जादुई कुत्ता और राजा की ज़िद — कुत्ते की दुम और इंसान की फितरत

महाराजा कृष्णदेवराय एक बहुत ही आशावादी शासक थे। उनका मानना था कि यदि किसी भी जीव को अच्छा माहौल, अच्छी परवरिश और भरपूर धन-सुविधाएं दी जाएं, तो उसकी बुरी से बुरी आदत को भी हमेशा के लिए सुधारा जा सकता है।
एक दिन राजदरबार में इसी बात पर चर्चा चल रही थी। तेनालीरामा ने महाराज की बात से असहमति जताते हुए कहा: "महाराज! आपकी बात इंसानों पर कुछ हद तक लागू हो सकती है, परंतु कुछ लोगों और जीवों की मूल फितरत कभी नहीं बदलती। आप चाहें उन्हें कितनी भी सुविधाएं दे दें, वे मौका मिलते ही अपनी पुरानी आदत पर लौट आते हैं। बिल्कुल एक 'कुत्ते की दुम' की तरह, जिसे चाहे कितने भी दिन नली में रखो, वह टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है।"
महाराज को यह बात चुभ गई। उनकी ज़िद जाग उठी। उन्होंने तुरंत पूरे दरबार में ऐलान कर दिया: "मैं यह साबित करके रहूँगा कि अच्छी परवरिश से कुत्ते की दुम भी सीधी की जा सकती है! मैं अपने सभी दरबारियों को एक-एक 'कुत्ता' और उसके पालन-पोषण के लिए 6 महीने तक हर महीने 100 सोने के सिक्के दूँगा। जो भी अपने कुत्ते की दुम सीधी करके लाएगा, उसे भारी इनाम मिलेगा।"
दरबारियों के अजीबोगरीब प्रयास: सभी दरबारियों को एक-एक कुत्ता और सोने के सिक्के मिल गए।
किसी दरबारी ने अपने कुत्ते की दुम पर भारी वज़न बांध दिया। किसी ने रोज़ उसकी दुम की शुद्ध देसी घी से मालिश करवानी शुरू कर दी। किसी ने उसकी दुम को एक सीधी बांस की नली में फंसा कर बांध दिया, ताकि वह सीधी रहे। वे कुत्तों को काजू-किशमिश खिलाते और उनकी खूब देखभाल करते।
तेनालीरामा को भी एक कुत्ता मिला था। परंतु उन्होंने उस कुत्ते को न तो काजू खिलाए और न ही उसकी दुम पर कोई नली बांधी।
6 महीने बाद दरबार में पेशी: छह महीने पूरे होने पर सभी दरबारी अपने-अपने हट्टे-कट्टे और मोटे-ताज़े कुत्तों को लेकर दरबार में हाज़िर हुए।
महाराज ने परीक्षण शुरू किया। जिस दरबारी ने कुत्ते की दुम पर वज़न बांधा था, जैसे ही उसने वज़न हटाया... 'स्प्रिंग' की तरह कुत्ते की दुम वापस टेढ़ी होकर ऊपर मुड़ गई! जिसने बांस की नली बांधी थी, नली हटाते ही उसकी दुम भी तुरंत मुड़ गई। घी की मालिश वाले कुत्ते की दुम भी पहले जैसी ही टेढ़ी रही।
महाराज निराश हो गए। तभी तेनालीरामा दरबार में पहुँचे। उनके साथ जो कुत्ता था, वह बिल्कुल दुबला-पतला, कमज़ोर और हड्डियों का ढांचा लग रहा था। वह ठीक से चल भी नहीं पा रहा था।
परंतु जब सबकी नज़र उस कुत्ते की 'दुम' पर पड़ी, तो सब हैरान रह गए। उस कमज़ोर कुत्ते की दुम बिल्कुल 'सीधी' ज़मीन की तरफ लटक रही थी! उसमें ज़रा सा भी घुमाव नहीं था।
राजा का क्रोध और तेनाली का गहरा संदेश: महाराज ने कुत्ते की यह दुर्दशा देखकर गुस्से से कहा: "तेनालीरामा! तुमने इस बेज़ुबान जानवर के साथ यह क्या किया? तुमने इसे भूखा क्यों रखा? मैंने तुम्हें इसकी देखभाल के लिए सोने के सिक्के दिए थे!"
तेनालीरामा ने हाथ जोड़कर अत्यंत दार्शनिक और गंभीर स्वर में कहा: "क्षमा करें महाराज! मैंने इस कुत्ते को भूखा नहीं मारा, बल्कि मैंने आपको इंसान की फितरत का एक बहुत बड़ा सच दिखाया है। आपने देखा कि बाकी कुत्तों को जब बहुत सारा घी, मेवा और ताकत दी गई, तो ताकत मिलते ही उनकी दुम अपने 'अहंकार' में वापस टेढ़ी हो गई।"
तेनालीरामा ने उस सीधे दुम वाले कमज़ोर कुत्ते की ओर इशारा करते हुए आगे कहा: "महाराज! दुष्ट और धूर्त इंसानों की फितरत भी बिल्कुल इस 'कुत्ते की दुम' जैसी होती है। जब तक वे कमज़ोर और साधनहीन होते हैं, तब तक वे बिल्कुल 'सीधे' और सज्जन बने रहते हैं। परंतु जैसे ही आप उन्हें धन, ताकत और सत्ता दे देते हैं... उनकी पुरानी फितरत वापस आ जाती है और वे फिर से 'टेढ़े' (भ्रष्ट) हो जाते हैं! अच्छी परवरिश हर किसी की फितरत नहीं बदल सकती।"
महाराज कृष्णदेवराय तेनालीरामा का यह गहरा कूटनीतिक संदेश सुनकर अवाक रह गए। उनका सारा क्रोध शांत हो गया और उन्होंने अपनी ज़िद छोड़ते हुए तेनालीरामा की इस अद्भुत व्यावहारिक सोच की जमकर सराहना की।
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