भाग 15: पंचवटी में श्रीराम का विलाप और जटायु को मोक्ष

मायावी मारीच का वध करने के पश्चात, श्रीराम का मन किसी अज्ञात भय से कांप उठा था। मारीच द्वारा मरते समय उनके स्वर में लक्ष्मण को पुकारना उन्हें किसी गहरे षड्यंत्र का संकेत दे रहा था। वे अत्यंत व्यग्रता के साथ पंचवटी की ओर लौट पड़े। मार्ग में ही उन्हें लक्ष्मण अपनी ओर आते हुए दिखाई दिए।
लक्ष्मण को अकेला आता देख श्रीराम का हृदय धक से रह गया। उन्होंने व्याकुल होकर पूछा, "लक्ष्मण! तुम सीता को उस निर्जन वन में अकेली छोड़कर यहाँ क्यों आ गए? मैंने तो तुम्हें उनकी रक्षा का आदेश दिया था। मेरा बायां नेत्र फड़क रहा है और मन में घोर अमंगल की आशंका हो रही है। यदि कुटिया में सीता सुरक्षित न मिलीं, तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगा!"
लक्ष्मण ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से माता सीता के उन कठोर वचनों का वर्णन किया, जिनके कारण उन्हें विवश होकर कुटिया छोड़नी पड़ी। दोनों भाई अत्यंत तीव्र गति से दौड़ते हुए पंचवटी पहुँचे।
परंतु जब उन्होंने पर्णकुटी के द्वार पर कदम रखा, तो वहाँ का दृश्य देखकर श्रीराम के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। कुटिया सूनी थी। वहाँ न सीता थीं, न उनकी कोई आहट। कुटिया के बाहर बिखरे हुए पुष्प और टूटी हुई मालाएं इस बात की गवाही दे रही थीं कि वहाँ कुछ भयंकर घटित हुआ है।
सीता को न पाकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपना सारा धैर्य और नियंत्रण खो बैठे। वे एक साधारण और अत्यंत शोकाकुल मनुष्य की भांति फूट-फूट कर रोने लगे। उनका विलाप इतना हृदय विदारक था कि उसे सुनकर पत्थर भी पिघल जाएं।
श्रीराम पागलों की तरह वन में यहाँ-वहाँ दौड़ने लगे। वे कभी किसी वृक्ष से लिपट जाते, तो कभी लताओं से पूछते। उन्होंने गोदावरी नदी, पर्वत की कंदराओं, हिरणों, और पक्षियों—सभी से अपनी सीता का पता पूछा। *"हे खग, हे मृग, हे मधुकर श्रेनी! तुम्ह देखी सीता मृगनयनी?"* (अर्थात: हे पक्षियों, हे हिरणों, हे भंवरों की पंक्तियों! क्या तुमने मेरी मृग के समान सुंदर नेत्रों वाली सीता को कहीं देखा है?)
जब किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया, तो श्रीराम का शोक भयंकर क्रोध में बदल गया। उन्होंने अपना दिव्य धनुष उठा लिया और लाल नेत्रों से लक्ष्मण की ओर देखकर गर्जना की, "लक्ष्मण! यदि आज ही देवताओं ने मेरी सीता को मुझे नहीं लौटाया, तो मैं इस संपूर्ण सृष्टि का नाश कर दूँगा! मैं पहाड़ों को चूर-चूर कर दूँगा, नदियों को सुखा दूँगा और धरती को उलट दूँगा!"
