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तेनालीरामा की मौत की अफवाह — असली दोस्तों और दुश्मनों की पहचान

लोक परंपरा — तेनालीराम6 मिनट का पठन
तेनालीरामा की मौत की अफवाह — असली दोस्तों और दुश्मनों की पहचान

तेनालीरामा की बढ़ती लोकप्रियता और महाराज कृष्णदेवराय के उन पर अटूट विश्वास के कारण, दरबार के कई मंत्री और विद्वान तेनालीरामा से भयंकर ईर्ष्या करते थे। वे हमेशा महाराज के कान भरते रहते थे कि तेनालीरामा एक लालची और कपटी इंसान है। महाराज इन बातों पर ध्यान नहीं देते थे, परंतु तेनालीरामा को अपने इन छिपे हुए दुश्मनों का पर्दाफाश करना था।

एक दिन तेनालीरामा ने एक खतरनाक योजना बनाई। वे कई दिनों तक दरबार नहीं गए। उन्होंने अपने घर के दरवाज़े बंद कर लिए और अपनी पत्नी को समझा दिया कि वह क्या करे।

अगले दिन सुबह-सुबह, तेनालीरामा की पत्नी रोती-बिलखती हुई राजमहल पहुँची और उसने रोते हुए महाराज को खबर दी: "महाराज! अनर्थ हो गया... रात को अचानक भयंकर बुखार आने के कारण तेनालीरामा का स्वर्गवास हो गया!"

दरबार में शोक और मगरमच्छ के आंसू: 'मौत' की खबर सुनते ही दरबार में मातम छा गया। महाराजा कृष्णदेवराय को गहरा सदमा लगा। उनकी आंखों से आंसू बहने लगे। उनका सबसे चतुर वज़ीर और सबसे अच्छा मित्र उन्हें छोड़कर चला गया था।

परंतु, दूसरी तरफ, तेनालीरामा के उन ईर्ष्यालु दुश्मनों (राजगुरु, सेनापति और कुछ अन्य मंत्रियों) के मन में लड्डू फूट रहे थे। उनका सबसे बड़ा कांटा अपने आप रास्ते से हट गया था। फिर भी, महाराज के सामने दिखावा करने के लिए वे सब ज़ोर-ज़ोर से रोने का नाटक करने लगे और अपनी आंखों से मगरमच्छ के आंसू बहाने लगे।

दुश्मनों की चाल: राजगुरु ने रोने का नाटक करते हुए महाराज से कहा: "महाराज! तेनालीरामा बहुत ही गुणी व्यक्ति था। हमें उसके जाने का गहरा दुख है। परंतु... राज्य का काम तो नहीं रुक सकता। तेनालीरामा का पद बहुत महत्वपूर्ण था, इसलिए हमें तुरंत उसकी जगह किसी और 'योग्य' व्यक्ति को नियुक्त कर देना चाहिए।"

एक अन्य मंत्री ने कहा: "जी महाराज! और तेनालीरामा के पास जो अपार शाही संपत्ति और जागीर थी, वह भी शाही खज़ाने में वापस ले लेनी चाहिए, ताकि उसका सही उपयोग हो सके।"

महाराज अपने दुख में डूबे थे, परंतु उन्हें अपने ही मंत्रियों की ये स्वार्थी और जल्दबाज़ी से भरी बातें बहुत अजीब और असंवेदनशील लग रही थीं।

स्वर्ग से वापसी: तभी दरबार के मुख्य द्वार पर एक भारी हलचल हुई। पहरेदार घबराकर पीछे हटने लगे।

सबने मुड़कर देखा तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। तेनालीरामा ज़िंदा, बिल्कुल स्वस्थ और मुस्कुराते हुए दरबार के भीतर चले आ रहे थे! उन्होंने एक सफेद रंग की शाल ओढ़ी हुई थी।

उन्हें देखकर उन ईर्ष्यालु मंत्रियों की चीख निकल गई। वे डर के मारे कांपने लगे कि कहीं यह तेनालीरामा का भूत तो नहीं है!

महाराज कृष्णदेवराय अपनी गद्दी से उछल पड़े। उन्होंने दौड़कर तेनालीरामा को गले लगा लिया और पूछा: "तेनाली! तुम ज़िंदा हो? तुम्हारी पत्नी तो कह रही थी कि तुम स्वर्ग सिधार गए?"

तेनालीरामा का कूटनीतिक प्रहार: तेनालीरामा ने महाराज के पैर छुए और उन कांपते हुए मंत्रियों की ओर तीखी नज़र डालते हुए कहा: "महाराज! मेरी पत्नी ने बिल्कुल सच कहा था। मैं मर गया था और सीधा स्वर्ग पहुँच गया था। परंतु वहाँ पहुँचकर देवताओं के राजा इंद्र ने मुझे वापस ज़मीन पर धकेल दिया!"

महाराज ने हैरानी से पूछा, "इंद्र ने तुम्हें वापस क्यों भेज दिया?"

तेनालीरामा ने ज़ोरदार आवाज़ में कहा: "महाराज! भगवान इंद्र ने मुझसे कहा कि 'हे तेनालीरामा! स्वर्ग में सब कुछ है, परंतु यहाँ विजयनगर जैसा महान और दयालु कोई राजा नहीं है! और सबसे बड़ी बात... स्वर्ग में देवताओं के बीच तुम्हारे दरबार जैसे कपटी, लालची और मगरमच्छ के आंसू बहाने वाले दरबारी भी नहीं हैं। उनके बिना स्वर्ग बिल्कुल सूना है। इसलिए तुम वापस जाओ और अपने उन्हीं दुश्मनों के बीच मज़ा करो जो तुम्हारी लाश ठंडी होने से पहले ही तुम्हारी कुर्सी और संपत्ति छीनने की योजना बनाने लगते हैं!'"

यह तीखा व्यंग्य सुनते ही राजगुरु और उन ईर्ष्यालु मंत्रियों के चेहरे शर्म और डर से सफेद पड़ गए। वे समझ गए कि तेनालीरामा ने उनकी असलियत महाराज के सामने लाने के लिए ही अपनी मौत का यह सारा नाटक रचा था।

महाराज कृष्णदेवराय सारी चाल समझ गए। उन्होंने उन स्वार्थी दरबारियों को कड़ी फटकार लगाई और तेनालीरामा को सुरक्षित अपने बीच पाकर पूरे राज्य में जश्न मनाने का आदेश दिया।

🎉 कहानी समाप्त

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