भाग 43: कुंभकर्ण का रणभूमि में प्रलय, वानरों का हाहाकार और कुंभकर्ण का मोक्ष

मदिरा के नशे में चूर, हाथ में एक अत्यंत भयंकर लोहे का शूल (भाला) लिए जब महादैत्य कुंभकर्ण लंका के मुख्य द्वार से बाहर निकला, तो उसका आकार किसी चलते-फिरते काले पर्वत के समान लग रहा था। उसके चलने से लंका की धरती कांप रही थी और समुद्र की लहरें उफान मारने लगी थीं।
उसकी लाल आंखें और बादलों को छूने वाला विशाल शरीर देखकर सुवेला पर्वत पर खड़ी करोड़ों की वानर सेना में भयंकर हाहाकार मच गया। जो वानर कल तक रावण की सेना को गाजर-मूली की तरह काट रहे थे, वे आज कुंभकर्ण को देखकर प्राण बचाकर भागने लगे।
श्रीराम ने आश्चर्य से विभीषण से पूछा, "हे मित्र! लंका से यह कौन सा पर्वत चला आ रहा है? इसके शरीर का आकार तो बादलों को भी पार कर रहा है। इसे देखकर हमारी सेना भयभीत क्यों हो रही है?"
विभीषण ने हाथ जोड़कर कहा, "हे प्रभु! यह कोई पर्वत नहीं, रावण का मंझला भाई 'कुंभकर्ण' है। इसके बल का कोई पार नहीं है। इसी के भय से देवराज इंद्र ने ब्रह्मा जी से प्रार्थना करके इसे छह महीने की नींद का वरदान (श्राप) दिलवाया था। आज रावण ने इसे अकाल ही जगा दिया है। प्रभु, इसे युद्ध से नहीं, केवल आपके अमोघ बाणों से ही रोका जा सकता है।"
कुंभकर्ण का प्रलयंकारी युद्ध: वानर सेना को भागते देख युवराज अंगद, जाम्बवंत और हनुमान जी ने सेना को रोका और ललकारा। करोड़ों वानर एक साथ बड़े-बड़े पेड़ और पत्थर लेकर कुंभकर्ण पर टूट पड़े।
परंतु कुंभकर्ण पर उन पत्थरों और पेड़ों का ऐसा असर हो रहा था जैसे किसी हाथी पर फूलों की वर्षा हो रही हो। कुंभकर्ण ने हंसते हुए वानरों को मुट्ठियों में पकड़ना और सीधे अपने मुँह में डालना शुरू कर दिया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई।
पवनपुत्र हनुमान ने एक अत्यंत विशाल पर्वत शिखर उखाड़ा और कुंभकर्ण के सिर पर दे मारा। कुंभकर्ण के सिर से रक्त बहने लगा, परंतु उसने पलटकर अपने त्रिशूल से हनुमान जी की छाती पर ऐसा प्रहार किया कि हनुमान जी चक्कर खाकर दूर जा गिरे। इसके बाद उसने अंगद और नील को भी एक-एक थप्पड़ मारकर मूर्छित कर दिया।
सुग्रीव का हरण और पलटवार: अपने सेनापतियों को गिरता देख वानरराज सुग्रीव एक विशाल चट्टान लेकर कुंभकर्ण की ओर दौड़े। उन्होंने कुंभकर्ण पर प्रहार किया, परंतु कुंभकर्ण ने सुग्रीव की चट्टान को एक घूंसे में चकनाचूर कर दिया। इससे पहले कि सुग्रीव संभल पाते, कुंभकर्ण ने सुग्रीव को पकड़ लिया और उन्हें मूर्छित करके अपनी कांख (बगल) में दबा लिया।
कुंभकर्ण सुग्रीव को लेकर खुशी-खुशी लंका की ओर मुड़ा। उसे लगा कि वानरों के राजा को बंदी बनाने से युद्ध यहीं समाप्त हो जाएगा। रावण महल की छत से यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हो रहा था।
परंतु रास्ते में सुग्रीव को होश आ गया। उन्होंने देखा कि वे कुंभकर्ण की बगल में दबे हैं और वह उन्हें लंका ले जा रहा है। सुग्रीव ने अपनी पूरी शक्ति बटोरी और अपने तीखे दांतों और नाखूनों से कुंभकर्ण के दोनों कान और उसकी नाक काट ली!
