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भाग 16: कबंध का उद्धार और माता शबरी की निस्वार्थ भक्ति

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 16: कबंध का उद्धार और माता शबरी की निस्वार्थ भक्ति

जटायु का अंतिम संस्कार करने के पश्चात श्रीराम और लक्ष्मण भारी मन से दक्षिण दिशा की ओर और अधिक घने वनों में बढ़ने लगे। क्रौंच वन को पार करते हुए वे एक ऐसे भयानक जंगल में पहुँचे जहाँ सूर्य की किरणें भी धरती तक नहीं पहुँच पाती थीं। वहां का वातावरण अत्यंत डरावना था।

अचानक, जंगल में एक भयंकर गर्जना हुई और दोनों भाइयों को लगा जैसे उन्हें दो विशालकाय, पेड़ के तनों जैसी मोटी भुजाओं ने जकड़ लिया है। उन्होंने मुड़कर देखा तो उनके सामने एक अत्यंत भयानक और विकृत आकार का राक्षस खड़ा था। उस राक्षस का नाम 'कबंध' था।

कबंध का शरीर अत्यंत विचित्र था। उसका न तो सिर था और न ही गर्दन। उसका मुख उसके पेट में स्थित था, जिसमें भयंकर नुकीले दांत थे, और उसकी एक ही विशाल आंख उसकी छाती पर चमक रही थी। उसकी दोनों भुजाएं योजन भर (मीलों) लंबी थीं, जिनसे वह दूर-दूर के जानवरों को पकड़कर अपने पेट में स्थित मुख में डाल लेता था।

जब कबंध ने श्रीराम और लक्ष्मण को अपनी विशाल भुजाओं में जकड़ लिया, तो लक्ष्मण एक क्षण के लिए निराश हो गए। उन्होंने कहा, "भैया! लगता है कि सीता माता को खोजे बिना ही आज इस राक्षस के हाथों हमारा अंत हो जाएगा।"

परंतु श्रीराम रत्ती भर भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने लक्ष्मण को धैर्य बंधाते हुए कहा, "लक्ष्मण! एक क्षत्रिय कभी मृत्यु से भयभीत नहीं होता। अपनी तलवार निकालो और इसकी भुजाओं को काट डालो!"

दोनों भाइयों ने अपनी-अपनी चमकती हुई तलवारें निकालीं और अत्यंत फुर्ती से कबंध की दोनों विशाल भुजाओं को जड़ से काट कर फेंक दिया। भुजाएं कटते ही कबंध लहूलुहान होकर भारी आवाज़ के साथ धरती पर गिर पड़ा। पीड़ा से कराहते हुए उसने पूछा, "तुम दोनों कौन हो, जिन्होंने देवराज इंद्र के वज्र के समान शक्तिशाली मेरी भुजाओं को काट दिया?"

लक्ष्मण ने अपना और श्रीराम का परिचय दिया तथा सीता हरण की बात बताई। राम का नाम सुनते ही कबंध की छाती पर स्थित वह भयानक आंख चमक उठी। उसने कहा, "हे प्रभु! मैं तो जन्म से ऐसा नहीं था। मैं 'दनु' नाम का एक अत्यंत सुंदर गंधर्व था, परंतु मुझे अपने रूप का बहुत अहंकार था। मैं मुनियों को डराने के लिए राक्षसों का रूप धरता था। एक बार मैंने महर्षि स्थूलशिरा को डराया, तो उन्होंने मुझे श्राप दे दिया कि मेरा शरीर हमेशा के लिए इसी भयानक राक्षस (कबंध) जैसा हो जाएगा। बाद में इंद्र के वज्र प्रहार से मेरा सिर पेट में धंस गया। मुनि ने कहा था कि जब त्रेता युग में स्वयं श्रीराम मेरी भुजाएं काटकर मेरा दाह संस्कार करेंगे, तब मैं श्राप-मुक्त होऊँगा।"

श्रीराम और लक्ष्मण ने एक विशाल गड्ढा खोदा और कबंध को उसमें रखकर चिता जला दी। अग्नि में जलते ही कबंध अपने दिव्य गंधर्व रूप में प्रकट हुआ। स्वर्ग लौटते समय उसने श्रीराम को एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग दिखाया। कबंध ने कहा, "हे राम! आप यहाँ से पश्चिम दिशा में 'पम्पा सरोवर' की ओर जाएं। वहाँ ऋष्यमूक पर्वत पर वानरों का राजा 'सुग्रीव' अपने चार मंत्रियों के साथ निवास करता है। सुग्रीव को उसके बड़े भाई बालि ने राज्य से निकाल दिया है। आप सुग्रीव से मित्रता कर लीजिए, वह सीता माता को खोजने में आपकी पूरी सहायता करेगा। परंतु वहाँ जाने से पहले, मार्ग में मतंग ऋषि के आश्रम में अवश्य जाइएगा, जहाँ आपकी परम भक्त 'शबरी' जन्मों से आपकी प्रतीक्षा कर रही है।"

