हिन्दी कहानियाँ
🏹 रामायण

भाग 45: हनुमान जी की महा-उड़ान, कालनेमि वध, भरत-हनुमान भेंट और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 45: हनुमान जी की महा-उड़ान, कालनेमि वध, भरत-हनुमान भेंट और लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा

राम का कार्य और लक्ष्मण के प्राण—इन दो महासंकल्पों को अपने हृदय में धारण करके पवनपुत्र हनुमान ने सुवेला पर्वत से उत्तर दिशा (हिमालय) की ओर एक ऐसी भयंकर छलांग लगाई कि उनके वेग से समुद्र का जल आकाश की ओर उछल पड़ा।

यह आधी रात का समय था। जब रावण के गुप्तचरों ने उसे बताया कि हनुमान 'संजीवनी बूटी' लाने हिमालय की ओर उड़ गए हैं, तो रावण घबरा गया। वह जानता था कि यदि लक्ष्मण जीवित हो गए, तो युद्ध का परिणाम बदल जाएगा। रावण ने तुरंत अपने एक अत्यंत मायावी और चालाक राक्षस 'कालनेमि' को बुलाया।

रावण ने कालनेमि से कहा, "जाओ और अपनी माया से उस वानर को मार्ग में ही रोक लो, ताकि सूर्योदय हो जाए और लक्ष्मण के प्राण निकल जाएं।"

कालनेमि का छल और वध: कालनेमि हनुमान जी के मार्ग में पहुँचा और उसने एक अत्यंत सुंदर, पवित्र आश्रम की माया रची। वह स्वयं एक सिद्ध साधु का वेश धारण करके राम-नाम का जाप करने लगा। जब हनुमान जी वहां से गुजरे, तो उन्हें प्यास लगी थी। आश्रम देखकर वे नीचे उतरे।

साधु (कालनेमि) ने कहा, "हे वानर! मैं अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा हूँ कि तुम राम के दूत हो। तुम पहले पास के सरोवर (तालाब) में स्नान और जलपान कर लो, फिर मैं तुम्हें एक ऐसा मंत्र दूँगा जिससे तुम पलक झपकते ही हिमालय पहुँच जाओगे।"

हनुमान जी जैसे ही सरोवर में जल पीने उतरे, वहां एक अत्यंत विशाल मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया। हनुमान जी ने एक ही झटके में उस मगरमच्छ का मुँह फाड़ दिया। मरते ही वह मगरमच्छ एक सुंदर अप्सरा बन गई। उसने हनुमान जी से कहा, "हे रामदूत! मुझे एक मुनि ने मगरमच्छ बनने का श्राप दिया था। आज आपके हाथों मेरा उद्धार हुआ है। परंतु सावधान! वह आश्रम में बैठा साधु कोई मुनि नहीं, बल्कि रावण का भेजा हुआ 'कालनेमि' राक्षस है।"

सच्चाई जानते ही हनुमान जी आश्रम लौटे। कालनेमि ने कहा, "आओ पुत्र, मंत्र ले लो।" हनुमान जी ने कालनेमि की गर्दन को अपनी पूंछ में लपेटा और अपनी मुट्ठी का ऐसा भयंकर प्रहार किया कि कालनेमि "हा रावण!" चिल्लाता हुआ वहीं प्राण त्याग कर यमलोक सिधार गया।

द्रोणगिरि पर्वत उठाना: हनुमान जी वायु के वेग से हिमालय के 'द्रोणगिरि' (या महोदय) पर्वत पर जा पहुँचे। वहां का दृश्य अत्यंत अद्भुत था। पूरा पर्वत चमत्कारी जड़ी-बूटियों से जगमगा रहा था। परंतु हनुमान जी वैद्य नहीं थे, वे 'संजीवनी' बूटी को पहचान नहीं पाए।

समय तेजी से बीत रहा था और पूर्व दिशा में लाली छाने लगी थी। हनुमान जी ने एक क्षण भी व्यर्थ नहीं किया। उन्होंने एक भयंकर गर्जना की और उस पूरे के पूरे 'द्रोणगिरि पर्वत' की चोटी को ही जड़ों से उखाड़ लिया! उस चमकते हुए पर्वत को अपने विशाल हाथों पर उठाकर, हनुमान जी वापस दक्षिण दिशा की ओर आकाश में उड़ चले।

भरत और हनुमान जी की भेंट (नंदीग्राम प्रसंग): मार्ग में 'अयोध्या' नगरी पड़ती थी। अयोध्या के बाहर 'नंदीग्राम' में श्रीराम के छोटे भाई भरत एक तपस्वी का जीवन जी रहे थे। वे रात-दिन जागकर केवल राम-नाम का स्मरण करते थे।

