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भाग 23: हनुमान जी की महा-उड़ान, मार्ग की तीन बाधाएं और लंका दर्शन

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 23: हनुमान जी की महा-उड़ान, मार्ग की तीन बाधाएं और लंका दर्शन

महेंद्र पर्वत की सबसे ऊंची चोटी पर खड़े होकर, पवनपुत्र हनुमान ने एक बार अपने दोनों हाथ जोड़कर अयोध्या की दिशा में प्रणाम किया और हृदय में अपने आराध्य श्रीराम का स्मरण किया। उनका शरीर अब सुमेरु पर्वत के समान अत्यंत विशाल और भयंकर हो चुका था। उनके शरीर के रोएं स्वर्ण के समान चमक रहे थे और उनकी लंबी पूंछ आकाश में किसी विशाल अजगर की भांति लहरा रही थी।

हनुमान जी ने समुद्र लांघने के लिए जब अपने पैरों से महेंद्र पर्वत को दबाया, तो उस कठोर प्रहार से वह विशाल पर्वत थर्रा उठा। पर्वत की चट्टानें टूट-टूट कर गिरने लगीं, वहां सो रहे भयंकर जंगली जानवर भय से चीखने लगे और पर्वत पाताल की ओर धंसने लगा। एक भयंकर गर्जना के साथ, हनुमान जी ने आकाश में छलांग लगा दी।

उनके उड़ने का वेग इतना तीव्र था कि महेंद्र पर्वत पर उगे हुए बड़े-बड़े पेड़ जड़ों से उखड़कर उनके पीछे-पीछे मीलों तक आकाश में उड़ने लगे, मानो वे पेड़ भी उनके साथ लंका जाना चाहते हों। कुछ दूर जाने के बाद वे पेड़ समुद्र में गिर पड़े। हनुमान जी जब बादलों के बीच से उड़ रहे थे, तो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो साक्षात गरुड़ देव या भगवान राम का कोई स्वर्ण बाण समुद्र को चीरता हुआ जा रहा हो।

परंतु, इस महान और पवित्र यात्रा में बाधाएं आना भी निश्चित था। हनुमान जी को समुद्र पार करते समय तीन अत्यंत भिन्न प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ा, जो जीवन के तीन बड़े परीक्षणों—सुख, परीक्षा और छल—का प्रतीक थीं।

पहली बाधा: मैनाक पर्वत (सुख और विश्राम का प्रलोभन) हनुमान जी को बिना थके उड़ते देख, समुद्र देव (वरुण) के मन में श्रीराम के प्रति भक्ति जागी। समुद्र ने अपने भीतर छिपे 'मैनाक' नामक स्वर्ण पर्वत से कहा, "हे मैनाक! राम के दूत हनुमान बिना विश्राम किए जा रहे हैं। तुम जल से बाहर निकलो और उन्हें अपनी चोटी पर थोड़ा विश्राम करने दो।" (मैनाक पर्वत के पंख थे, और जब इंद्र पर्वतों के पंख काट रहे थे, तब पवन देव ने मैनाक को समुद्र में छिपाकर बचाया था। इसलिए वह हनुमान जी का ऋणी था)।

जल को चीरता हुआ स्वर्णमयी मैनाक पर्वत आकाश की ओर उठा और उसने हनुमान जी से प्रार्थना की, "हे पवनपुत्र! कृपया मेरी चोटी पर उतरें, कुछ फल खाएं और विश्राम करें।"

हनुमान जी ने उस अत्यंत सुंदर और सुखदायी पर्वत को देखा। परंतु उनके मन में विश्राम का कोई विचार नहीं था। उन्होंने क्रोध नहीं किया, बल्कि अत्यंत आदरपूर्वक अपने हाथ से मैनाक पर्वत को छुआ (स्पर्श किया) और कहा, "हे पर्वतराज! आपके आतिथ्य के लिए धन्यवाद, परंतु मेरे प्रभु श्रीराम का कार्य अभी अधूरा है। जब तक मैं सीता माता को खोज नहीं लेता, तब तक मेरे जीवन में विश्राम का कोई स्थान नहीं है।" (राम काज कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम)। यह कहकर वे आगे बढ़ गए।

दूसरी बाधा: सुरसा (बुद्धि और अहंकार की परीक्षा) हनुमान जी की गति देखकर देवलोक में देवता विचार करने लगे कि क्या हनुमान में सचमुच इतनी बुद्धि और बल है कि वे रावण से पार पा सकें? इसकी परीक्षा लेने के लिए देवताओं ने नागों की माता 'सुरसा' को भेजा।

सुरसा ने समुद्र के बीच में एक अत्यंत भयंकर राक्षसी का रूप धरकर हनुमान जी का रास्ता रोक लिया और कहा, "आज देवताओं ने मुझे मेरा भोजन भेजा है। मैं तुम्हें खाऊँगी।"

हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा, "हे माता! मैं राम के कार्य से जा रहा हूँ। सीता माता का पता लगाकर मैं स्वयं तुम्हारे मुख में आ जाऊँगा, यह मेरा वचन है।" परंतु सुरसा नहीं मानी।