कबंध द्वारा बताया गया मार्ग पकड़कर दोनों भाई मतंग ऋषि के आश्रम की ओर चल पड़े।

यह आश्रम पम्पा सरोवर के निकट एक अत्यंत मनोरम स्थान पर था। यहाँ 'शबरी' नाम की एक अत्यंत वृद्ध महिला निवास करती थी। शबरी बचपन से ही संन्यासियों का जीवन जीती थी। वर्षों पहले, जब उसके गुरु मतंग ऋषि अपना शरीर त्याग कर स्वर्ग जा रहे थे, तब उन्होंने शबरी से कहा था, "पुत्री! तू इसी आश्रम में रहकर तपस्या कर। एक दिन साक्षात परब्रह्म श्रीराम तुझे दर्शन देने स्वयं इस आश्रम में आएंगे।"

गुरु के उन वचनों को शबरी ने अपने जीवन का एकमात्र सत्य मान लिया था। तब से लेकर आज तक, जब वह अत्यंत वृद्ध हो चुकी थी, उसकी कमर झुक गई थी, बाल सफेद हो गए थे और त्वचा पर झुर्रियां पड़ गई थीं, उसका रोज़ का केवल एक ही नियम था। वह प्रतिदिन सुबह उठकर आश्रम के रास्ते की धूल बुहारती (साफ करती) थी, ताकि उसके राम के कोमल चरणों में कोई कांटा न चुभ जाए। वह प्रतिदिन जंगल से सबसे मीठे जंगली बेर (फल) चुनकर लाती थी।

बेर चुनते समय शबरी का प्रेम इतना अंधा था कि वह हर एक बेर को पहले खुद थोड़ा सा चखकर (जूठा करके) देखती थी कि वह मीठा है या नहीं। जो बेर खट्टा निकलता, उसे वह फेंक देती और जो मीठा होता, उसे अपनी टोकरी में राम के लिए रख लेती। उसे यह भान ही नहीं था कि भगवान को जूठा फल नहीं खिलाया जाता; उसके पास केवल निस्वार्थ प्रेम था।

एक दिन, जब शबरी आश्रम के द्वार पर बैठी राह निहार रही थी, तभी उसे दो अत्यंत तेजस्वी, सांवले और गोरे रंग के संन्यासी युवक आते दिखाई दिए। धनुष-बाण धारण किए उन दोनों भाइयों को देखते ही शबरी की आंखें खुशी से छलक पड़ीं। वह समझ गई कि उसके गुरु का वचन सत्य हो गया है।

शबरी दौड़कर श्रीराम के चरणों में गिर पड़ी। वह प्रेम और आंसुओं में इतनी डूब गई थी कि उसके मुख से कोई शब्द ही नहीं निकल रहा था। श्रीराम ने अत्यंत स्नेह से उस वृद्ध भीलनी को उठाया और गले लगा लिया। शबरी उन्हें आदरपूर्वक अपनी कुटिया के भीतर ले गई, उनके चरण धोए और उन्हें एक आसन पर बिठाया।

इसके बाद शबरी अपनी वह टोकरी ले आई जिसमें उसने राम के लिए बेर रखे थे। वह अत्यंत भाव-विभोर होकर अपने हाथों से वे जूठे (चखे हुए) बेर श्रीराम को खिलाने लगी।

लक्ष्मण ने जब देखा कि एक वनवासी स्त्री श्रीराम को अपने जूठे फल खिला रही है, तो वे संकोच और आश्चर्य में पड़ गए। परंतु श्रीराम? श्रीराम तो प्रेम के भूखे थे। उन्होंने उन जूठे और छिले हुए बेरों को इतने आनंद और स्वाद से खाया, मानो वे स्वर्ग का अमृत पी रहे हों। श्रीराम ने लक्ष्मण को भी एक बेर दिया।

शबरी ने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! मैं तो एक अत्यंत नीच जाति की, अज्ञानी और मूर्ख स्त्री हूँ। मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ? मुझे तो कोई वेद-पुराण भी नहीं आते।"

तब श्रीराम ने मुस्कुराते हुए शबरी को 'नवधा भक्ति' (भक्ति के नौ प्रकार) का वह महान उपदेश दिया, जो रामायण का सार है। श्रीराम ने कहा, "हे भामिनी (महान स्त्री)! मैं किसी की जाति, गोत्र, कुल, धर्म, या धन को नहीं देखता। मैं केवल और केवल 'प्रेम' का नाता मानता हूँ। जो व्यक्ति बिना किसी छल-कपट के पूर्ण रूप से मुझ पर विश्वास करता है और मुझसे प्रेम करता है, वही मेरा सबसे बड़ा भक्त है। और हे शबरी! तुम्हारी भक्ति तो इतनी ऊंची है कि जो गति बड़े-बड़े योगियों को नहीं मिलती, वह गति आज तुम्हें घर बैठे प्राप्त हो गई है।"

श्रीराम के इन वचनों को सुनकर शबरी का जीवन पूर्ण हो गया। उसने श्रीराम से सुग्रीव से मिलने की बात का समर्थन किया और फिर योगाग्नि में अपना पुराना शरीर भस्म करके, श्रीराम के सामने ही उस परम दिव्य धाम (वैकुंठ) को प्रस्थान कर गई, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता।

शबरी को मोक्ष प्रदान करने के पश्चात, श्रीराम और लक्ष्मण पम्पा सरोवर के अत्यंत सुंदर जलमार्ग से होते हुए 'ऋष्यमूक पर्वत' की ओर बढ़ चले, जहाँ उनकी भेंट एक ऐसे असाधारण वानर से होने वाली थी, जो श्रीराम का सबसे बड़ा सेवक और इतिहास का सबसे महान रामभक्त बनने वाला था।

🎉 कहानी समाप्त

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