भाग 44: मेघनाद का भयंकर प्रतिशोध, लक्ष्मण पर 'शक्ति' का प्रहार और सुषेण वैद्य का रहस्य

लंका के प्रांगण में अपने प्रिय भाई कुंभकर्ण का कटा हुआ सिर देखकर रावण का हृदय विदीर्ण हो गया। जो रावण मृत्यु से भी नहीं डरता था, वह आज एक साधारण मनुष्य की भांति फूट-फूट कर रो रहा था। लंका में चारों ओर शोक और निराशा का अंधकार छा गया।
पिता की इस दयनीय दशा को देखकर रावण का सबसे बड़ा, अजेय और देवलोक का विजेता पुत्र—'मेघनाद' (इंद्रजीत)—आगे आया। मेघनाद ने अपने पिता के चरण छुए और अत्यंत दर्प (अहंकार) के साथ प्रतिज्ञा की:
"पिताजी! आप शोक न करें। जब तक मेरा धनुष और मेरी माया जीवित है, तब तक राम की विजय असंभव है। कल मैं युद्ध भूमि में ऐसा प्रलय मचाऊँगा कि या तो राम और लक्ष्मण जीवित नहीं बचेंगे, या मैं स्वयं लौटकर लंका नहीं आऊँगा!"
मेघनाद का रणभूमि में उतरना: अगली सुबह, मेघनाद अपने एक अत्यंत जादुई और मायावी रथ पर सवार होकर युद्ध भूमि में उतरा। आज उसका क्रोध अपनी चरम सीमा पर था। युद्ध भूमि में आते ही उसने अपनी माया का आवरण ओढ़ लिया और बादलों के पीछे छिपकर बाणों की ऐसी भयंकर वर्षा की कि वानर सेना में हाहाकार मच गया।
मेघनाद को रोकने के लिए लक्ष्मण आगे आए। लक्ष्मण ने अपने बाणों से मेघनाद की माया को काटना आरंभ किया। लक्ष्मण और मेघनाद के बीच एक ऐसा प्रलयंकारी युद्ध हुआ, जिसे देखकर देवता भी चकित रह गए। दोनों ही योद्धा एक-दूसरे के अस्त्रों को हवा में ही काट रहे थे।
लक्ष्मण ने अत्यंत फुर्ती दिखाते हुए एक अचूक बाण चलाया और मेघनाद के रथ को तोड़ दिया। उसके घोड़े और सारथी मारे गए। रथ टूटने से मेघनाद का क्रोध और भी भड़क उठा।
जब मेघनाद ने देखा कि लक्ष्मण को साधारण बाणों या अस्त्रों से हराना असंभव है, तो उसने अपने तरकश से एक अत्यंत घातक, अमोघ और प्रज्वलित अस्त्र निकाला। यह ब्रह्मा जी द्वारा दी गई महाभयंकर 'वीरघातिनी शक्ति' (एक प्रकार का जादुई और प्राणघातक भाला) थी, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता था।
मेघनाद ने अत्यंत भयंकर मंत्र पढ़कर वह प्रज्वलित 'शक्ति' पूरी ताकत से लक्ष्मण की छाती पर चला दी।
आकाश को चीरती हुई वह शक्ति बिजली की गति से आई और सीधे लक्ष्मण के हृदय में जा लगी। शक्ति का प्रहार इतना भयंकर था कि लक्ष्मण के मुख से एक चीख निकल गई और वे अचेत (मूर्छित) होकर रक्त से लथपथ धरती पर गिर पड़े। शक्ति उनके सीने में अत्यंत गहराई तक उतर चुकी थी।
लक्ष्मण को धरती पर गिरा देखकर मेघनाद ने भयंकर सिंहनाद किया और लंका लौट गया।
उधर, युद्ध भूमि में जब श्रीराम ने अपने प्राणों से भी प्रिय भाई लक्ष्मण को मूर्छित और मृत्यु के द्वार पर पड़ा देखा, तो उनका सारा धैर्य टूट गया। मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपना धनुष फेंककर लक्ष्मण के पास दौड़ पड़े और उनके शरीर से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगे। यह रामायण के सबसे भावुक और रुला देने वाले प्रसंगों में से एक है।
श्रीराम विलाप करते हुए कहने लगे:
"हे लक्ष्मण! आंखें खोलो! तुम्हारे बिना मैं अयोध्या लौटकर माता सुमित्रा को क्या मुँह दिखाऊँगा? मैं कह दूँगा कि सीता नहीं मिली, परंतु यह कैसे कहूँगा कि मैंने अपने भाई को युद्ध में खो दिया?"
