जादुई शाल और कंजूस सेठ — अदृश्य होने का लालच और करारी मार

विजयनगर की राजधानी में धर्मदास नाम का एक बहुत बड़ा व्यापारी रहता था। वह जितना अमीर था, उससे कहीं ज़्यादा लालची और कंजूस था। वह अपने यहाँ काम करने वाले मज़दूरों को पूरी पगार नहीं देता था और अक्सर गरीबों का हक मार लेता था। कई लोगों ने उसकी शिकायत तेनालीरामा से की। तेनालीरामा ने उस कंजूस सेठ को सबक सिखाने की ठान ली।
एक दिन तेनालीरामा अपने कंधे पर एक बहुत ही साधारण और पुरानी सी 'शाल' ओढ़कर धर्मदास सेठ की दुकान पर पहुँचे।
तेनालीरामा ने बड़ी ही रहस्यमयी आवाज़ में सेठ से कहा: "सेठ जी! आज मुझे हिमालय के एक महान सिद्ध बाबा से यह 'जादुई शाल' मिली है। इसकी खासियत यह है कि जो भी इसे ओढ़ लेता है, वह दुनिया की नज़रों से बिल्कुल 'अदृश्य' हो जाता है! उसे कोई नहीं देख सकता।"
सेठ धर्मदास की आंखें लालच से चमक उठीं। उसने सोचा, "अगर यह शाल मुझे मिल जाए, तो मैं अदृश्य होकर राजा के खज़ाने और बाज़ार से खूब सारा धन और कीमती सामान चुरा सकता हूँ!"
शाल का 'लाइव' परीक्षण: सेठ ने शाल खरीदने की इच्छा जताई, परंतु उसने कहा, "मैं कैसे मान लूँ कि यह सचमुच काम करती है?"
तेनालीरामा ने अपनी योजना के अनुसार सेठ की दुकान के बाहर अपने दो मित्रों को पहले से ही खड़ा कर रखा था। तेनालीरामा ने वह शाल ओढ़ ली और ज़ोर से बोले: "हे जादुई शाल! मुझे अदृश्य कर दो!"
इसके बाद तेनालीरामा ने दुकान के बाहर खड़े अपने मित्रों को आवाज़ दी, "अरे भाइयो! क्या मैं तुम्हें दिखाई दे रहा हूँ?" मित्रों ने (योजना के अनुसार) इधर-उधर देखने का नाटक करते हुए कहा: "अरे तेनालीरामा! तुम्हारी आवाज़ तो आ रही है, परंतु तुम कहाँ हो? हमें तो तुम बिल्कुल दिखाई नहीं दे रहे!"
यह देखकर सेठ का दिमाग चकरा गया। उसे पूरा यकीन हो गया कि शाल जादुई है। सेठ ने तुरंत अपनी तिजोरी खोली और 5,000 सोने के सिक्के देकर तेनालीरामा से वह शाल खरीद ली। तेनालीरामा सिक्के लेकर चुपचाप वहाँ से खिसक गए और उन्होंने वह सारा धन गरीब मज़दूरों में बांट दिया।
अदृश्य सेठ और बाज़ार की मार: अगले दिन सुबह-सुबह, सेठ धर्मदास ने वह 'जादुई शाल' ओढ़ी और बाज़ार में निकल पड़ा। उसे लग रहा था कि कोई उसे देख नहीं सकता।
वह एक बड़ी सी मिठाई की दुकान पर गया और वहां रखे लड्डू उठाकर सरेआम खाने लगा। हलवाई ने जब एक आदमी को अपनी दुकान से मुफ्त में लड्डू खाते देखा, तो उसने अपना डंडा उठा लिया।
हलवाई चिल्लाया, "अरे ओ सेठ! बिना पैसे दिए लड्डू कैसे खा रहा है?" सेठ ने सोचा कि शायद हलवाई को भ्रम हो रहा है, क्योंकि वह तो अदृश्य है! सेठ ने उसे चिढ़ाते हुए उसकी गल्ले से पैसे निकालने के लिए हाथ बढ़ाया।
हलवाई का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने और आस-पास के दुकानदारों ने मिलकर उस कंजूस सेठ को पकड़ लिया और डंडों-घूंसों से उसकी जमकर धुनाई कर दी! सेठ दर्द से चिल्लाता रहा: "अरे मुझे मत मारो! मैं तो अदृश्य हूँ! तुम मुझे कैसे देख सकते हो?"
दरबार में न्याय और तेनाली का तर्क: पिटाई खाने के बाद सूजे हुए मुँह के साथ सेठ धर्मदास रोता हुआ महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में पहुँचा। उसने तेनालीरामा पर धोखाधड़ी का इल्ज़ाम लगाया।
महाराज ने तेनालीरामा से पूछा: "तेनाली! तुमने इस सेठ को धोखा क्यों दिया?"
तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़े और कहा: "महाराज! मैंने कोई धोखा नहीं दिया। सिद्ध बाबा ने मुझे बताया था कि यह शाल केवल उसी व्यक्ति को 'अदृश्य' कर सकती है, जिसका मन बिल्कुल साफ हो और जिसने जीवन में कभी किसी गरीब का हक न मारा हो!"
तेनालीरामा ने सेठ की ओर घूरते हुए आगे कहा: "अब यह शाल काम नहीं कर रही, तो इसमें शाल की क्या गलती है? इसका सीधा सा अर्थ है कि सेठ धर्मदास का मन पाप और बेईमानी से भरा है। इसने गरीबों का खून चूसा है। इसी के पापों के कारण शाल का जादू खत्म हो गया!"
सेठ धर्मदास अपनी ही जाल में बुरी तरह फंस चुका था। वह राजा के सामने अपनी बेईमानी की बात कैसे काट सकता था? महाराज कृष्णदेवराय सारी चाल समझ गए। वे ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगे। उन्होंने सेठ को चेतावनी दी कि यदि उसने गरीबों का हक मारा, तो अगली बार शाल नहीं, बल्कि सीधे राजा के कोड़े बरसेंगे।
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