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🏹 रामायण

भाग 42: महाबली कुंभकर्ण का जागरण और रावण को धर्मोपदेश

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 42: महाबली कुंभकर्ण का जागरण और रावण को धर्मोपदेश

श्रीराम के अमोघ बाणों से अपना मुकुट, धनुष और रथ गंवाने के पश्चात, जब रावण पैदल ही लंका लौटा, तो उसका वह घमंड जो तीनों लोकों को डराता था, अब पूरी तरह धूल में मिल चुका था। रावण अपने राजमहल के भीतर एक अंधेरे कक्ष में जाकर बैठ गया। उसे पहली बार यह आभास हुआ कि मृत्यु उसके बहुत निकट आ चुकी है।

रावण ने अपने मंत्रियों को बुलाया और निराशा भरे स्वर में कहा, "हे राक्षसों! मेरी वह सारी तपस्या और ब्रह्मा जी का वरदान व्यर्थ हो गया। आज एक साधारण से मनुष्य (राम) ने मुझे युद्ध भूमि में दया करके छोड़ दिया। यदि मैं देवताओं से भी हार जाता, तो मुझे इतनी लज्जा नहीं आती। अब लंका की रक्षा केवल एक ही योद्धा कर सकता है—मेरा मंझला भाई 'कुंभकर्ण'। जाओ, उसे किसी भी प्रकार से नींद से जगाओ!"

कुंभकर्ण की निद्रा का रहस्य: कुंभकर्ण कोई साधारण राक्षस नहीं था। वह बल और आकार में रावण से भी कई गुना अधिक विशाल था। परंतु जब कुंभकर्ण ने ब्रह्मा जी की तपस्या की थी, तब देवराज इंद्र को भय हुआ कि यदि इस महादैत्य ने 'इंद्रासन' (इंद्र का सिंहासन) मांग लिया, तो देवताओं का क्या होगा?

इंद्र के अनुरोध पर माता सरस्वती ने कुंभकर्ण की जीभ (बुद्धि) फेर दी थी। जब ब्रह्मा जी ने वरदान मांगने को कहा, तो कुंभकर्ण के मुख से 'इंद्रासन' की जगह 'निद्रासन' (सोने का वरदान) निकल गया। ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कह दिया। जब कुंभकर्ण को अपनी भूल का आभास हुआ, तो रावण के अनुरोध पर ब्रह्मा जी ने वरदान में थोड़ा सुधार किया—कि कुंभकर्ण लगातार छह महीने सोएगा, फिर केवल एक दिन के लिए जागेगा, भोजन करेगा और फिर छह महीने के लिए सो जाएगा।

कुंभकर्ण का भयंकर जागरण: रावण की आज्ञा पाकर लाखों राक्षस कुंभकर्ण के उस अत्यंत विशाल भवन में पहुँचे, जहाँ वह गहरी नींद में सो रहा था। कुंभकर्ण के खर्राटों की आवाज़ बादलों की गर्जना जैसी थी और उसकी सांसों की हवा इतनी तेज थी कि राक्षस उड़-उड़ कर दूर जा गिर रहे थे।

राक्षसों ने उसे जगाने का एक भयंकर और वीभत्स प्रयास आरंभ किया:

हजारों राक्षसों ने एक साथ शंख, नगाड़े, ढोल और भेरियाँ बजानी शुरू कीं, परंतु कुंभकर्ण नहीं जागा।

राक्षसों ने उसके शरीर पर लोहे की गदाओं और हथौड़ों से प्रहार करना शुरू किया, परंतु उसे ऐसा लगा मानो कोई उसे सहला रहा हो।

उन्होंने उसके बाल खींचे, उसके कानों में गरम तेल डाला और उस पर ठंडा पानी उड़ेला, परंतु सब व्यर्थ!

अंततः, राक्षसों ने सैकड़ों बड़े-बड़े हाथियों और घोड़ों को कुंभकर्ण की छाती और शरीर पर दौड़ा दिया।

हाथियों के पैरों की रगड़ और भयंकर शोर से अंततः कुंभकर्ण की नींद टूटी। वह जम्हाई लेता हुआ एक काले पर्वत की भांति उठकर बैठ गया।

उठते ही कुंभकर्ण को अत्यंत भयंकर भूख लगी थी। कुंभकर्ण कुछ ही पलों में सारा भोजन निगल गया।

कुंभकर्ण और रावण का संवाद (नीति उपदेश): जब कुंभकर्ण का पेट भर गया, तो उसने अपने सामने खड़े डरे हुए राक्षसों से पूछा, "अरे! अभी तो मेरे सोने के छह महीने पूरे नहीं हुए थे। तुमने मुझे बीच में ही क्यों जगा दिया? क्या मेरे बड़े भाई रावण पर कोई संकट आ गया है? मुझे बताओ!"

