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भाग 27: मेघनाद से युद्ध, ब्रह्मास्त्र का सम्मान और रावण की राजसभा में हनुमान

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 27: मेघनाद से युद्ध, ब्रह्मास्त्र का सम्मान और रावण की राजसभा में हनुमान

अपने प्रिय पुत्र अक्षय कुमार की मृत्यु का समाचार पाकर लंकापति रावण का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया था। उसने अपने सबसे बड़े और अजेय पुत्र 'मेघनाद' (जिसे इंद्र को जीतने के कारण 'इंद्रजीत' भी कहा जाता था) को आदेश दिया कि उस दुष्ट वानर को जीवित बांधकर मेरे सामने लाओ।

मेघनाद अपने एक अत्यंत जादुई और भयंकर रथ पर सवार होकर अशोक वाटिका के उस तोरण (द्वार) पर पहुँचा, जहाँ हनुमान जी काल के समान बैठे थे। मेघनाद को देखते ही हनुमान जी ने एक भयंकर सिंहनाद किया। दोनों महाबलियों के बीच एक ऐसा प्रलयंकारी युद्ध आरंभ हुआ जिसे देखकर आसमान में खड़े देवता भी कांप उठे।

मेघनाद ने अपने धनुष से बाणों की झड़ी लगा दी, परंतु पवनपुत्र हनुमान अत्यंत फुर्ती से उन बाणों को चकमा दे जाते। हनुमान जी ने विशाल वृक्षों और चट्टानों को उखाड़-उखाड़ कर मेघनाद के रथ पर प्रहार किया। मेघनाद का रथ टूट गया और उसे धरती पर आकर युद्ध करना पड़ा।

मेघनाद बहुत बड़ा मायावी था। जब उसने देखा कि यह वानर किसी भी साधारण अस्त्र-शस्त्र (यहाँ तक कि वज्र और पाशुपतास्त्र) से घायल नहीं हो रहा है, तो वह समझ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। अंततः, निराश और क्रोधित होकर मेघनाद ने अपने तरकश से ब्रह्मांड का सबसे अमोघ और विनाशकारी अस्त्र निकाला— 'ब्रह्मास्त्र'।

मेघनाद ने मंत्र पढ़कर ब्रह्मास्त्र को हनुमान जी की ओर छोड़ दिया।

आकाश को चीरते हुए आते उस तेजोमय ब्रह्मास्त्र को देखकर हनुमान जी ने तुरंत उसे पहचान लिया। वे जानते थे कि उन्हें स्वयं ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त है कि ब्रह्मास्त्र भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। वे चाहते तो एक क्षण में उस अस्त्र को तोड़ सकते थे। परंतु हनुमान जी अत्यंत ज्ञानी और धर्म के मर्मज्ञ थे।

उन्होंने विचार किया, "यदि मैं ब्रह्मास्त्र को नष्ट कर दूँगा, तो मेरे परम पूज्य ब्रह्मा जी की महिमा और उनके अस्त्र की मर्यादा टूट जाएगी। दूसरी बात, यदि मैं बंधूँगा नहीं, तो मुझे रावण की राजसभा में जाने का और रावण को सीधे चेतावनी देने का अवसर कैसे मिलेगा?"

यही सोचकर हनुमान जी ने कोई प्रतिकार (बचाव) नहीं किया और अपने दोनों हाथ जोड़कर ब्रह्मास्त्र के प्रहार को अपने सीने पर सह लिया। अस्त्र लगते ही वे मूर्छित होने का नाटक करते हुए वृक्ष से नीचे गिर पड़े।

हनुमान जी को गिरा हुआ देखकर राक्षसों में खुशी की लहर दौड़ गई। मूर्ख राक्षसों ने तुरंत सन (जूट) की रस्सियां मंगवाईं और हनुमान जी को कसकर बांध लिया। (शास्त्रों के अनुसार, जैसे ही किसी को साधारण रस्सियों से बांधा जाता है, तो ब्रह्मास्त्र का प्रभाव अपने आप समाप्त हो जाता है। अतः हनुमान जी अब पूरी तरह मुक्त थे, परंतु रावण की सभा में जाने के लिए वे बंधे रहने का नाटक करते रहे)।

राक्षसों ने हनुमान जी को बुरी तरह घसीटते हुए और मारते-पीटते हुए रावण की अत्यंत भव्य और विशाल राजसभा में प्रस्तुत किया।

जब हनुमान जी ने रावण के दरबार में प्रवेश किया, तो वहां का ऐश्वर्य देखकर वे भी एक क्षण के लिए विस्मित रह गए। रावण अपने ऊंचे स्वर्ण सिंहासन पर बैठा था। उसके दस सिर और बीस भुजाएं अत्यंत भयानक प्रतीत हो रही थीं। उसका शरीर एक काले पर्वत के समान था और उसके मुकुट में जड़े बहुमूल्य रत्न सूर्य के समान चमक रहे थे। सभी देवता और दिक्पाल हाथ जोड़े उसके दरबार में डरे हुए खड़े थे।