लक्ष्मण ने पहली बार अपने शांत और धैर्यवान भाई का ऐसा प्रलयंकारी क्रोध देखा था। उन्होंने रोते हुए श्रीराम के चरण पकड़ लिए और उन्हें सांत्वना देते हुए कहा, "हे भ्राता! आप तो संपूर्ण जगत के पालनहार हैं। धैर्य धारण करें। सीता माता कहीं नहीं गईं होंगी, अवश्य ही किसी राक्षस ने उनका हरण किया है। हम मिलकर उस नीच का पता लगाएंगे और उसे पाताल से भी खींच लाएंगे। इस प्रकार सृष्टि का नाश करना आपके स्वभाव के अनुकूल नहीं है।"
लक्ष्मण के वचनों से श्रीराम का क्रोध कुछ शांत हुआ, परंतु उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बहती रही। दोनों भाई सीता की खोज में दंडकारण्य के और अधिक घने जंगल में आगे बढ़े।
कुछ दूर जाने पर उन्हें धरती पर युद्ध के भयंकर निशान दिखाई दिए। वहाँ एक बहुत बड़ा टूटा हुआ धनुष, स्वर्ण जटित रथ के टुकड़े, मरे हुए खच्चर और एक राक्षस सारथी का कटा हुआ सिर पड़ा था। पास ही सीता जी के बालों का एक आभूषण भी गिरा हुआ था। यह देखकर श्रीराम समझ गए कि सीता को ले जाते समय किसी राक्षस का यहाँ किसी अन्य शक्तिशाली योद्धा से भारी युद्ध हुआ है।
वे और आगे बढ़े, तो उनकी दृष्टि एक विशाल रक्त-रंजित चट्टान पर पड़ी। वहाँ उन्होंने देखा कि गिद्धराज जटायु, जिनके दोनों पंख निर्ममता से काट दिए गए थे, जीवन की अंतिम सांसें गिन रहे थे।
जटायु ने अत्यंत क्षीण और दर्द भरी आवाज़ में कहा, "हे राम! मेरी यह दुर्दशा उसी नीच राक्षस ने की है जिसने तुम्हारी सीता का हरण किया है। वह लंका का राजा, दुष्ट दशानन रावण है। मैंने उसे रोकने का पूरा प्रयास किया, उसके रथ को भी तोड़ डाला, परंतु उसने अपनी चंद्रहास तलवार से मेरे पंख काट दिए और सीता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर आकाश मार्ग से भाग गया।"
जटायु ने हाँफते हुए आगे कहा, "राम! मैं केवल तुम्हारे दर्शनों के लिए ही अपने प्राणों को रोक कर रखा था। अब मुझे विदा दो..." इतना कहते ही जटायु के मुख से प्राण पखेरू उड़ गए।
जटायु का यह निस्वार्थ बलिदान देखकर श्रीराम उसी प्रकार रो पड़े जैसे वे अपने पिता दशरथ की मृत्यु पर रोए थे। श्रीराम ने जटायु के मृत शरीर को अपनी गोद में रख लिया। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण! यह पक्षी मेरे पिता के समान था। इसने मेरी पत्नी की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है। मैं स्वयं इसके अंतिम संस्कार के सारे कर्म करूँगा।"
श्रीराम ने गोदावरी नदी से जल लाकर जटायु के शरीर को स्नान कराया। लक्ष्मण ने लकड़ियां लाकर चिता सजाई। साक्षात परब्रह्म श्रीराम ने अपनी जटाओं को खोलकर एक पुत्र की भांति जटायु की चिता को मुखाग्नि दी और उनका तर्पण किया।
श्रीराम के हाथों अंतिम संस्कार प्राप्त कर, जटायु को वह परम मोक्ष (वैकुंठ धाम) प्राप्त हुआ जिसे प्राप्त करने के लिए बड़े-बड़े योगी और तपस्वी जन्मों-जन्मों तक तपस्या करते हैं।
जटायु का उद्धार करने के पश्चात, श्रीराम और लक्ष्मण रावण का वध करने और सीता को वापस लाने का दृढ़ संकल्प लेकर, दक्षिण दिशा की ओर उन अनजान और भयंकर वनों में आगे बढ़ चले, जहाँ उनका सामना एक और मायावी राक्षस और फिर एक परम भक्त से होने वाला था।
🏹 रामायण की और कहानियाँ
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