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शेख चिल्ली की काल्पनिक मौत

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
शेख चिल्ली की काल्पनिक मौत

शेख चिल्ली का भोलापन इस हद तक था कि दुनिया जो कुछ भी कहती, वह उसे पत्थर की लकीर मान लेता था। उसमें अपना खुद का दिमाग लगाने की बिल्कुल भी आदत नहीं थी।

एक दिन चौपाल पर गाँव के कुछ बुजुर्ग बैठे मौत और ज़िंदगी के बारे में गहरी बातें कर रहे थे। शेख चिल्ली भी वहीं पास बैठा उनकी बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था।

एक बुजुर्ग ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा, "भाई! ज़िंदगी और मौत का तो एक ही सबसे बड़ा सच है। जब इंसान के शरीर से जान निकल जाती है, तो उसके शरीर का खून जम जाता है और उसके हाथ-पैर बिल्कुल बर्फ की तरह ठंडे पड़ जाते हैं। यही मौत की सबसे बड़ी निशानी है।"

बुजुर्ग की यह बात शेख चिल्ली के दिमाग में गहराई तक छप गई। उसने यह गाँठ बाँध ली कि 'हाथ-पैर ठंडे होने का मतलब है कि इंसान मर चुका है।'

कुछ महीनों बाद, कड़ाके की सर्दियाँ आ गईं। ठंडी और बर्फीली हवाएँ चलने लगीं। एक शाम शेख चिल्ली जंगल से लकड़ियाँ काटकर अपने घर की तरफ लौट रहा था। उसने गर्म कपड़े नहीं पहने थे। ठंडी हवा के झोंकों ने उसे कंपा दिया।

चलते-चलते शेख चिल्ली को महसूस हुआ कि उसके हाथ सुन्न हो रहे हैं। उसने अपने हाथों को रगड़ा, तो वे उसे बहुत ठंडे लगे। फिर उसने अपने पैरों की तरफ ध्यान दिया, तो ठंड के कारण उसके पैर भी बर्फ जैसे ठंडे हो चुके थे।

शेख चिल्ली उसी जगह ठिठक कर रुक गया। उसके दिमाग में तुरंत उस बुजुर्ग की बात गूँज उठी— 'जब इंसान मरता है, तो उसके हाथ-पैर बर्फ जैसे ठंडे पड़ जाते हैं।'

शेख चिल्ली ने घबराहट में खुद से कहा, "अरे बाप रे! मेरे हाथ और पैर तो बिल्कुल ठंडे हो गए हैं। इसका मतलब... इसका मतलब मेरी मौत हो चुकी है! हाय अल्लाह, मैं तो मर गया!"

शेख चिल्ली ने बिना यह सोचे कि जो इंसान मर चुका है वह बोल या सोच कैसे सकता है, खुद को 'मुर्दा' घोषित कर दिया।

उसने सोचा, "अब जब मैं मर ही चुका हूँ, तो मेरा घर जाने का क्या फायदा? मुर्दे तो घर में नहीं रहते, उनका असली ठिकाना तो कब्रिस्तान होता है। मुझे चुपचाप वहीं चले जाना चाहिए।"

यही सोचकर वह मूर्ख अपना घर छोड़कर गाँव के बाहर बने कब्रिस्तान की तरफ चल दिया। कब्रिस्तान पहुँचकर उसने एक साफ सी जगह देखी और वहाँ ज़मीन पर हाथ-पैर सीधे करके एक 'मुर्दे' की तरह लेट गया। उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और अपनी साँसें भी धीमी कर लीं।

आधी रात का समय हो गया। अँधेरा बहुत घना था। इत्तेफाक से उसी रात कुछ चोरों का एक गिरोह दूसरे गाँव में चोरी करके उसी रास्ते से गुज़र रहा था। चोरों के पास बहुत सारा लूटा हुआ माल था और वे पुलिस से बचने减 लिए जंगल के रास्तों से भाग रहे थे।

कब्रिस्तान के पास आकर वे चोर रास्ता भटक गए। वहाँ से दो रास्ते निकलते थे। चोरों का सरदार बोला, "अरे रुको! यहाँ से तो दो रास्ते हैं। शहर की तरफ कौन सा रास्ता जाता है? दायाँ या बायाँ?"

दूसरा चोर बोला, "सरदार, मुझे लगता है बायाँ रास्ता जाता है।" तीसरा बोला, "नहीं-नहीं, दायाँ रास्ता सुरक्षित है।"

चोर आपस में उलझ गए और ज़ोर-ज़ोर से बहस करने लगे। उनकी बहस की आवाज़ से शेख चिल्ली की 'काल्पनिक मौत' की नींद में खलल पड़ गया।

शेख चिल्ली बहुत देर से लेटा हुआ था और उसे उन चोरों की अज्ञानता पर बहुत खीझ आ रही थी। उससे रहा नहीं गया।

शेख चिल्ली उस अँधेरे में अचानक ज़मीन से उठकर 'कब्र में से उठने वाले मुर्दे' की तरह बैठ गया। उसने अपना हाथ शहर वाले सही रास्ते की तरफ उठाया और बहुत ही शांत और गंभीर आवाज़ में चोरों से कहा:

"भाइयो! आपस में क्यों लड़ रहे हो? जब मैं ज़िंदा था, तो हमेशा इस 'दाएँ वाले रास्ते' से ही शहर जाया करता था। तुम लोग भी दाएँ रास्ते से चले जाओ, वही सही रास्ता है।"

अँधेरे कब्रिस्तान में, ज़मीन से अचानक उठे एक आदमी को इस तरह बोलते देखकर चोरों के खून सूख गए। उन्होंने सोचा कि यह कोई असली मुर्दा या भूत है जो उन्हें रास्ता बता रहा है।

"भूत! भागो!" चोरों के सरदार के मुँह से बस यही निकला।

वे खूँखार चोर अपना सारा लूटा हुआ कीमती माल और पोटलियाँ वहीं छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए ऐसे भागे कि पलट कर पीछे नहीं देखा।

शेख चिल्ली ने उन भागते हुए चोरों को देखकर अपना सिर हिलाया और खुद से बोला, "कितने अजीब लोग हैं! मैंने तो बस सही रास्ता बताया था। खैर, मुझे क्या, मैं तो मुर्दा हूँ।"

और यह कहकर शेख चिल्ली दोबारा उसी जगह पर शांति से लेट गया, जबकि सुबह गाँव वालों को वहाँ चोरों का सारा खज़ाना मिल गया।

🎉 कहानी समाप्त

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