भाग 48: रावण का अंतिम महाप्रयाण, विभीषण का संशय (धर्म-रथ) और देवराज का रथ

अपने सबसे प्रिय और अजेय पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) की मृत्यु के पश्चात, रावण का हृदय विलाप और प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा था। उसके अजेय सेनापति, उसके भाई कुंभकर्ण और उसके सभी पुत्र मारे जा चुके थे। लंका की वह स्वर्ण नगरी, जहाँ कभी अप्सराएं नृत्य करती थीं, आज विधवाओं के रुदन और श्मशान की राख से भर गई थी।
रावण समझ चुका था कि अब यह जीवन और मृत्यु की अंतिम घड़ी है। उसने अपने शस्त्रागार से अपने सबसे दिव्य और भयंकर अस्त्र-शस्त्र निकाले। उसने एक अत्यंत अभेद्य कवच धारण किया, जो सूर्य की किरणों के समान चमक रहा था। रावण अपने सबसे विशाल और मायावी रथ पर सवार हुआ, जिसे पिशाचों जैसे मुख वाले भयंकर घोड़े खींच रहे थे।
जब रावण लंका के द्वार से बाहर निकला, तो प्रकृति ने उसे अनेक अपशकुन दिखाए। उसके रथ के घोड़े रोने लगे, और गिद्ध उसके मुकुट के ऊपर मंडराने लगे। परंतु रावण का अहंकार और उसकी निराशा इतनी गहरी थी कि उसने इन सभी संकेतों को अनदेखा कर दिया। आज वह केवल मृत्यु देने या मृत्यु पाने के लिए निकला था।
वानर सेना में प्रलय: युद्ध भूमि में आते ही रावण ने प्रलय मचा दिया। उसका रथ जिधर भी जाता, वानर सेना गाजर-मूली की तरह कटकर गिरने लगती। रावण के बाणों की गति इतनी तीव्र थी कि किसी को संभलने का अवसर ही नहीं मिल रहा था। सुग्रीव, हनुमान, अंगद और जाम्बवंत—सभी महाबली योद्धाओं ने रावण को रोकने का प्रयास किया, परंतु आज रावण के त्रिशूल और उसके बाणों के सामने कोई भी टिक नहीं पा रहा था। सभी वानर सेनापति लहूलुहान होकर धरती पर गिर पड़े।
विभीषण का संशय और श्रीराम का 'धर्म-रथ': वानरों को पिटता देख, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम स्वयं रावण का सामना करने के लिए आगे बढ़े।
परंतु जब विभीषण ने देखा कि रावण एक अत्यंत ऊंचे, सुरक्षित और अभेद्य रथ पर सवार है, और उनके आराध्य प्रभु श्रीराम नंगे पैर, बिना किसी कवच और बिना रथ के धरती पर खड़े हैं, तो विभीषण का हृदय कांप उठा। प्रेम और चिंता के कारण विभीषण की आंखों में आंसू आ गए।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस दृश्य का अत्यंत अद्भुत और दार्शनिक वर्णन किया है: "रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥" (अर्थात: रावण को रथ पर और राम को बिना रथ के देखकर विभीषण अधीर हो गए)।
विभीषण ने राम के चरणों में गिरकर कहा, "हे नाथ! आपके पास न रथ है और न शरीर पर कवच। रावण अत्यंत बलवान और मायावी है। आप इस महासंग्राम में विजय कैसे प्राप्त करेंगे?"
श्रीराम ने अत्यंत कोमलता से मुस्कुराते हुए विभीषण को उठाया और 'विजय' का वास्तविक रहस्य बताते हुए एक महान उपदेश दिया, जिसे 'विभीषण गीता' कहा जाता है।
श्रीराम ने कहा: "सखा धरममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥" (अर्थात: हे मित्र! जिस रथ से विजय प्राप्त होती है, वह लकड़ी और लोहे का रथ नहीं होता। वह तो 'धर्म का रथ' होता है, जो मेरे पास है)।
श्रीराम ने उस अदृश्य 'धर्म-रथ' का वर्णन करते हुए कहा:
पहिए: "शौर्य (वीरता) और धैर्य इस रथ के दो पहिए हैं।"
ध्वजा (झंडा): "सत्य और शील (सदाचार) इस रथ की मजबूत ध्वजा और पताका हैं।"
घोड़े: "बल, विवेक, इंद्रिय-निग्रह (Self-control) और परोपकार—ये चार इस रथ के घोड़े हैं।"
लगाम: "क्षमा, कृपा और समता (Equality) इन घोड़ों की लगाम है।"
सारथी: "ईश्वर का भजन ही इस रथ का सबसे चतुर सारथी है।"
अस्त्र-शस्त्र: "वैराग्य मेरी ढाल है, संतोष मेरी तलवार है, दान मेरा फरसा है, और निर्मल बुद्धि मेरी प्रचंड शक्ति है। श्रेष्ठ विज्ञान मेरा कठिन धनुष है, और मेरा शांत मन ही मेरा तरकश है जिसमें यम-नियम के बाण भरे हैं।"
श्रीराम ने अंत में कहा, "हे विभीषण! जिसके पास धर्म का ऐसा रथ हो, उसके लिए इस संसार में कोई भी शत्रु अजेय नहीं है। रावण का विनाश केवल मेरे बाणों से नहीं, बल्कि उसके अपने अधर्म से होगा।"
देवराज इंद्र का रथ (मातलि का आगमन): श्रीराम के इन वचनों को सुनकर विभीषण के मन का सारा संशय मिट गया। उधर, आकाश में देवता भी इस असमान युद्ध (रथ बनाम पैदल) को देखकर चिंतित थे।
देवराज इंद्र ने तुरंत अपने सारथी 'मातलि' को अपना दिव्य स्वर्ण रथ लेकर धरती पर भेजा। वह रथ सूर्य के समान चमक रहा था और उसमें अत्यंत दिव्य हरे रंग के घोड़े जुते हुए थे।
मातलि ने आकाश से उतरकर श्रीराम के सामने रथ खड़ा किया और हाथ जोड़कर कहा, "हे रघुकुल नंदन! देवराज इंद्र ने आपकी विजय के लिए अपना यह दिव्य रथ, कवच और अमोघ अस्त्र भेजे हैं। कृपया इस पर सवार हों और उस पापी दशानन का अंत करें।"
श्रीराम ने देवताओं के उस उपहार का सम्मान किया। उन्होंने रथ की परिक्रमा की, उसे प्रणाम किया और उस दिव्य रथ पर सवार हो गए।
अब त्रेता युग के दो सबसे महान योद्धा—एक ओर अधर्म और अहंकार का प्रतीक लंकापति रावण, और दूसरी ओर धर्म और मर्यादा के साक्षात अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम—अपने-अपने रथों पर सवार होकर एक-दूसरे के बिल्कुल आमने-सामने आ गए थे।
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