श्रीराम ने एक अत्यंत मार्मिक और ऐतिहासिक बात कही:
"देसे देसे कलत्राणि देसे देसे च बान्धवाः। तं तु देशं न पश्यामि यत्र भ्राता सहोदरः॥" (अर्थात: पत्नी तो किसी भी देश में मिल सकती है, मित्र भी कहीं भी मिल सकते हैं, परंतु इस पूरे ब्रह्मांड में वह स्थान कहीं नहीं है जहाँ लक्ष्मण जैसा सगा भाई दोबारा मिल सके!)
राम का यह विलाप सुनकर सुग्रीव, अंगद, हनुमान और जाम्बवंत फूट-फूट कर रोने लगे। वानर सेना का मनोबल पूरी तरह टूट चुका था।
सुषेण वैद्य और 'संजीवनी' का रहस्य: इस घोर निराशा के बीच, लंकापति विभीषण आगे आए। उन्होंने कहा, "प्रभु! शोक का समय नहीं है। लंका में एक अत्यंत सिद्ध और चमत्कारी वैद्य है, जिसका नाम 'सुषेण' है। केवल वही लक्ष्मण जी के प्राण बचा सकता है।"
परंतु समस्या यह थी कि सुषेण लंका में रावण के महलों में था। हनुमान जी ने एक क्षण भी नहीं गंवाया। वे तुरंत सूक्ष्म रूप धरकर लंका गए और सुषेण वैद्य को उनके पूरे भवन (घर) सहित ही उठाकर श्रीराम के सामने ले आए!
सुषेण वैद्य ने जब राम को देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुए। परंतु रावण का वैद्य होने के कारण पहले वे डरे हुए थे। श्रीराम ने हाथ जोड़कर सुषेण से कहा, "हे वैद्यराज! इस समय मैं आपका शत्रु नहीं, बल्कि एक अनाथ भाई हूँ। मेरे भाई की रक्षा कीजिए।"
सुषेण ने लक्ष्मण की नाड़ी जांची और उनके सीने में लगी उस भयंकर शक्ति को देखा। सुषेण का मुख अत्यंत गंभीर हो गया। उन्होंने एक ऐसी बात कही जिसने सभी के पैरों तले जमीन खिसका दी।
सुषेण ने कहा:
"हे प्रभु! लक्ष्मण जी के प्राण अत्यंत संकट में हैं। यह वीरघातिनी शक्ति है, जिसका विष इनके शरीर में फैल रहा है। इनके बचने का केवल एक ही उपाय है। यहाँ से हजारों योजन दूर, उत्तर दिशा में हिमालय पर्वत पर एक 'द्रोणगिरि' (या महोदय) नामक पर्वत है। उस पर्वत पर चार प्रकार की चमत्कारी जड़ी-बूटियां चमकती रहती हैं—मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और संधानी।
यदि कल सूर्योदय से पूर्व (सूरज निकलने से पहले) 'मृतसंजीवनी' बूटी यहाँ आ जाए, तो लक्ष्मण जीवित हो सकते हैं। परंतु यदि सूर्य की पहली किरण भी निकल गई, तो फिर ब्रह्मा जी भी इनके प्राण नहीं बचा सकेंगे!"
हनुमान जी की महा-उड़ान: रात आधी बीत चुकी थी। हजारों मील दूर हिमालय से सुबह होने से पहले जड़ी-बूटी लाना किसी भी देवता के लिए भी असंभव था। सभी वानर निराशा से सिर झुका कर बैठ गए।
तब श्रीराम ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने परम संकटमोचक, पवनपुत्र हनुमान की ओर देखा। हनुमान जी श्रीराम के चरणों में गिरे और हाथ जोड़कर बोले:
"प्रभु! जब तक आपका यह दास हनुमान जीवित है, तब तक काल की भी हिम्मत नहीं कि वह लक्ष्मण भैया को छू सके। आप मुझे आज्ञा दें। मैं काल के चक्र को रोक दूँगा, परंतु सूर्योदय से पूर्व संजीवनी लेकर अवश्य लौटूँगा!"
यह कहकर हनुमान जी ने एक भयंकर गर्जना की, अपना शरीर अत्यंत विशाल किया और एक उल्कापिंड की भांति वायु को चीरते हुए, आकाश मार्ग से सीधे उत्तर दिशा (हिमालय) की ओर उड़ चले।
अब एक ओर लक्ष्मण की घटती हुई सांसें थीं, दूसरी ओर तेजी से बीतती हुई रात थी, और इन दोनों के बीच हनुमान जी की वह महा-उड़ान थी, जिसे रोकने के लिए रावण एक अत्यंत भयानक और मायावी चाल चलने वाला था।
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