रात के अंधकार में, भरत ने देखा कि आकाश में कोई अत्यंत विशाल प्राणी एक पूरा पहाड़ लेकर दक्षिण दिशा की ओर उड़ रहा है। भरत को लगा कि यह अवश्य ही कोई भयंकर मायावी राक्षस है जो अयोध्या पर कोई विपत्ति लाने वाला है।

भरत ने तुरंत अपना धनुष उठाया और एक बिना फलक (बिना धार) का बाण उस प्राणी की ओर छोड़ दिया।

वह बाण सीधे हनुमान जी के पैर में लगा। प्रहार होते ही हनुमान जी का संतुलन बिगड़ गया और वे आकाश से धरती की ओर गिरने लगे। परंतु गिरते समय भी हनुमान जी के मुख से केवल एक ही शब्द निकला— "हा राम! हा राम!"

'राम' का नाम सुनते ही भरत का हृदय कांप उठा। उन्होंने सोचा, "यह कैसा राक्षस है जो मरते समय मेरे प्रभु का नाम ले रहा है?" भरत दौड़कर उस गिरे हुए विशाल वानर के पास गए। उन्होंने देखा कि वानर अचेत है और उसके मुख से राम-नाम निकल रहा है। भरत ने अपनी आंखों के आंसुओं से हनुमान जी का मुँह धोया और उन्हें होश में लाए।

होश में आते ही हनुमान जी ने सामने एक तपस्वी को देखा जिसकी शक्ल बिल्कुल भगवान राम से मिलती-जुलती थी। हनुमान जी ने पूछा, "हे तपस्वी! आप कौन हैं?" भरत ने रोते हुए कहा, "मैं उसी राम का अभागा भाई भरत हूँ, जिसके कारण मेरे प्रभु को वनवास मिला है। मैंने अज्ञानतावश आपको बाण मार दिया। आप कौन हैं और यह पर्वत लेकर कहाँ जा रहे हैं?"

हनुमान जी ने तुरंत भरत को प्रणाम किया और सीता हरण से लेकर लक्ष्मण जी को लगी 'शक्ति' तक की पूरी कथा कह सुनाई।

यह कथा सुनते ही भरत को ऐसा लगा मानो किसी ने उनके हृदय में खंजर घोंप दिया हो। वे फूट-फूट कर रोने लगे। "हा लक्ष्मण! मेरे कारण आज मेरा परिवार नष्ट हो रहा है। मेरी माता कैकेयी के पापों का फल आज मेरा भाई भोग रहा है।"

फिर भरत को समय का ध्यान आया। उन्होंने देखा कि पूर्व दिशा में पौ फटने (Sunrise) का समय हो रहा है। भरत ने अपने आंसू पोंछे और अपना एक बाण धनुष पर चढ़ाते हुए हनुमान जी से अत्यंत ओजस्वी स्वर में कहा:

"हे कपि श्रेष्ठ! मेरे बाण से आपको विलंब हो गया है। आप इस संजीवनी पर्वत के साथ मेरे इस बाण के फलक पर बैठ जाइए। मैं अपने बाण के वेग से आपको पलक झपकते ही लंका पहुँचा दूँगा!"

हनुमान जी भरत का यह बाहुबल और उनका प्रताप देखकर मन ही मन अत्यंत चकित हुए। वे समझ गए कि राम के भाइयों का बल एक समान ही है। परंतु हनुमान जी को अपनी भक्ति और प्रभु राम के कार्य पर पूर्ण विश्वास था।

हनुमान जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा:

"हे नाथ! आपके बाहुबल को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम। परंतु आप चिंता न करें। मैं प्रभु श्रीराम के प्रताप को हृदय में धारण करके, आपके आशीर्वाद से अपने ही वेग से समय पर पहुँच जाऊँगा।"

भरत से विदा लेकर और उनके चरण रज को मस्तक पर लगाकर, हनुमान जी अत्यंत तीव्र गति से पुनः आकाश में उड़ चले।

लक्ष्मण के प्राणों की रक्षा: लंका के युद्ध शिविर में श्रीराम व्याकुलता से पूर्व दिशा की ओर देख रहे थे। सूर्य निकलने ही वाला था और सुग्रीव तथा विभीषण की सांसें अटकी हुई थीं।

