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शेख चिल्ली और चोरों की मदद

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
शेख चिल्ली और चोरों की मदद

शेख चिल्ली जितना बेवकूफ़ था, उतना ही गरीब भी था। उसके घर में टूटी हुई खटिया, दो-चार मिट्टी के बर्तन और एक पुरानी लालटेन के अलावा और कुछ नहीं था। उसे इस बात की कोई फिक्र नहीं थी कि कल क्या खाना है; वह तो बस अपनी मस्ती और सपनों में मगन रहता था।

एक रात सर्दियों का समय था। शेख चिल्ली अपनी पुरानी और फटी हुई रज़ाई ओढ़कर गहरी नींद में सो रहा था। बाहर घना अँधेरा था।

उसी रात गाँव के कुछ चोरों ने चोरी करने का मन बनाया। गलती से उन्होंने शेख चिल्ली का घर चुन लिया। उन्हें लगा कि यह घर सुनसान है, शायद अंदर कोई बड़ा खज़ाना दबा हो।

चार चोर बहुत ही दबे पाँव शेख चिल्ली के घर की दीवार फाँदकर अंदर घुस आए। घर के अंदर एकदम घुप अँधेरा था। चोरों ने अपनी जेबों में हाथ डाला, लेकिन वे माचिस लाना भूल गए थे।

अब चोरों ने अँधेरे में ही टटोल-टटोल कर कीमती सामान ढूँढना शुरू किया।

एक चोर दीवार के सहारे-सहारे आगे बढ़ा, तो उसका हाथ मिट्टी के एक खाली मटके से टकरा गया। मटका ज़मीन पर गिरा और टूट गया। दूसरे चोर का पैर लकड़ी के एक पुराने तख्त से टकराया, तो वह दर्द से कराह उठा। तीसरा चोर रसोई की तरफ गया और अँधेरे में बरतनों को टटोलने लगा, जिससे बरतनों के आपस में टकराने की आवाज़ आने लगी।

चोर बहुत ही बेताबी से खज़ाना, सोने-चाँदी के सिक्के या कम से कम कुछ अनाज ढूँढ रहे थे, लेकिन उन्हें कुछ भी हाथ नहीं लग रहा था।

बरतनों और मटकों के टूटने की आवाज़ से शेख चिल्ली की नींद खुल गई।

उसने अपनी रज़ाई के अंदर से ही आँखें खोलीं और अँधेरे में चारों तरफ देखा। उसे समझ आ गया कि उसके घर में चोर घुसे हुए हैं। कोई आम इंसान होता तो डर के मारे चिल्लाने लगता या अपनी जान बचाने के लिए छुप जाता।

लेकिन यह शेख चिल्ली था, जिसकी सोच आम इंसानों से कोसों दूर थी।

शेख चिल्ली को उन चोरों पर गुस्सा आने के बजाय बहुत 'दया' आ गई। उसने सोचा कि ये बेचारे कितनी मेहनत कर रहे हैं। इतनी ठंड में, इतने अँधेरे में धक्के खा रहे हैं, लेकिन इन्हें कुछ मिल नहीं रहा है।

शेख चिल्ली से चोरों की यह परेशानी देखी नहीं गई। वह बहुत ही शांति से अपनी खटिया से उठा। उसने ताक पर रखी माचिस उठाई और एक तीली जलाकर अपनी वह पुरानी 'लालटेन' जला दी।

घर के अंदर अचानक पीली रोशनी फैल गई। चोर रोशनी देखकर एकदम डर गए और जहाँ थे, वहीं बुत बनकर खड़े हो गए। उन्हें लगा कि अब घर का मालिक शोर मचाएगा और गाँव वाले उन्हें पकड़ लेंगे।

लेकिन शेख चिल्ली ने बहुत ही प्यार और हमदर्दी के साथ लालटेन को अपने हाथ में उठाया। वह उन डरे हुए चोरों के पास गया और लालटेन उनके सामने करते हुए बहुत ही मासूमियत से बोला:

"अरे मेरे प्यारे भाइयो! तुम लोग भी कमाल करते हो। इतनी रात को, इस घुप अँधेरे में धक्के खा रहे हो और बर्तन तोड़ रहे हो। भाई! यह मेरा घर है। मैं इस घर का मालिक हूँ और मुझे इस घर में 'दिन के उजाले में' भी एक फूटी कौड़ी नहीं मिलती। तुम लोग यहाँ रात के इस भयानक अँधेरे में क्या ढूँढ रहे हो?"

चोर हक्के-बक्के रह गए। उन्हें समझ नहीं आया कि यह आदमी उनका मज़ाक उड़ा रहा है या सच में पागल है।

शेख चिल्ली ने लालटेन चोरों के सरदार के हाथ में थमाते हुए आगे कहा: "लो भाई! तुम यह लालटेन पकड़ लो। शायद इस रोशनी में तुम्हें कुछ मिल जाए। अगर तुम्हें इस घर में से कोई खज़ाना या पैसे मिल जाएँ, तो जाते-जाते आधा हिस्सा मुझे भी दे जाना, क्योंकि मुझे तो आज तक यहाँ कुछ नहीं मिला!"

चोरों ने एक-दूसरे की तरफ देखा, लालटेन की रोशनी में उस घर की बदहाली और शेख चिल्ली के मासूम चेहरे को देखा। उन्हें समझ आ गया कि वे इस दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ़ और कंगाल इंसान के घर में आ गए हैं।

चोरों ने शर्मिंदगी से अपना सिर पीटा। सरदार ने लालटेन वापस शेख चिल्ली के हाथ में दी और कहा, "भाई! हमें माफ करना। हमें नहीं पता था कि तुम हमसे भी बड़े फकीर हो।"

चोर बिना कुछ लिए, उलटे पाँव उस घर से बाहर निकल गए और शेख चिल्ली लालटेन बुझाकर फिर से अपनी रज़ाई तानकर चैन की नींद सो गया।

🎉 कहानी समाप्त

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