भाग 47: लक्ष्मण-मेघनाद का अंतिम महासंग्राम और इंद्रजीत (मेघनाद) का वध

निकुंभिला के उस यज्ञ स्थल पर जब लक्ष्मण जी ने मेघनाद को ललकारा, तो मेघनाद एक भयंकर रथ पर सवार होकर युद्ध के लिए तैयार हो गया। लक्ष्मण जी हनुमान जी के कंधों पर सवार थे।
दोनों योद्धाओं के बीच एक ऐसा भयंकर युद्ध आरंभ हुआ, जिसके बाणों की टंकार से तीनों लोक कांप उठे। देवता आकाश में अपने विमान रोककर इस महायुद्ध को देखने लगे।
मेघनाद कोई साधारण योद्धा नहीं था। वह 'इंद्रजीत' था (जिसने स्वर्ग के राजा इंद्र को बंदी बना लिया था)। उसने लक्ष्मण जी पर अत्यंत भयंकर और मायावी अस्त्रों की वर्षा आरंभ कर दी। अग्निबाण, वायुबाण, और विषैले सर्पबाण हवा को चीरते हुए लक्ष्मण की ओर आने लगे।
परंतु आज लक्ष्मण जी का क्रोध भी शिव के त्रिनेत्र के समान खुल चुका था। लक्ष्मण ने मेघनाद के हर एक मायावी बाण को हवा में ही काट दिया। बाणों के टकराने से आकाश में आग की चिंगारियां उठने लगीं।
मेघनाद ने जब देखा कि उसके साधारण बाण विफल हो रहे हैं, तो उसने 'पाशुपतास्त्र' (भगवान शिव का अस्त्र) का संधान किया। लक्ष्मण जी ने अत्यंत आदर के साथ अपने धनुष से 'नारायणास्त्र' (भगवान विष्णु का अस्त्र) छोड़ दिया। दोनों दिव्य अस्त्र आकाश में टकराए और बिना किसी को हानि पहुँचाए शांत होकर लौट गए।
युद्ध तीन दिन और तीन रात तक बिना रुके चलता रहा। न लक्ष्मण थके, न मेघनाद पीछे हटा।
लक्ष्मण जी की वह महान प्रतिज्ञा: अंततः लक्ष्मण जी समझ गए कि मेघनाद को साधारण युद्ध नियमों से नहीं मारा जा सकता।
लक्ष्मण जी ने अपने तरकश से देवराज इंद्र द्वारा दिया गया अमोघ 'इंद्रास्त्र' निकाला।
लक्ष्मण जी ने उस बाण को अपने धनुष पर चढ़ाया, उसकी प्रत्यंचा को अपने कान तक खींचा और पूरी सृष्टि, सभी देवताओं और पंचतत्वों को साक्षी मानकर एक अत्यंत महान और ऐतिहासिक प्रतिज्ञा की:
"धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि। पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वः शरैनं जहि रावणम्॥" (अर्थात: यदि मेरे बड़े भाई, दशरथ नंदन श्रीराम परम सत्यवादी और साक्षात धर्म के अवतार हैं, यदि उनका चरित्र इस ब्रह्मांड में सबसे पवित्र है, तो हे बाण! तू जा और इस मायावी मेघनाद का वध कर दे!)
यह कोई साधारण बाण नहीं रह गया था; इस बाण में श्रीराम के 14 वर्षों के तप, सत्य और धर्म की पूरी शक्ति समा गई थी।
लक्ष्मण जी ने बाण छोड़ दिया। वह बाण आकाश में करोड़ों सूर्यों के समान चमकता हुआ बिजली की गति से मेघनाद की ओर बढ़ा।
मेघनाद ने उस बाण को रोकने का प्रयास किया, परंतु राम के धर्म के सामने रावण के पुत्र का सारा बल और माया शून्य हो गई। बाण सीधे मेघनाद के गले पर जाकर लगा और एक भयंकर गर्जना के साथ मेघनाद (इंद्रजीत) का वह अत्यंत सुंदर और अजेय मस्तक उसके धड़ से कटकर धरती पर लुढ़क गया!
इंद्रजीत, जिसने देवलोक को रुलाया था, आज एक वनवासी तपस्वी के बाण से सदा के लिए शांत हो गया था।
वानरों का हर्ष और श्रीराम का आलिंगन: मेघनाद के मस्तक को धरती पर गिरता देख वानर सेना खुशी से पागल हो गई। हनुमान, जाम्बवंत, अंगद और विभीषण ने "जय लक्ष्मण! जय श्रीराम!" का ऐसा सिंहनाद किया कि लंका के महलों के कंगूरे गिर पड़े। देवता आकाश से पुष्प वर्षा करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं।
लक्ष्मण जी अत्यंत थके हुए, लहूलुहान अवस्था में राम के शिविर में लौटे। श्रीराम ने दौड़कर अपने प्राणप्रिय भाई को गले से लगा लिया। श्रीराम ने लक्ष्मण का माथा चूमते हुए कहा: "हे लक्ष्मण! आज तुमने मुझे युद्ध में सच्ची विजय दिलाई है। कुंभकर्ण और मेघनाद के बिना रावण अब बिना दांतों के सांप के समान रह गया है। तुमने जो कार्य किया है, वह तीनों लोकों में कोई देवता भी नहीं कर सकता था।"
रावण का घोर विलाप और क्रोध: उधर, जब यह समाचार रावण के महल में पहुँचा कि लंका का सबसे बड़ा गौरव, उसका पुत्र मेघनाद मारा गया है, तो रावण अपने सिंहासन से नीचे गिर पड़ा।
रावण अपनी छाती पीट-पीट कर रोने लगा। "हा इंद्रजीत! हा मेरे पुत्र! तू तो अजेय था, तू तो काल को भी जीत सकता था, फिर एक साधारण मनुष्य ने तेरा वध कैसे कर दिया?" रावण की पटरानी मंदोदरी और मेघनाद की पत्नी सुलोचना का विलाप सुनकर पत्थर भी पिघल रहे थे।
पुत्र-शोक में रावण पूरी तरह पागल हो गया। उसने अपनी तलवार निकाली और अशोक वाटिका की ओर दौड़ पड़ा। रावण चिल्लाने लगा, "यह सब उस सीता के कारण हुआ है! आज मैं सबसे पहले उस सीता का ही सिर काटूँगा!" परंतु रावण के मंत्री 'सुपार्श्व' ने बीच में आकर उसे रोक लिया और कहा, "महाराज! एक राजा और योद्धा के रूप में एक निहत्थी स्त्री की हत्या करना आपके नाम पर कलंक लगा देगा। अपना क्रोध सीता पर नहीं, राम पर उतारिए।"
रावण रुक गया। उसकी आंखों में अब भय नहीं, केवल एक अंधी, प्रतिशोध से जलती हुई ज्वाला थी। रावण ने अपनी पूरी सेना को आदेश दिया: "मेरे रथ को तैयार करो! आज या तो यह लंका बचेगी या राम! आज रामायण का अंतिम युद्ध होगा!"
अब त्रेता युग का वह अंतिम और सबसे महाभयंकर युद्ध आरंभ होने वाला था—श्रीराम बनाम दशानन रावण!
🏹 रामायण की और कहानियाँ
भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा
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