"हाथ कंगन को आरसी क्या"

'दंगलपुर' गाँव में हर साल सावन के महीने में एक बहुत बड़ा कुश्ती का दंगल होता था। इस बार दंगल में शहर से एक नया पहलवान आया था, जिसका नाम था 'शेरा'। शेरा का शरीर बहुत तगड़ा था, लेकिन उसकी ज़ुबान उसके शरीर से भी ज़्यादा चलती थी। वह एक नंबर का 'बड़बोला' इंसान था।
दंगल शुरू होने से पहले ही शेरा अखाड़े के बीचों-बीच खड़ा हो गया। उसने अपनी जाँघों पर ज़ोर से ताल ठोंकी— 'थपाक्!' और माइक हाथ में लेकर पूरे गाँव के सामने डिंगें मारने लगा।
"अरे गाँव वालो! आज मैं तुम्हें अपनी ताक़त का ऐसा जलवा दिखाऊँगा कि तुम दाँतों तले उँगली दबा लोगे। मैं चाहूँ तो चलती हुई रेलगाड़ी को एक हाथ से रोक दूँ! इस गाँव का जो भी पहलवान मेरे सामने आएगा, मैं उसे आसमान में उछाल कर चटनी बना दूँगा! किसी में है हिम्मत?"
शांत पहलवान की एंट्री: शेरा की यह बड़ी-बड़ी बातें सुनकर गाँव का एक बहुत ही सीधा-सादा, लेकिन लोहे जैसे गठीले शरीर वाला पहलवान अखाड़े में उतरा। उसका नाम था 'भीमा'।
भीमा स्वभाव से बहुत ही 'शांत' था। वह किसी से फालतू बात नहीं करता था। शेरा ने जब भीमा को देखा, तो वह हँसते हुए उसका मज़ाक उड़ाने लगा: "अरे भीमा! तू मुझसे लड़ेगा? जा पहले दूध पीकर आ। मैं तो बस एक फूँक मारूँगा और तू उड़ जाएगा!"
भीमा ने शेरा की किसी भी बकवास का कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस शांति से अखाड़े की मिट्टी उठाई, अपने माथे पर लगाई और कुश्ती की मुद्रा में खड़ा हो गया।
प्रत्यक्ष प्रमाण: सरपंच जी ने सीटी बजाई— 'पीऽऽऽ!'
सीटी बजते ही शेरा ज़ोर से चिल्लाता हुआ भीमा की तरफ दौड़ा। लेकिन भीमा बिल्कुल अपनी जगह पर अटल खड़ा रहा। जैसे ही शेरा पास आया, भीमा ने बिजली की फुरती से शेरा का हाथ पकड़ा, अपना पैर उसके पैरों के बीच फँसाया और एक ज़ोरदार 'धोबी-पछाड़' दाँव लगाया!
हवा में डिंगें मारने वाला शेरा एक ही सेकंड में हवा में उछला और पीठ के बल सीधे ज़मीन पर आ गिरा— 'धड़ाम!'
अखाड़े की धूल उड़ने लगी। शेरा की कमर में ऐसा दर्द उठा कि वह उठ ही नहीं पाया। उसकी सारी बड़ी-बड़ी बातें एक ही सेकंड में हवा हो गईं। पूरा गाँव भीमा की इस ज़बरदस्त ताक़त को देखकर सन्न रह गया और फिर ज़ोरदार तालियाँ बजने लगीं।
सरपंच जी ने हँसते हुए माइक हाथ में लिया और कहा: "अरे शेरा! तू तो कह रहा था कि तू रेलगाड़ी रोक देगा, लेकिन तू तो एक दाँव नहीं रोक पाया। भीमा ने एक भी शब्द नहीं कहा, लेकिन उसकी 'ताक़त' सबके सामने प्रत्यक्ष है। जब सच्चाई बिल्कुल सामने दिखाई दे रही हो, तो किसी सबूत या बड़ी बातों की क्या ज़रूरत? हमारे यहाँ कहते हैं— 'हाथ कंगन को आरसी क्या, और पढ़े-लिखे को फारसी क्या!'"
शेरा शर्म के मारे अपना मुँह छिपाता हुआ अखाड़े से खिसक गया और भीमा बिना कुछ बोले विजेता बन गया।
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