तब हनुमान जी ने अपना बल दिखाना आरंभ किया। सुरसा ने अपना मुख एक योजन (लगभग 8 मील) चौड़ा किया। हनुमान जी ने अपना शरीर दो योजन का कर लिया। सुरसा ने अपना मुख दस योजन किया, हनुमान जी बीस योजन के हो गए। देखते ही देखते सुरसा ने अपना मुख सौ योजन (800 मील) चौड़ा कर लिया, जिससे पूरा आकाश ढक गया।

तब हनुमान जी ने अपने बल के स्थान पर अपनी 'बुद्धि' का प्रयोग किया। उन्होंने अचानक अपना वह विशाल शरीर समेटा और एक छोटे से मच्छर (मशक) के समान अति सूक्ष्म रूप धारण कर लिया। इससे पहले कि सुरसा कुछ समझ पाती, मच्छर रूपी हनुमान जी सुरसा के उस विशाल मुख में घुसे और पलक झपकते ही बाहर आ गए।

बाहर आकर हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा, "माता! मैंने आपकी शर्त पूरी कर दी, अब मुझे जाने दें।" सुरसा हनुमान जी के इस अद्भुत बल और बुद्धि के समन्वय को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई। उसने उन्हें आशीर्वाद दिया और देवलोक लौट गई।

तीसरी बाधा: सिंहिका (अदृश्य छल और मृत्यु) सुरसा की परीक्षा पार करने के बाद हनुमान जी और आगे बढ़े। तभी अचानक उन्हें लगा कि जैसे हवा में उनकी गति किसी ने रोक दी है। वे अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी आगे नहीं बढ़ पा रहे थे।

उन्होंने नीचे समुद्र की ओर देखा। वहां जल की सतह पर 'सिंहिका' नाम की एक अत्यंत भयंकर और क्रूर राक्षसी थी। सिंहिका को यह मायावी वरदान प्राप्त था कि वह आकाश में उड़ने वाले किसी भी पक्षी या जीव की पानी पर पड़ने वाली परछाई (छाया) को पकड़ लेती थी। परछाई पकड़ते ही वह जीव लकवाग्रस्त होकर सीधे उसके मुँह में आ गिरता था। सिंहिका ने हनुमान जी की परछाई को पकड़ लिया था।

हनुमान जी समझ गए कि यह कोई परीक्षा नहीं, बल्कि साक्षात मृत्यु है जिसे सुग्रीव ने बताया था (छायाग्राही राक्षसी)। हनुमान जी ने एक क्षण की भी देरी नहीं की। उन्होंने तुरंत अपना शरीर पुनः अत्यंत विशाल किया और सीधे आसमान से गोता लगाते हुए सिंहिका के फैले हुए भयंकर मुख में प्रवेश कर गए।

सिंहिका के पेट में पहुँचकर हनुमान जी ने अपने वज्र के समान कठोर नाखूनों और हाथों से उसके हृदय और आंतों को चीर डाला। सिंहिका भयंकर चीत्कार करती हुई समुद्र के जल में प्राण त्याग कर डूब गई और हनुमान जी उसका पेट फाड़कर वापस आकाश में उड़ चले।

लंका दर्शन: इन तीनों बाधाओं को पार करने के पश्चात, अंततः हनुमान जी समुद्र के दूसरे छोर पर पहुँच गए। सामने 'त्रिकूट पर्वत' की तीन विशाल चोटियां थीं, जिन पर रावण की विश्व-प्रसिद्ध 'स्वर्ण लंका' बसी हुई थी।

हनुमान जी एक पहाड़ी पर उतरे और दूर से लंका का निरीक्षण करने लगे। लंका का वर्णन करते हुए वाल्मीकि जी लिखते हैं कि वह नगरी साक्षात इंद्र की अमरावती को मात देती थी। वहां के महल ठोस सोने के बने थे, जिनमें हीरे और नीलम जड़े हुए थे। नगर के चारों ओर एक अत्यंत गहरी खाई थी और उसके बाहर एक अभेद्य स्वर्ण परकोटा (किले की दीवार) था। हर द्वार पर भयंकर अस्त्र-शस्त्र लिए विशालकाय राक्षस पहरा दे रहे थे।

हनुमान जी ने विचार किया, "यदि मैं इस विशाल वानर रूप में अंदर गया, तो राक्षस मुझे देख लेंगे और युद्ध छिड़ जाएगा। मेरा उद्देश्य युद्ध करना नहीं, बल्कि गुप्त रूप से सीता माता को खोजना है।"

यह सोचकर हनुमान जी ने सूर्यास्त होने की प्रतीक्षा की। जब रात का अंधकार लंका पर छा गया, तब पवनपुत्र हनुमान ने योगबल से अपना शरीर समेटकर एक छोटी सी बिल्ली (या मच्छर) के समान अति सूक्ष्म रूप (सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा) धारण कर लिया।

इस अत्यंत छोटे और साधारण रूप में, वे बिना किसी की नजर में आए, उस अजेय और खूंखार नगरी लंका के मुख्य द्वार की ओर छिपते-छिपाते बढ़ने लगे।

🎉 कहानी समाप्त

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