तभी आकाश में बादलों को चीरता हुआ एक प्रकाश दिखाई दिया। हनुमान जी एक पूरे चमकते हुए पर्वत को हाथों में उठाए, "जय श्रीराम" का सिंहनाद करते हुए युद्ध शिविर में आ उतरे। वानर सेना खुशी से झूम उठी।

सुषेण वैद्य ने एक पल भी व्यर्थ नहीं किया। उन्होंने तुरंत उस पर्वत से 'मृतसंजीवनी' और 'विशल्यकरणी' जड़ी-बूटियां निकालीं। उन्हें पीसकर उनका रस लक्ष्मण जी के मुख में डाला गया और उनके घाव पर लगाया गया।

जड़ी-बूटी का स्पर्श होते ही एक अद्भुत चमत्कार हुआ। लक्ष्मण जी के शरीर का सारा विष समाप्त हो गया, घाव भर गए और वे एक गहरी नींद से जागते हुए से तुरंत उठकर बैठ गए!

लक्ष्मण को जीवित और अपने सामने बैठा देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की आंखों से आनंद के आंसू बह निकले। उन्होंने लक्ष्मण को अपने हृदय से अत्यंत कसकर लगा लिया। पूरी वानर सेना ने शंख और नगाड़े बजाकर इस महा-विजय का उत्सव मनाया।

श्रीराम ने हनुमान जी की ओर देखा और गदगद कंठ से कहा, "हनुमान! आज तुमने मेरे भाई के प्राण नहीं, बल्कि स्वयं मेरे प्राण बचाए हैं।"

जब लक्ष्मण के जीवित होने और हनुमान जी द्वारा पूरा हिमालय का पर्वत उठा लाने का समाचार रावण के कानों में पड़ा, तो लंकापति रावण कांप गया। उसकी अमोघ शक्ति विफल हो चुकी थी। अब रावण समझ गया कि मेघनाद का मायावी युद्ध भी राम को नहीं रोक पाया है। अब लंका के युद्ध में सबसे क्रूर और अंतिम चरण आरंभ होने वाला था।

🎉 कहानी समाप्त

🏹 रामायण की और कहानियाँ

🏹 रामायण10 मिनट

भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा

सृष्टि के आरंभ में इक्ष्वाकु वंश की स्थापना हुई और सरयू तट पर अयोध्या नगरी बसी। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ के पास सब कुछ था, किंतु संतानहीनता की पीड़ा उन्हें अंदर से खोखला कर रही थी।

पढ़ें →
🏹 रामायण10 मिनट

भाग 2: पुत्रकामेष्टि यज्ञ, अग्निदेव का प्राकट्य और दिव्य पायस का वितरण

श्रृंगी ऋषि के नेतृत्व में पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न हुआ। यज्ञ कुंड से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए और स्वर्ण पात्र में पायस लेकर आए। राजा दशरथ ने वह दिव्य खीर तीनों रानियों में बांटी।

पढ़ें →
🏹 रामायण8 मिनट

भाग 3: श्री राम एवं भाइयों का जन्म, नामकरण और बाल्यकाल

चैत्र मास की नवमी तिथि को पांच ग्रहों के शुभ संयोग में महारानी कौशल्या ने श्री राम को जन्म दिया। इसके बाद भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। महर्षि वशिष्ठ ने चारों बालकों का नामकरण किया।

पढ़ें →
🏹 रामायण7 मिनट

भाग 4: महर्षि विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ रक्षा

महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए और राम-लक्ष्मण को यज्ञ रक्षा के लिए मांगा। दशरथ के मोह के बाद वशिष्ठ ने समझाया। वन में राम ने ताड़का का वध किया और मारीच-सुबाहु को परास्त कर यज्ञ सम्पन्न करवाया।

पढ़ें →
🏹 रामायण7 मिनट

भाग 5: अहिल्या उद्धार, शिव धनुष भंग और सीता स्वयंवर

मार्ग में श्रीराम के चरण स्पर्श से अहिल्या का उद्धार हुआ। मिथिला में शिव धनुष भंग कर राम ने सीता स्वयंवर जीता। परशुराम के क्रोध को राम ने अपनी शांति और बल से शांत किया।

पढ़ें →
🏹 रामायण7 मिनट

भाग 6: अयोध्या से बारात का प्रस्थान, चारों भाइयों का विवाह और विदाई

राजा दशरथ विशाल बारात लेकर मिथिला पहुँचे। वेदमंत्रों के बीच चारों भाइयों का विवाह संपन्न हुआ — राम-सीता, लक्ष्मण-उर्मिला, भरत-मांडवी और शत्रुघ्न-श्रुतकीर्ति।

पढ़ें →