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भाग 22: सागर तट पर वानरों का मंथन और हनुमान जी की शक्तियों का जागरण

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 22: सागर तट पर वानरों का मंथन और हनुमान जी की शक्तियों का जागरण

गिद्धराज संपाती ने अपनी दिव्य दृष्टि से यह तो बता दिया कि माता सीता सौ योजन (लगभग 800 मील) दूर समुद्र के उस पार लंका में हैं, परंतु इसके साथ ही एक ऐसी भयंकर समस्या खड़ी हो गई जिसका समाधान किसी के पास नहीं था। सौ योजन का वह विशाल और उफनता हुआ दक्षिण सागर वानरों के सामने काल के समान गर्जना कर रहा था। उसकी लहरें आकाश को छू रही थीं और भयंकर समुद्री जीव जल की सतह पर तैर रहे थे।

संपाती अपने भाई जटायु का तर्पण करके विदा हो गए। अब वानर सेना उस अथाह समुद्र के किनारे बैठ गई। युवराज अंगद ने सभी सेनापतियों को बुलाया और एक अत्यंत गंभीर प्रश्न किया: "हे वानर वीरों! सीता माता का पता तो चल गया, परंतु इस सौ योजन के भयंकर समुद्र को लांघकर लंका कौन जाएगा? और कौन वहां से जीवित वापस आ सकेगा?"

यह सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया। कोई भी वानर तुरंत उत्तर देने का साहस नहीं कर सका। अंततः सेनापतियों ने अपनी-अपनी क्षमताएं बतानी शुरू कीं। गय नामक वानर ने कहा कि वह 10 योजन कूद सकता है। गवाक्ष ने कहा कि वह 20 योजन तक जा सकता है। शरभ ने 30 योजन और सुषेण ने 40 योजन कूदने की क्षमता बताई। इसी प्रकार अन्य वानरों ने 50, 60 और 70 योजन तक जाने की बात कही। परंतु सौ योजन का लक्ष्य किसी के बस का नहीं लग रहा था।

तब भालुओं के राजा, अत्यंत वृद्ध और ज्ञानी 'जाम्बवंत' आगे आए। उन्होंने कहा, "हे अंगद! जब मैं युवा था, तब मुझमें असीम बल था। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी थी और अपना शरीर ब्रह्मांड के बराबर कर लिया था, तब मैंने केवल कुछ ही क्षणों में उनके उस विशाल शरीर की सात परिक्रमाएं कर ली थीं। परंतु अब मैं अत्यंत वृद्ध हो चुका हूँ। मेरा शरीर अब यह सौ योजन की छलांग नहीं लगा सकता।"

अंत में युवराज अंगद ने अत्यंत आत्मविश्वास के साथ कहा, "मैं सौ योजन के इस समुद्र को पार करके लंका जा तो सकता हूँ, परंतु मुझे इस बात में संशय है कि लौटते समय मुझमें इतनी शक्ति बचेगी या नहीं।"

जाम्बवंत ने तुरंत अंगद को रोकते हुए कहा, "हे युवराज! आप हमारी सेना के नेता हैं, हमारे स्वामी हैं। आप में क्षमता है, यह सत्य है, परंतु एक राजा या युवराज को अपनी जान जोखिम में डालकर दूत का कार्य नहीं करना चाहिए। यदि आपको कुछ हो गया, तो यह पूरी सेना बिखर जाएगी। आप यहीं रहें, मैं इसका कोई उपाय निकालता हूँ।"

यह कहते हुए जाम्बवंत की दृष्टि अचानक दूर एक चट्टान पर गई, जहाँ पवनपुत्र हनुमान अत्यंत शांत, मौन और सिर झुकाए बैठे थे। सभा में इतना बड़ा विचार-विमर्श चल रहा था, परंतु हनुमान जी ने एक शब्द भी नहीं कहा था।

जाम्बवंत मुस्कुराए। वे जानते थे कि हनुमान जी मौन क्यों हैं। जाम्बवंत हनुमान जी के पास गए और उन्होंने अत्यंत ओजस्वी और प्रेरणादायक स्वर में कहा:

"का चुप साधि रहेहु बलवाना? पवन तनय बल पवन समाना।" (अर्थात: हे बलवान हनुमान! तुम इस प्रकार चुप क्यों बैठे हो? तुम तो पवन देव के पुत्र हो और तुम्हारा बल पवन के समान ही असीम है।)

जाम्बवंत ने हनुमान जी को उनके बचपन और उनकी शक्तियों की वह कथा याद दिलाई, जिसे एक श्राप के कारण हनुमान जी भूल चुके थे।

जाम्बवंत ने कहा, "हे हनुमान! याद करो अपना जन्म। तुम वानरराज केसरी और माता अंजना के पुत्र हो। तुम स्वयं भगवान शिव के रुद्रावतार हो! तुम्हारे भीतर ब्रह्मांड की सबसे बड़ी शक्ति निवास करती है। क्या तुम्हें याद नहीं जब तुम छोटे से बालक थे, तब तुमने उगते हुए सूर्य को कोई मीठा फल समझ लिया था और एक ही छलांग में अंतरिक्ष को पार करके सूर्य देव को अपने मुख में रख लिया था? उस समय तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था।"