मंत्री ने उसे रावण के पास राजसभा में पहुँचाया। कुंभकर्ण को देखते ही रावण दौड़कर अपने भाई के गले लग गया।

कुंभकर्ण ने पूछा, "भ्राता! आपके मुख पर यह भय कैसा? आपका मुकुट कहाँ है?" रावण ने अत्यंत लज्जा के साथ सीता हरण से लेकर वानर सेना के आक्रमण, प्रहस्त की मृत्यु और युद्ध भूमि में राम द्वारा मिले प्राणदान की पूरी कथा कह सुनाई। रावण ने कहा, "हे भाई! अब केवल तू ही लंका और मेरे प्राणों की रक्षा कर सकता है।"

रावण की पूरी बात सुनकर कुंभकर्ण, जो स्वभाव से क्रूर अवश्य था परंतु विभीषण की भांति ज्ञानी भी था, वह जोर से हंसा और उसने भरी सभा में रावण को फटकार लगाते हुए एक अत्यंत मार्मिक और सत्य बात कही:

"जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान। जिमि बिधि सुजस सुबंस कै नास करावन भान॥" (अर्थात: हे मूर्ख भाई! साक्षात जगदम्बा (सीता) का हरण करके अब तू अपना कल्याण चाहता है? तूने यह बहुत बुरा किया है। जो राम समुद्र पर पत्थरों को तैरा सकते हैं, वे कोई साधारण मनुष्य नहीं, साक्षात परब्रह्म हैं!)

कुंभकर्ण ने आगे कहा, "हे रावण! विभीषण ने आपको बिल्कुल सही सलाह दी थी। यदि आपने उसकी बात मानी होती, तो आज हमारे इतने वीर मारे नहीं जाते। आपने विष का वृक्ष बोया है, तो अब अमृत के फल की आशा कैसे कर सकते हैं? जाइए और अभी भी सीता को लौटा दीजिए।"

रावण अपने छोटे भाई के मुख से ऐसी बातें सुनकर तिलमिला उठा। उसने क्रोधित होकर कहा, "मैंने तुझे यहाँ मुझे उपदेश देने के लिए नहीं जगाया है! यदि तू डरता है, तो वापस जाकर सो जा। मैं अकेला ही राम से लड़ लूँगा!"

कुंभकर्ण का भ्रातृ-प्रेम (भाई के प्रति निष्ठा): कुंभकर्ण ने देखा कि रावण का अंत निश्चित है और अब उसे कोई नहीं समझा सकता। कुंभकर्ण का चरित्र रामायण में इसलिए भी अद्भुत है क्योंकि वह सत्य जानते हुए भी अपने बड़े भाई (रावण) के प्रति अपने कर्तव्य और प्रेम से पीछे नहीं हटा। विभीषण ने धर्म के लिए भाई को छोड़ दिया, परंतु कुंभकर्ण ने भाई के लिए मृत्यु को चुना।

कुंभकर्ण ने रावण को शांत करते हुए कहा:

"हे भ्राता! आप व्यर्थ क्रोध न करें। मैं जानता हूँ कि राम से युद्ध करने का अर्थ है अपनी मृत्यु को निमंत्रण देना। परंतु जब तक कुंभकर्ण जीवित है, आपके ऊपर कोई आंच नहीं आ सकती। मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा। मैं आज ही युद्ध भूमि में जाऊँगा और या तो राम को मार दूँगा, या साक्षात भगवान के हाथों प्राण त्यागकर परमगति (मोक्ष) प्राप्त करूँगा!"

यह कहकर कुंभकर्ण ने एक अत्यंत भयानक भाला उठाया। उसने कोई कवच नहीं पहना, क्योंकि उसे अपने शरीर की कठोरता पर पूर्ण विश्वास था। मदिरा के नशे में चूर और भयंकर क्रोध में गरजता हुआ, वह महादैत्य कुंभकर्ण लंका के द्वार से बाहर निकला।

कुंभकर्ण के चलने से धरती कांपने लगी। उसे लंका से बाहर आता देखकर, सुवेला पर्वत पर बैठी करोड़ों की वानर सेना का रक्त जम गया। विभीषण ने श्रीराम को बताया कि यह कोई साधारण राक्षस नहीं, साक्षात काल है। अब युद्ध भूमि में वह प्रलय आने वाला था, जिसे रोक पाना किसी भी वानर के वश में नहीं था।

🎉 कहानी समाप्त

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