स्वर्ग का रास्ता कहाँ है? — राजा की खोज और धरती का स्वर्ग

महाराजा कृष्णदेवराय बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के शासक थे। एक बार उनके दरबार में एक बहुत ही ढोंगी और लालची साधु (बाबा) आया। उसने अपने भस्म लगे शरीर और मीठी बातों से महाराज को बहुत प्रभावित कर लिया।
बातों-बातों में ढोंगी साधु ने महाराज से कहा: "महाराज! आपने इस धरती पर तो बहुत राज कर लिया। परंतु मृत्यु के बाद क्या? मेरे पास एक ऐसी सिद्ध विद्या है, जिससे मैं सीधे 'स्वर्ग की सीढ़ियां' बना सकता हूँ! यदि आप मुझे 50,000 सोने के सिक्के और एक बड़ा सा खाली मैदान दें, तो मैं 6 महीने में स्वर्ग का सीधा रास्ता तैयार कर दूँगा।"
स्वर्ग के लालच में आकर महाराज ने उस बाबा को 50,000 सोने के सिक्के देने का मन बना लिया।
तेनालीरामा का हस्तक्षेप: तेनालीरामा समझ गए कि यह ढोंगी साधु महाराज को मूर्ख बनाकर सारा खज़ाना लूटने आया है।
तेनालीरामा अपनी जगह से उठे और बोले: "महाराज! 50,000 मोहरें तो बहुत ज़्यादा हैं। स्वर्ग का रास्ता तो मैं केवल 10,000 सोने के सिक्कों में ही तैयार कर सकता हूँ! और वह भी सिर्फ 3 महीने के भीतर।"
ढोंगी साधु ने तेनालीरामा को घूरा, परंतु महाराज ने पैसे बचाने और तेनालीरामा पर अधिक विश्वास होने के कारण, वह 10,000 मोहरों का खज़ाना तेनाली को सौंप दिया और साधु को विदा कर दिया।
3 महीने बाद का नज़ारा: 3 महीने बीत गए। महाराज स्वर्ग की सीढ़ियां देखने के लिए अत्यंत बेचैन थे। उन्होंने तेनालीरामा को बुलाया और पूछा: "तेनालीरामा! तीन महीने पूरे हो गए हैं। बताओ, स्वर्ग का रास्ता कहाँ है?"
तेनालीरामा ने कहा, "महाराज! आप अपना शाही लिबास उतारकर साधारण कपड़े पहन लीजिए। स्वर्ग का रास्ता मैं आपको आज ही दिखाऊँगा।"
तेनालीरामा महाराज को रथ में बिठाकर विजयनगर के बाहरी गाँवों की ओर ले गए।
जब वे एक बहुत ही गरीब गाँव में पहुँचे, तो महाराज यह देखकर हैरान रह गए कि वहाँ की पूरी तस्वीर बदल चुकी थी। गाँव में एक नई और विशाल झील खुदी हुई थी जिससे किसानों के खेतों को भरपूर पानी मिल रहा था। एक नया अस्पताल (वैद्यशाला) और बच्चों के लिए एक गुरुकुल भी बना हुआ था। गाँव के लोग बहुत खुश थे और वे सब हाथ जोड़कर आसमान की ओर देखते हुए अपने महाराज कृष्णदेवराय को लंबी उम्र का आशीर्वाद दे रहे थे।
धरती का स्वर्ग: महाराज ने हैरानी से तेनालीरामा की ओर देखा और पूछा: "यह सब क्या है तेनाली? और तुमने मेरे 10,000 सोने के सिक्के कहाँ खर्च किए? तुमने तो मुझे 'स्वर्ग का रास्ता' दिखाने का वादा किया था!"
तेनालीरामा ने अत्यंत विनम्रता और दार्शनिक भाव से कहा: "महाराज! मैंने आपके वे 10,000 सोने के सिक्के बादलों के बीच कोई काल्पनिक सीढ़ी बनाने में बर्बाद नहीं किए। बल्कि मैंने उन सिक्कों का उपयोग इन गरीब किसानों की भलाई, उनके पानी और बच्चों की शिक्षा के लिए किया है।"
तेनालीरामा ने खुशहाल गाँव वालों की ओर इशारा करते हुए आगे कहा: "हुज़ूर! आसमान में स्वर्ग है या नहीं, यह कोई नहीं जानता। परंतु असली 'स्वर्ग का रास्ता' गरीबों और अपनी प्रजा की सेवा से होकर ही गुज़रता है। जिस राज्य की प्रजा खुशहाल है, जहाँ के लोग अपने राजा को दिल से दुआएं देते हैं... वह राज्य किसी स्वर्ग से कम नहीं होता! आपने आज धरती पर ही स्वर्ग बना दिया है।"
महाराज कृष्णदेवराय की आंखें भर आईं। वे समझ गए कि तेनालीरामा ने उन्हें अंधविश्वास और ढोंगी साधुओं के जाल से निकालकर 'असली राजधर्म' का पाठ पढ़ाया है।
महाराज ने तेनालीरामा को गले लगा लिया और कहा: "तुमने मेरी आंखें खोल दीं तेनाली। प्रजा की खुशी ही मेरा असली स्वर्ग है।" महाराज ने उस दिन के बाद से कभी किसी ढोंगी पर विश्वास नहीं किया और अपना खज़ाना प्रजा की भलाई में लगा दिया।
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