खेत का बँटवारा (चालाक किसान के साथ)

शेख चिल्ली के पास न तो कोई पक्का काम था और न ही कोई ज़मीन। एक दिन उसने सोचा कि खाली बैठकर खयाली पुलाव पकाने से तो अच्छा है कि खेतीबाड़ी करके कुछ असली अनाज कमाया जाए।
गाँव में 'धनीराम' नाम का एक बहुत ही चालाक और धूर्त किसान रहता था। धनीराम के पास बहुत सारी ज़मीन थी, लेकिन वह खुद मेहनत करने से बचता था और हमेशा दूसरों का फायदा उठाने की फिराक में रहता था। जब धनीराम को पता चला कि शेख चिल्ली खेती करना चाहता है, तो उसकी आँखों में चालाकी की चमक आ गई। उसे मुफ्त का एक मज़दूर जो मिल रहा था!
धनीराम ने शेख चिल्ली को अपने पास बुलाया और बहुत ही मीठी आवाज़ में कहा, "अरे शेख भाई! मैंने सुना है तुम खेती करना चाहते हो। बहुत अच्छी बात है। मेरे पास एक खाली खेत पड़ा है। हम दोनों मिलकर उस खेत में खेती करेंगे। मेहनत हम दोनों की होगी और जो भी फसल पैदा होगी, हम उसे आधा-आधा बाँट लेंगे। बोलो, मंज़ूर है?"
शेख चिल्ली यह सुनकर बहुत खुश हुआ। उसने तुरंत हामी भर दी।
खेती शुरू करने से पहले धनीराम ने एक शर्त रखी। उसने कहा, "शेख भाई! फसल कटने के बाद बँटवारे में कोई झगड़ा न हो, इसलिए हम पहले ही तय कर लेते हैं कि किसे क्या मिलेगा। ऐसा करते हैं, जब फसल तैयार होगी, तो ज़मीन के 'ऊपर का हिस्सा' मेरा होगा, और ज़मीन के 'नीचे का हिस्सा' तुम्हारा होगा। ठीक है?"
शेख चिल्ली ने अपना भोला दिमाग लगाया और सोचा कि ज़मीन के नीचे तो बहुत सारा खज़ाना और जड़ें होती हैं। उसने बिना सोचे-समझे खुशी-खुशी यह शर्त मान ली।
दोनों ने मिलकर खेत जोता और बीज बो दिए। धनीराम ने चालाकी से खेत में 'गेहूँ' की फसल बोई थी।
शेख चिल्ली ने महीनों तक खेत में खूब पसीना बहाया। उसने दिन-रात खेत में पानी दिया और रखवाली की, जबकि धनीराम पेड़ की छाँव में सोता रहा। कुछ ही महीनों में खेत में सुनहरे गेहूँ की फसल लहलहाने लगी।
जब फसल काटने का समय आया, तो शर्त के अनुसार बँटवारा हुआ। धनीराम ने ज़मीन के 'ऊपर का हिस्सा' यानी गेहूँ की सारी बालियाँ और अनाज अपने घर भिजवा दिया। और शेख चिल्ली को शर्त के अनुसार ज़मीन के 'नीचे का हिस्सा' यानी केवल सूखी घास और गेहूँ की जड़ें मिलीं!
शेख चिल्ली उन जड़ों को देखकर अपना माथा पकड़ कर बैठ गया। उसे समझ आ गया कि धनीराम ने उसे बेवकूफ़ बनाया है।
अगले मौसम में खेती का फिर समय आया। शेख चिल्ली धनीराम के पास गया और बोला, "धनीराम! पिछली बार तुमने मुझे धोखा दिया था। सारा अनाज तुम ले गए और मुझे सिर्फ जड़ें मिलीं। इस बार खेती होगी, लेकिन शर्त मेरी मर्जी से तय होगी!"
धनीराम मन ही मन मुस्कुराया और बोला, "ठीक है भाई! बताओ इस बार तुम्हारी क्या शर्त है?"
शेख चिल्ली ने अकड़ते हुए कहा, "इस बार जब फसल तैयार होगी, तो ज़मीन के 'ऊपर का हिस्सा' मेरा होगा, और ज़मीन के 'नीचे का हिस्सा' तुम्हारा होगा! अब देखना सारा अनाज मुझे ही मिलेगा।"
धनीराम ने बहुत ही मासूमियत का नाटक करते हुए यह शर्त मान ली।
इस बार धनीराम ने फिर अपनी चालाकी दिखाई और खेत में 'आलू' बो दिए!
शेख चिल्ली ने फिर से महीनों तक कड़ी मेहनत की, खेत सींचा और पसीना बहाया। उसे लगा कि इस बार ऊपर का सारा अनाज उसे मिलेगा।
जब फसल तैयार हुई, तो बँटवारे का समय आया। शर्त के अनुसार धनीराम ने ज़मीन के 'नीचे का हिस्सा' खोदा और सारे बड़े-बड़े और ताज़े आलू बोरियों में भरकर अपने घर ले गया।
और बेचारे शेख चिल्ली के हिस्से में ज़मीन के 'ऊपर का हिस्सा' यानी आलू के केवल हरे पत्ते और सूखी डंठलें आईं!
शेख चिल्ली उन पत्तों को देखकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसे अब जाकर समझ आया कि अक्लमंद के साथ साझेदारी करने से पहले खुद भी अक्लमंद होना ज़रूरी है। धनीराम ने बिना मेहनत किए दो बार फसल का मज़ा लिया और शेख चिल्ली अपनी बेवकूफी के कारण केवल जड़ें और पत्ते ही चबाता रह गया।
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