भाग 17: हनुमान मिलन, सुग्रीव से मित्रता और बालि-सुग्रीव वैर की कथा (गुफा का रहस्य)

शबरी को परम धाम की प्राप्ति कराने के पश्चात, श्रीराम और लक्ष्मण पम्पा सरोवर के अत्यंत रमणीक तटों को पार करते हुए 'ऋष्यमूक पर्वत' के समीप पहुँचे। जब वानरराज सुग्रीव ने पर्वत की चोटी से दो अत्यंत तेजस्वी, धनुष-बाण धारण किए हुए योद्धाओं को अपनी ओर आते देखा, तो वह बालि के भय से कांप उठा। उसने अपने सबसे ज्ञानी मंत्री, पवनपुत्र हनुमान को उनका भेद जानने के लिए भेजा।
हनुमान जी ने एक ब्रह्मचारी (संन्यासी) का रूप धारण किया और दोनों भाइयों के पास पहुँचकर अत्यंत मधुर और परिष्कृत संस्कृत में उनका परिचय पूछा। जब लक्ष्मण ने श्रीराम का परिचय दिया और माता सीता के हरण की कथा सुनाई, तो हनुमान जी का हृदय प्रेम और भक्ति से गदगद हो गया। वे समझ गए कि ये साक्षात उनके आराध्य हैं। उन्होंने तुरंत अपना वानर रूप धारण किया और श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया।
हनुमान जी श्रीराम और लक्ष्मण को आदरपूर्वक अपने कंधों पर बिठाकर ऋष्यमूक पर्वत की चोटी पर ले गए, जहाँ सुग्रीव छिपा हुआ था। हनुमान जी ने दो लकड़ियों को घिसकर अग्नि प्रज्वलित की। उस पवित्र अग्नि की परिक्रमा करके श्रीराम और सुग्रीव ने एक-दूसरे को गले लगाया और यह ऐतिहासिक प्रतिज्ञा की: "आज से सुग्रीव का मित्र राम का मित्र है, और सुग्रीव का शत्रु राम का शत्रु है।"
मित्रता पक्की होने के पश्चात, श्रीराम ने सुग्रीव से अत्यंत आत्मीयता से पूछा, "हे मित्र सुग्रीव! तुम इस दुर्गम पर्वत पर क्यों छिपे हो? तुम्हारी पत्नी कहाँ है? और तुम्हारे अपने ही सगे बड़े भाई बालि के साथ तुम्हारी इतनी भयंकर शत्रुता का क्या कारण है?"
श्रीराम का यह प्रश्न सुनकर सुग्रीव की आंखों में आंसू आ गए। उसने अपने हृदय का दुख प्रकट करते हुए बालि और अपनी शत्रुता की वह पूरी कथा सुनाई:
"हे राम! मेरे बड़े भाई बालि में अद्भुत और देवोपम बल है। किष्किंधा का राज्य उसी का था और मैं एक सेवक की भांति उसकी आज्ञा का पालन करता था। हम दोनों भाइयों में अथाह प्रेम था। परंतु एक रात सब कुछ बदल गया।
आधी रात के समय, 'मायावी' नाम का एक अत्यंत भयंकर और विशालकाय राक्षस किष्किंधा के द्वार पर आया। वह दुंदुभि राक्षस का पुत्र था। उसने द्वार पर खड़े होकर अत्यंत अहंकार में मेरे भाई बालि को युद्ध के लिए ललकारा। बालि अत्यंत क्रोधी स्वभाव का है। वह गर्जना सुनकर तुरंत उठा और उस राक्षस को मारने के लिए दौड़ पड़ा। अपने भाई को अकेले जाते देख, मैं भी उसकी सहायता के लिए उसके पीछे-पीछे भाग चला।
हमें आता देखकर मायावी राक्षस घबरा गया और अपनी जान बचाने के लिए भागने लगा। भागते-भागते वह एक अत्यंत भयानक, गहरी और अंधेरी गुफा में घुस गया।
गुफा के द्वार पर पहुंचकर बालि ने मुझे रोक दिया। उसने मुझसे कहा— 'सुग्रीव! तुम यहीं इस गुफा के द्वार पर मेरी प्रतीक्षा करो। मैं अंदर जाकर उस नीच का वध करके अभी आता हूँ। यदि पंद्रह दिन बीत जाएं और मैं न लौटूं, या यदि इस गुफा से रक्त (खून) की धारा बाहर आए, तो तुम समझ लेना कि मैं मारा गया हूँ।' ऐसा कहकर बालि उस घोर अंधकार में प्रवेश कर गया।
हे प्रभु! मैंने पंद्रह दिन नहीं, बल्कि पूरे एक महीने तक उस गुफा के द्वार पर बिना खाए-पिए अपने भाई की प्रतीक्षा की। एक महीने बाद, उस गुफा के भीतर से राक्षसों की भयंकर गर्जनाएं सुनाई देने लगीं, परंतु मुझे मेरे भाई बालि का कोई स्वर सुनाई नहीं दिया। और तभी... गुफा के द्वार से झाग से भरा हुआ रक्त बहकर बाहर आने लगा।
वह रक्त और राक्षसों का कोलाहल देखकर मैं पूरी तरह टूट गया। मैंने तार्किक रूप से यही सोचा कि मायावी राक्षस ने छल से मेरे महाबली भाई का वध कर दिया है। मुझे यह भय सताने लगा कि यदि वह राक्षस बाहर आ गया, तो वह पूरी किष्किंधा नगरी का सर्वनाश कर देगा। इसलिए, नगरवासियों की रक्षा के लिए, मैंने एक अत्यंत विशाल चट्टान से उस गुफा का द्वार पूरी तरह बंद कर दिया, ताकि वह राक्षस वहीं घुटकर मर जाए।
