता हुआ अपनी गली से गुज़र रहा था, तब पंडित दीनानाथ (वैद्य जी) वहाँ से निकले।

वैद्य जी ने बच्चे की हालत देखी। उन्होंने रमेश से कुछ नहीं पूछा, बस बच्चे की कलाई पकड़कर उसकी नाड़ी देखी। वैद्य जी तुरंत अपने घर गए और 'नीम, तुलसी और एक खास जंगली जड़' को पीसकर एक लेप बनाया और बच्चे के शरीर पर मल दिया। साथ ही एक काढ़ा बच्चे के मुँह में डाल दिया।

चमत्कार यह हुआ कि लेप लगते ही केवल 'दो घंटे के अंदर' बच्चे का बुखार उतर गया और उसके शरीर के सारे लाल चकत्ते गायब होने लगे। बच्चा आँखें खोलकर बैठ गया।

रमेश को अपनी बहुत बड़ी भूल का अहसास हुआ। वह वैद्य जी के पैरों में गिरकर रोने लगा: "मुझे माफ़ कर दीजिए वैद्य जी! मैंने आपके ज्ञान का अपमान किया। मैंने हज़ारों रुपये शहर में बर्बाद कर दिए, जबकि मेरी जान बचाने वाला 'भगवान' तो मेरे अपने गाँव में ही बैठा था।"

गाँव के सरपंच जी वहाँ खड़े यह सब देख रहे थे। उन्होंने रमेश को उठाते हुए कहा: "रमेश! तुमने दिखावे के चक्कर में अपने ही गाँव के सबसे बड़े विद्वान की कद्र नहीं की। इंसान की फितरत ही ऐसी होती है कि जो चीज़ उसके पास आसानी से मौजूद हो, वह उसे बेकार समझता है। सच ही कहा गया है— 'घर की मुर्गी, दाल बराबर!'" (यानी घर में पकी हुई महँगी मुर्गी भी इंसान को रोज़ खाई जाने वाली मामूली दाल जैसी ही लगती है)।

उस दिन के बाद पूरे गाँव ने पंडित दीनानाथ जी का बहुत सम्मान करना शुरू कर दिया।

🎉 कहानी समाप्त

📖 मुहावरों की कहानियाँ की और कहानियाँ

📖 मुहावरों की कहानियाँ5 मिनट

"नाच न जाने आँगन टेढ़ा"

अपनी कमी छिपाने के लिए दूसरों पर या परिस्थितियों पर दोष मढ़ना।

पढ़ें →
📖 मुहावरों की कहानियाँ5 मिनट

"अंधों में काना राजा"

मूर्खों के बीच थोड़ा सा पढ़ा-लिखा या ज्ञानी इंसान भी बहुत महान माना जाता है।

पढ़ें →
📖 मुहावरों की कहानियाँ5 मिनट

"अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत"

समय निकल जाने के बाद पछताने से या रोने से कोई फायदा नहीं होता, इसलिए हर काम समय पर करना चाहिए।

पढ़ें →
📖 मुहावरों की कहानियाँ5 मिनट

"जिसकी लाठी उसकी भैंस"

जिसके पास ताक़त या सत्ता होती है, जीत उसी की होती है और उसी का कब्ज़ा मान लिया जाता है।

पढ़ें →
📖 मुहावरों की कहानियाँ5 मिनट

"बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"

मूर्ख या अज्ञानी इंसान किसी मूल्यवान या गुणवान चीज़ की कद्र नहीं कर सकता, क्योंकि उसे उसकी परख नहीं होती।

पढ़ें →
📖 मुहावरों की कहानियाँ5 मिनट

"थोथा चना बाजे घना"

'थोथा' मतलब खाली। जिस इंसान में गुण या ज्ञान कम होता है, वह अपनी अहमियत दिखाने के लिए दिखावा बहुत ज़्यादा करता है और बहुत बड़ी-बड़ी डिंगें मारता है।

पढ़ें →