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"ऊँची दुकान फीका पकवान"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"ऊँची दुकान फीका पकवान"

'सीतापुर' गाँव के पास एक नया और बड़ा शहर बसा था। उस शहर के मुख्य बाज़ार में 'सेठ चमकीला राम' ने एक बहुत ही विशाल मिठाई की दुकान खोली।

दुकान का नाम था— "महाराजा मिष्ठान भंडार"। यह दुकान पूरे बाज़ार में सबसे अलग दिखती थी। दुकान के बाहर शीशे के बड़े-बड़े दरवाज़े लगे थे, रंग-बिरंगी झालरें लटक रही थीं और चाँदी के वर्क से सजे हुए बड़े-बड़े बोर्ड लगे थे। सेठ चमकीला राम ने दुकान को सजाने में तो लाखों रुपये खर्च किए थे, लेकिन मिठाई बनाने के लिए उसने सबसे 'सस्ते और खराब कारीगर' रखे हुए थे। वह दूध की जगह पाउडर और असली घी की जगह मिलावटी तेल इस्तेमाल करता था।

गरीब किसान की उम्मीद: उसी सीतापुर गाँव में 'गोपी' नाम का एक बहुत ही सीधा और गरीब किसान रहता था। गोपी की इकलौती बेटी की शादी थी। गोपी चाहता था कि बारात के स्वागत के लिए वह शहर की 'सबसे अच्छी और महँगी' दुकान से शानदार मिठाइयाँ लेकर आए, ताकि गाँव में उसकी इज़्ज़त बढ़े।

गोपी ने अपनी ज़िंदगी भर की गाढ़ी कमाई जेब में रखी और शहर के बाज़ार पहुँच गया। जब उसने "महाराजा मिष्ठान भंडार" की चकाचौंध देखी, तो उसकी आँखें फटी रह गईं।

वह दुकान के अंदर गया। वहाँ मिठाइयाँ बहुत ही सुंदर और मखमली 'रंगीन डिब्बों' में पैक थीं, जिन पर सुनहरे रंग के रिबन बँधे हुए थे।

गोपी ने सेठ से कहा: "सेठ जी! मेरी बेटी की शादी है। मुझे अपनी दुकान की सबसे बेहतरीन 'देसी घी की बर्फी और लड्डू' दे दीजिए।" सेठ चमकीला राम ने मुस्कुराते हुए उन शानदार और महँगे डिब्बों में मिठाई पैक कर दी और गोपी से बाज़ार के भाव से 'दुगने पैसे' वसूल लिए।

कड़वी असलियत का पर्दाफाश: गोपी बहुत ही गर्व के साथ वे चमचमाते हुए डिब्बे लेकर अपने गाँव पहुँचा। शाम को बारात आई। गाँव के सरपंच और लड़के वालों के सामने बड़े ही शान से वे सुनहरे डिब्बे खोले गए। डिब्बे देखते ही सबने कहा, "वाह गोपी! तुम तो शहर की सबसे बड़ी दुकान से मिठाई लाए हो!"

लेकिन... जैसे ही सरपंच जी ने एक 'लड्डू' उठाकर अपने मुँह में डाला और उसे चबाने की कोशिश की, उनके दाँत में तेज़ दर्द हो गया— 'कड़ाक्!'

लड्डू पत्थर जैसा सख्त था! दूल्हे के पिता ने बर्फी खाई, तो उसका मुँह अजीब सा हो गया। बर्फी में से 'खराब और बासी तेल' की बदबू आ रही थी। मिठाइयों में न कोई मिठास थी और न ही ताज़गी। वे बिल्कुल सड़ी हुई और बेस्वाद थीं।

बारातियों ने गुस्से में मिठाइयों के डिब्बे ज़मीन पर फेंक दिए और गोपी की बहुत बेइज्जती हुई। गोपी रोने लगा कि उसके सारे पैसे भी लुट गए और उसकी नाक भी कट गई।

अगले दिन गोपी और गाँव के सरपंच गुस्से में उस सेठ चमकीला राम की दुकान पर पहुँचे। सरपंच ने वह सड़ा हुआ लड्डू सेठ के गल्ले पर ज़ोर से पटका और पूरी भीड़ के सामने चिल्लाकर कहा:

"अरे ओ धोखेबाज़ सेठ! तूने दुकान के बाहर तो शीशे और बिजली की लाइटें लगा रखी हैं, डिब्बों पर सुनहरे रिबन बाँध रखे हैं, लेकिन अंदर जो मिठाई है, वह सूअरों के खाने लायक भी नहीं है! तेरी दुकान तो बस बेवकूफ़ बनाने का अड्डा है। तेरे लिए तो वह कहावत बिल्कुल सच है— 'ऊँची दुकान... फीका पकवान!'"

(यानी बाहर से बहुत ऊँचा और बड़ा नाम, लेकिन अंदर से खाने का स्वाद बिल्कुल फीका और घटिया)। सेठ का सारा भंडाफोड़ हो गया और भीड़ ने उसकी दुकान बंद करवा दी।

🎉 कहानी समाप्त

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