अत्यंत भयंकर पीड़ा और रक्तस्राव से बिलबिलाते हुए कुंभकर्ण ने सुग्रीव को नीचे पटक दिया। सुग्रीव पलक झपकते ही वहां से छलांग लगाकर वापस श्रीराम के पास पहुँच गए।
श्रीराम और कुंभकर्ण का महासंग्राम: कान और नाक कटने के बाद कुंभकर्ण का रूप और भी वीभत्स और डरावना हो गया। रक्त से लथपथ कुंभकर्ण अब एक घायल और पागल हाथी की तरह वानर सेना को कुचलने लगा।
यह देखकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम अपने रथ (जो देवराज इंद्र ने भेजा था) पर सवार होकर आगे आए। लक्ष्मण ने कुंभकर्ण पर बाणों की वर्षा की, परंतु कुंभकर्ण ने लक्ष्मण से कहा, "हे सुमित्रानंदन! तुम अत्यंत वीर हो, परंतु मैं तुमसे नहीं, सीधे तुम्हारे बड़े भाई राम से युद्ध करना चाहता हूँ।"
श्रीराम ने अपना 'कोदंड' धनुष उठाया। कुंभकर्ण ने श्रीराम को देखा। वह जानता था कि सामने स्वयं नारायण खड़े हैं। उसने मन ही मन श्रीराम को प्रणाम किया, परंतु एक योद्धा और भाई के प्रति अपने धर्म का पालन करते हुए उसने श्रीराम पर अपना भयंकर शूल (भाला) फेंक दिया।
श्रीराम ने अपने बाणों से उस शूल के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। फिर श्रीराम ने एक अत्यंत तीक्ष्ण बाण कुंभकर्ण के दाहिने हाथ पर चलाया। बाण लगते ही कुंभकर्ण का वह विशाल दाहिना हाथ (जिसमें अस्त्र था) कटकर धरती पर गिर पड़ा। हाथ गिरने से सैकड़ों वानर उसके नीचे दब गए।
कुंभकर्ण ने हार नहीं मानी। उसने अपने बाएं हाथ से एक विशाल पेड़ उखाड़ लिया और राम की ओर दौड़ा। श्रीराम ने 'इंद्रास्त्र' का प्रयोग किया और उसका बायां हाथ भी काट गिराया।
बिना हाथों के कुंभकर्ण एक चलते हुए पहाड़ की तरह अपना विशाल मुँह फाड़कर राम को निगलने के लिए दौड़ा। श्रीराम ने अपने बाणों से उसके मुँह को भर दिया, जिससे वह कुछ बोल नहीं पाया। और अंततः, श्रीराम ने एक ऐसा अमोघ 'अर्धचंद्र' (आधे चांद के आकार का) बाण चलाया, जो सीधा कुंभकर्ण की गर्दन पर जाकर लगा।
एक भयंकर गर्जना के साथ कुंभकर्ण का वह पर्वत के समान विशाल मस्तक धड़ से अलग हो गया। श्रीराम के बाण के वेग से वह मस्तक लंका के भीतर रावण के महल के सामने जाकर गिरा, और उसका शेष धड़ समुद्र में जा गिरा, जिससे समुद्र का जल उफन कर तटों को डुबोने लगा।
कुंभकर्ण का मोक्ष: कुंभकर्ण कोई साधारण पापी नहीं था; वह धर्म और नीति को जानता था, परंतु उसने अपने भाई का साथ नहीं छोड़ा था। तुलसीदास जी रामचरितमानस में लिखते हैं कि जैसे ही कुंभकर्ण के प्राण निकले, उसके शरीर से एक अत्यंत दिव्य और प्रज्वलित ज्योति (प्रकाश) निकली!
श्रीराम ने अपने हाथों से कुंभकर्ण को परमगति (मोक्ष) प्रदान की थी। देवताओं ने आकाश से पुष्प वर्षा की और वानर सेना ने "जय श्रीराम" का उद्घोष किया।
उधर लंका में, जब रावण ने अपने महल के प्रांगण में अपने सबसे प्रिय और महाबली भाई कुंभकर्ण का कटा हुआ सिर देखा, तो वह पछाड़ खाकर धरती पर गिर पड़ा। रावण फूट-फूट कर रोने लगा। कुंभकर्ण की मृत्यु रावण के लिए उसकी अपनी मृत्यु के समान थी। रावण का आधा बल आज समाप्त हो चुका था।
पिता को विलाप करते देख, रावण का सबसे बड़ा और अजेय पुत्र—मेघनाद (इंद्रजीत)—आगे आया। उसने प्रतिज्ञा की कि कल वह राम और लक्ष्मण का वध करके अपने चाचा कुंभकर्ण की मृत्यु का प्रतिशोध लेगा। अगले दिन का युद्ध रामायण के सबसे भयंकर और भावुक अध्यायों में से एक होने वाला था—जहाँ लक्ष्मण पर अमोघ 'शक्ति' का प्रहार होगा।
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