जाम्बवंत आगे बोले, "तुम्हें रोकने के लिए देवराज इंद्र ने तुम पर अपने सबसे कठोर अस्त्र 'वज्र' से प्रहार किया था, जिससे तुम्हारी ठुड्डी (हनु) टूट गई थी और तुम धरती पर गिर पड़े थे। परंतु तुम्हारे पिता पवन देव के क्रोध के कारण सभी देवताओं को झुकना पड़ा। ब्रह्मा जी ने तुम्हें वरदान दिया था कि ब्रह्मास्त्र भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। भगवान शिव ने तुम्हें अजेय होने का वरदान दिया, और इंद्र ने कहा कि भविष्य में वज्र भी तुम पर बेअसर होगा।"

"परंतु हे हनुमान," जाम्बवंत ने गंभीरता से कहा, "बचपन में अपनी इन शक्तियों के कारण तुम बहुत चंचल हो गए थे। तुम ऋषि-मुनियों के आश्रमों में जाकर उनके कमंडल फेंक देते और उनके यज्ञ नष्ट कर देते थे। तुम्हारी इस चंचलता से क्रोधित होकर महर्षि भृगु और अंगिरा ने तुम्हें यह श्राप दिया था कि तुम अपने इस असीम बल को भूल जाओगे। तुम्हारा बल तुम्हारे भीतर ही सुप्त (सोया हुआ) रहेगा। परंतु महर्षियों ने यह भी कहा था कि जब भी कोई तुम्हें तुम्हारे वास्तविक बल का स्मरण कराएगा, तो तुम्हारी सारी शक्तियां करोड़ गुना होकर वापस लौट आएंगी!"

जाम्बवंत ने अंत में अत्यंत उच्च स्वर में सिंहनाद करते हुए कहा, "राम काज लगि तव अवतारा! सुनतहिं भयउ पर्बताकारा।" (अर्थात: हे हनुमान! तुम्हारा तो अवतार ही श्रीराम के कार्य के लिए हुआ है! उठो और अपने बल को पहचानो!)

'श्रीराम का कार्य'—यह शब्द सुनते ही हनुमान जी के भीतर सोया हुआ वह दिव्य और अनंत बल अचानक जागृत हो उठा। उनके भीतर एक अद्भुत ऊर्जा का संचार हुआ। उनका शरीर, जो अब तक एक साधारण वानर के समान था, वह अचानक बढ़ने लगा। देखते ही देखते हनुमान जी का शरीर एक अत्यंत विशाल और ऊंचे पर्वत (सुमेरु पर्वत) के समान विशालकाय हो गया।

हनुमान जी के शरीर से स्वर्ण के समान दिव्य तेज निकलने लगा। उनकी आंखें लाल हो गईं। उन्होंने अपना एक पैर चट्टान पर जोर से मारा, जिससे वह पूरी चट्टान पाताल में धंस गई। हनुमान जी ने बादलों की गर्जना को चीरते हुए ऐसा भयंकर सिंहनाद किया कि समुद्र की लहरें भी पीछे हट गईं और वानर सेना भय से कांप उठी।

हनुमान जी ने गरजते हुए कहा, "हे जाम्बवंत! मेरा बल लौट आया है। अब मैं इस विशाल समुद्र को एक छोटी सी नाली के समान लांघ जाऊँगा। यदि आप आज्ञा दें, तो मैं त्रिकूट पर्वत को उखाड़कर रावण सहित पूरी लंका को ही समुद्र में डुबो दूँ! या रावण को बांधकर राम के चरणों में डाल दूँ!"

जाम्बवंत ने गदगद होकर उन्हें शांत करते हुए कहा, "हे वीर! तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं है। परंतु श्रीराम की आज्ञा केवल सीता माता को खोजने की है। तुम केवल लंका जाओ, माता सीता को खोजो, उन्हें राम का संदेश दो और रावण की शक्ति का अनुमान लगाकर लौट आओ। रावण का वध तो स्वयं प्रभु श्रीराम ही अपने हाथों से करेंगे।"

जाम्बवंत की बात मानकर हनुमान जी ने अपना क्रोध शांत किया। उन्होंने सभी वानरों को संबोधित करते हुए कहा, "हे भाइयो! तुम सब कंद-मूल फल खाकर यहीं इसी तट पर मेरी प्रतीक्षा करना। मैं अभी सीता माता का दर्शन करके लौटता हूँ।"

इसके पश्चात, समुद्र को लांघने के लिए एक उचित और मजबूत आधार की आवश्यकता थी, जो उनके शरीर के भारी वेग को सह सके। इसलिए हनुमान जी वहां स्थित 'महेंद्र पर्वत' की सबसे ऊंची चोटी पर जा खड़े हुए। अब ब्रह्मांड के इतिहास की सबसे महान, सबसे लंबी और सबसे रोमांचक छलांग (उड़ान) आरंभ होने वाली थी।

🎉 कहानी समाप्त

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