भाग 46: मेघनाद का 'निकुंभिला यज्ञ', विभीषण की चेतावनी और यज्ञ-विध्वंस

युद्ध शिविर में लक्ष्मण जी के पुनर्जीवित होने और वानर सेना के भयंकर सिंहनाद को सुनकर लंका के महलों की दीवारें कांप उठीं। रावण अपने सिंहासन पर बैठा कांप रहा था। उसकी अमोघ 'वीरघातिनी शक्ति', जिसका वार कभी खाली नहीं गया था, आज विफल हो चुकी थी।
जब मेघनाद (इंद्रजीत) ने यह सुना कि लक्ष्मण जीवित हो गए हैं, तो उसका क्रोध और अहंकार सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने अपने पिता रावण से कहा, "पिताजी! यह राम और लक्ष्मण कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। मेरी सारी माया और अस्त्र इन पर विफल हो रहे हैं। अब मेरे पास केवल एक ही मार्ग बचा है। मैं अपनी कुलदेवी की शरण में जाकर 'निकुंभिला यज्ञ' करूँगा।"
निकुंभिला यज्ञ का रहस्य: मेघनाद ने लंका के एक अत्यंत गुप्त और घने जंगल में स्थित 'निकुंभिला' देवी के मंदिर में जाकर एक महा-भयंकर और तामसी यज्ञ आरंभ कर दिया।
उधर राम के शिविर में, लंकापति विभीषण अत्यंत चिंतित हो उठे। उन्होंने घबराते हुए श्रीराम से कहा: "हे प्रभु! अनर्थ होने वाला है! मेघनाद ने अपनी हार देखकर निकुंभिला यज्ञ आरंभ कर दिया है। यह यज्ञ इतना भयंकर है कि यदि यह पूर्ण हो गया, तो अग्नि कुंड से एक ऐसा मायावी रथ, ऐसे अजेय घोड़े और ऐसे अमोघ अस्त्र-शस्त्र निकलेंगे कि फिर मेघनाद को नहीं हरा पाएंगे। ब्रह्मा जी का वरदान है कि जो भी मेघनाद का यह यज्ञ बीच में भंग करेगा, उसी के हाथों मेघनाद की मृत्यु होगी। इसलिए प्रभु, हमें किसी भी कीमत पर सूर्योदय से पूर्व उस यज्ञ को रोकना होगा!"
श्रीराम ने विभीषण की बात सुनकर तुरंत अपने भाई लक्ष्मण को बुलाया। श्रीराम ने लक्ष्मण को आशीर्वाद देते हुए कहा, "हे लक्ष्मण! आज मैं तुम्हें लंका के सबसे अजेय योद्धा के वध का दायित्व सौंपता हूँ। जाओ, हनुमान, अंगद और विभीषण को साथ लेकर उस यज्ञ को ध्वस्त कर दो।"
यज्ञ-विध्वंस (महायज्ञ को भंग करना): लक्ष्मण अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर वानर सेना के साथ उस गुप्त स्थान पर पहुँचे। वहां का दृश्य अत्यंत डरावना था। मेघनाद पूर्ण ध्यान में बैठा था और अग्नि कुंड में आहुतियां दे रहा था। उसके चारों ओर भयंकर राक्षसों का पहरा था।
हनुमान और अंगद ने एक भयंकर गर्जना की और राक्षसों पर टूट पड़े। वानरों ने वृक्षों और चट्टानों से रक्षकों को मार डाला। इसके बाद वे सीधे यज्ञ मंडप में घुस गए।
वानरों ने यज्ञ की सारी सामग्री—रक्त के घड़े, हड्डियां और घी—उठाकर फेंक दी। उन्होंने यज्ञ कुंड की अग्नि में जल और धूल डाल दी। मेघनाद फिर भी ध्यान से नहीं उठा, तो हनुमान जी और अंगद ने मेघनाद को उसके बालों से पकड़कर खींचा और उस पर प्रहार करने लगे।
मेघनाद का क्रोध और विभीषण को देखना: जब शारीरिक प्रहार होने लगे, तो मेघनाद का ध्यान टूट गया। उसका यज्ञ अपूर्ण (अधूरा) रह गया था, जिसका अर्थ था कि अब उसकी मृत्यु निश्चित थी।
क्रोध से पागल होकर मेघनाद उठा और उसने अपना धनुष संभाल लिया। तभी उसकी दृष्टि वहां खड़े अपने सगे चाचा 'विभीषण' पर पड़ी। मेघनाद समझ गया कि इस गुप्त स्थान का पता केवल विभीषण ही बता सकते थे।
मेघनाद ने अत्यंत घृणा से विभीषण को देखते हुए कहा, "अरे कुलद्रोही चाचा! तू इसी कुल में जन्मा, मेरे पिता का सगा भाई है, और तूने ही मेरे विनाश का मार्ग इन वनवासियों को बता दिया? धिक्कार है तेरे जीवन पर! आज मैं सबसे पहले तेरा ही वध करूँगा।"
विभीषण ने अत्यंत शांत और धर्मनिष्ठ स्वर में उत्तर दिया: "हे इंद्रजीत! तू मुझे कुलद्रोही कहता है? परंतु तू भूल गया कि धर्म की रक्षा के लिए यदि कुल का भी त्याग करना पड़े, तो वह पाप नहीं, पुण्य है। तेरे पिता ने पराई स्त्री का हरण करके पूरे राक्षस कुल को कलंकित किया है। मैं धर्म के साथ हूँ, राम के साथ हूँ। आज तेरी मृत्यु निश्चित है।"
विभीषण के इन वचनों को सुनकर मेघनाद आगबबूला हो गया। उसने अपना सबसे भयंकर अस्त्र विभीषण की ओर छोड़ दिया। परंतु बीच में ही लक्ष्मण जी ने अपने बाण से उस अस्त्र को काट गिराया।
लक्ष्मण ने गरजते हुए कहा, "अरे मेघनाद! निहत्थों और अपनी माया के बल पर बहुत युद्ध कर लिया। आज तेरा सामना मुझसे है। अपना धनुष उठा और आमने-सामने का युद्ध कर!"
अब निकुंभिला के उस घने जंगल में, त्रेता युग के दो सबसे महान और अजेय धनुर्धरों—लक्ष्मण और मेघनाद—के बीच वह अंतिम और प्रलयंकारी महासंग्राम आरंभ होने वाला था।
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