"रस्सी जल गई पर ऐंठन नहीं गई"

'नवाबगंज' नाम के एक कस्बे में 'नवाब शौकत अली' रहते थे। एक ज़माने में उनके दादा-परदादा बहुत अमीर हुआ करते थे। उनकी बड़ी सी हवेली थी और कई नौकर-चाकर थे। लेकिन शौकत अली ने कोई काम-धंधा नहीं किया और अपना सारा खानदानी पैसा जुए और अय्याशी में उड़ा दिया।
अब हालत यह थी कि नवाब शौकत अली पूरी तरह से 'कंगाल' हो चुके थे। उनकी हवेली खँडहर बन चुकी थी, घर में खाने को दाने नहीं थे, और उन पर गाँव के बनियों का बहुत सारा कर्ज़ा था।
लेकिन नवाब साहब का 'घमंड और अकड़' बिल्कुल नहीं गया था!
वे आज भी फटे हुए रेशमी कपड़े पहनते, सिर पर पुरानी मुड़ी हुई टोपी रखते और अपनी मूँछों पर ताव देते हुए बाज़ार में ऐसे चलते जैसे आज भी पूरे कस्बे के मालिक वही हों। अगर कोई उन्हें 'शौकत भाई' कह देता, तो वे आग-बबूला हो जाते और कहते: "तमीज़ से बात कर! मैं नवाब शौकत अली हूँ, मेरे सामने नज़रें झुका कर बात किया कर।"
दावत का दिखावा: एक दिन कस्बे के सबसे अमीर व्यापारी 'सेठ धनीराम' की बेटी की शादी थी। सेठ जी ने पूरे कस्बे को दावत पर बुलाया था।
नवाब शौकत अली भी अपनी फटी हुई शेरवानी पहनकर, सीना तानकर दावत में पहुँच गए। उन्होंने कई दिनों से पेट भर खाना नहीं खाया था और उनके पेट में चूहे कूद रहे थे।
पंगत (Line) लगी हुई थी। लोग ज़मीन पर बैठकर खुशी-खुशी 'पूड़ी, सब्ज़ी और दाल' खा रहे थे। सेठ धनीराम ने नवाब साहब की खस्ता हालत देखकर तरस खाते हुए उनसे कहा: "आइए नवाब साहब! यहाँ ज़मीन पर बैठ जाइए, मैं आपको गरम-गरम पूड़ियाँ और दाल परोसता हूँ।"
झूठा घमंड और भूख: 'ज़मीन पर बैठने' और 'दाल-पूड़ी' का नाम सुनते ही नवाब शौकत अली का झूठा अहंकार भड़क उठा। हालाँकि वे भूख से काँप रहे थे, फिर भी उन्होंने ज़ोर से मुँह बनाते हुए और नाक सिकोड़ते हुए कहा:
"क्या कहा सेठ? मैं ज़मीन पर बैठूँ? और यह मामूली दाल-पूड़ी खाऊँ? तौबा-तौबा! हम नवाब लोग हैं। हम जब तक चाँदी के थाल में 'शाही पुलाव, मुर्ग मुसल्लम और ज़र्दा' न परोसा जाए, हम निवाला तक नहीं तोड़ते। यह गरीबों का खाना तुम ही खाओ!"
यह कहकर नवाब शौकत अली ने ज़ोर से अपना कॉलर झटका और हवेली के दरवाज़े से बाहर निकल गए।
दावत में बैठे सारे लोग उनकी इस मूर्खता पर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। नवाब साहब बाहर जाकर एक अँधेरी गली में भूख के मारे अपना पेट पकड़कर बैठ गए।
तभी सेठ धनीराम के मुनीम ने हँसते हुए गाँव वालों से कहा: "अरे भाइयो! नवाब साहब की हालत तो देखो। जेब में एक फूटी कौड़ी नहीं है, घर की छत गिर चुकी है, भूख से पेट पीठ से लगा है, लेकिन नवाबी की अकड़ देखो, ज़रा भी कम नहीं हुई! इनकी हालत तो बिल्कुल उस पुरानी रस्सी जैसी हो गई है जो आग में पूरी तरह जलकर राख हो जाती है, लेकिन फिर भी उसमें 'बल' वैसा का वैसा ही रहता है। सच ही कहा है— 'रस्सी जल गई, पर ऐंठन नहीं गई!'"
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