मैं रोता और विलाप करता हुआ किष्किंधा लौटा। जब मंत्रियों को यह ज्ञात हुआ कि बालि मारा गया है, तो उन्होंने राज्य को बिना राजा के असुरक्षित मानकर, बलपूर्वक मेरा राज्याभिषेक कर दिया और मुझे किष्किंधा का राजा बना दिया।
परंतु हे राम! मेरी यह तार्किक सोच मेरे जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप बन गई। उस गुफा में बालि मरा नहीं था, बल्कि उसने मायावी राक्षस को मार दिया था। जो रक्त बाहर आया था, वह बालि का नहीं, उस राक्षस का था। जब बालि ने गुफा से बाहर आना चाहा, तो द्वार पर चट्टान देखकर वह क्रोध से पागल हो गया। उसने लात मारकर वह चट्टान तोड़ दी और किष्किंधा लौट आया।
जब बालि ने मुझे राजसिंहासन पर बैठे देखा, तो उसकी आंखें लाल हो गईं। उसने सोचा कि मैंने राज्य के लालच में उसे उस गुफा में जानबूझकर बंद कर दिया था। मैंने उसके चरण पकड़ लिए, रो-रोकर पूरी बात समझाई, अपना मुकुट उसके चरणों में रख दिया और कहा कि मैं तो केवल एक रक्षक बनकर बैठा था।
परंतु बालि का क्रोध अंधा हो चुका था। उसने मेरी एक न सुनी। उसने मुझे जानवरों की तरह पीटा। उसने मुझे केवल राज्य से ही नहीं निकाला, बल्कि हे राम, उस नीच ने मेरी धर्मपत्नी 'रूमा' को भी बलपूर्वक अपने पास बंदी बना लिया।
तब से मैं अपने प्राण बचाने के लिए इस ऋष्यमूक पर्वत पर छिपा हुआ हूँ, क्योंकि महर्षि मतंग के श्राप के कारण बालि इस पर्वत पर पैर नहीं रख सकता। यदि वह यहाँ आया तो उसके सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे।"
सुग्रीव की यह व्यथा सुनकर श्रीराम की भृकुटी (भौहें) तन गईं। छोटे भाई की पत्नी (पुत्रवधू के समान होती है) पर कुदृष्टि डालना सनातन धर्म में सबसे घोर पाप माना गया है।
श्रीराम ने अपना धनुष उठाया और अत्यंत कठोर स्वर में प्रतिज्ञा की: "हे मित्र सुग्रीव! जिसने तुम्हारी पत्नी का हरण किया है और तुम्हें इतना कष्ट दिया है, वह बालि अब अधिक समय तक जीवित नहीं रहेगा। मैं सत्य की सौगंध खाकर कहता हूँ कि अपने इसी धनुष से मैं बालि का वध करूँगा और तुम्हें तुम्हारा राज्य तथा तुम्हारी पत्नी ससम्मान वापस दिलाऊँगा।"
श्रीराम के इन आत्मविश्वास से भरे वचनों को सुनकर सुग्रीव के हृदय में आशा की एक नई किरण जाग उठी, परंतु बालि के अथाह बल को देखते हुए उसके मन में अभी भी कुछ संशय बाकी था, जिसे दूर करना श्रीराम के लिए आवश्यक था।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा
सृष्टि के आरंभ में इक्ष्वाकु वंश की स्थापना हुई और सरयू तट पर अयोध्या नगरी बसी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु संतानहीनता की पीड़ा उन्हें अंदर से खोखला कर रही थी।
पढ़ें →भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण
श्रृंगी ऋषि के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और स्वर्ण पात्र में पायस लेकर आए। राजा दशरथ ने वह दिव्य खीर तीनों रानियों में बांटी।
पढ़ें →भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल
चैत्र मास की नवमी तिथि को पांच ग्रहों के शुभ संयोग में महारानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। इसके बाद भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया।
पढ़ें →भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा
महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए मांगा। दशरथ के मोह के बाद वशिष्ठ ने समझाया। वन में राम ने ताड़का का वध किया और मारीच-सुबाहु को परास्त कर यज्ञ सम्पन्न करवाया।
पढ़ें →भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर
मार्ग में श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। मिथिला में शिव धनुष भंग कर राम ने सीता स्वयंवर जीता। परशुराम के क्रोध को राम ने अपनी शांति और बल से शांत किया।
पढ़ें →भाग 6: अयोध्या से बारात का प्रस्थान, चारों भाइयों का विवाह और विदाई
राजा दशरथ विशाल बारात लेकर मिथिला पहुँचे। वेदमंत्रों के बीच चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ — राम-सीता, लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति।
पढ़ें →