हनुमान जी ने रावण के इस तेज को देखकर मन ही मन कहा, "कैसा अद्भुत रूप है! कैसा अद्भुत तेज है! यदि इस रावण में अधर्म और अज्ञान न होता, तो यह स्वर्ग का स्वामी इंद्र बनने के भी योग्य था।"

रावण ने लाल आंखों से उस बंधे हुए वानर को देखा और अपने मंत्री प्रहस्त से कहा, "प्रहस्त! इस वानर से पूछो कि यह कौन है? किसके प्रताप से यह इतना निडर है कि इसने मेरी अशोक वाटिका उजाड़ दी और मेरे रक्षकों तथा पुत्र अक्षय कुमार का वध कर दिया?"

मंत्री के पूछने पर हनुमान जी ने तनिक भी भयभीत न होते हुए, अत्यंत निर्भय और गंभीर स्वर में पूरी सभा को संबोधित करते हुए कहा:

"हे दशानन! मैं उस परम कृपालु और अखिल ब्रह्मांड के नायक श्रीराम का दूत हूँ, जिनकी शक्ति से माया इस संसार की रचना करती है। जिनकी शक्ति से यह पृथ्वी टिकी है, सूर्य प्रकाश देता है और पवन बहता है। मैं उसी श्रीराम का सेवक हूँ, जिन्होंने तुम्हारे मित्र खर-दूषण का वध किया और जिनके एक बाण ने महाबली बालि को मृत्यु के घाट उतार दिया था।" रावण बालि के हाथों हार चुका था, इसलिए बालि का नाम सुनते ही वह तिलमिला उठा।

हनुमान जी ने आगे कहा, "रही बात वाटिका उजाड़ने की, तो हे रावण, मुझे भूख लगी थी, इसलिए मैंने फल खाए। वानर का स्वभाव चंचल होता है, इसलिए मैंने वृक्ष तोड़ दिए। तुम्हारे रक्षकों ने मुझे बिना कारण मारना चाहा, तो अपनी रक्षा के लिए मैंने उन्हें मार डाला। तुमने मुझे ब्रह्मास्त्र से बांधा है, परंतु मैं तुम्हारे ही भले के लिए स्वेच्छा से यहाँ आया हूँ।"

इसके बाद हनुमान जी ने एक सच्चे दूत की तरह रावण को नीति का उपदेश दिया: "हे रावण! तूने शिव जी की तपस्या की है, तू अत्यंत ज्ञानी और पुलस्त्य ऋषि के कुल का है। मोह और अहंकार को त्याग दे। पराई स्त्री का हरण करना तेरे जैसे ज्ञानी राजा को शोभा नहीं देता। माता सीता को ससम्मान श्रीराम को लौटा दे। यदि तूने राम की शरण ले ली, तो वे तुझे क्षमा कर देंगे। और यदि नहीं, तो याद रख— राम के बाणों से तुझे ब्रह्मा, विष्णु या महेश भी नहीं बचा सकेंगे!"

एक साधारण से वानर के मुख से अपनी राजसभा में ऐसी खुली और अपमानजनक चेतावनी सुनकर रावण का अहंकार भड़क उठा। उसकी दसों आंखें क्रोध से जलने लगीं। उसने अपनी म्यान से तलवार निकालते हुए गर्जना की, "इस मूर्ख वानर की यह मजाल कि यह मुझे उपदेश दे! वध कर दो इसका! अभी इसी क्षण इसके टुकड़े-टुकड़े कर दो!"

राक्षस अपनी तलवारें लेकर हनुमान जी की ओर दौड़े ही थे कि अचानक रावण का छोटा भाई विभीषण अपने आसन से उठ खड़ा हुआ।

विभीषण ने रावण के सामने हाथ जोड़कर कहा, "हे भ्राता! रुक जाइए! राजनीति और राज्यशास्त्र (नीति) का यह नियम है कि किसी भी देश के 'दूत' की हत्या नहीं की जा सकती। दूत चाहे कितना भी कटु वचन बोले, उसे मारना राजधर्म के विरुद्ध है। यदि आपको इसे दंड देना ही है, तो इसे कोई अंग-भंग करने का दंड दे दीजिए, परंतु प्राणदंड मत दीजिए।"

पूरी सभा ने विभीषण की बात का समर्थन किया। रावण ने अपनी तलवार वापस रखते हुए अत्यंत कुटिलता से मुस्कुराकर कहा:

"ठीक है! विभीषण की बात सत्य है। दूत को मारा नहीं जाता। परंतु वानरों को अपनी पूंछ से बहुत प्रेम होता है, पूंछ ही उनकी शोभा होती है। इसलिए मेरा आदेश है कि इस वानर की पूंछ पर तेल में भीगा हुआ कपड़ा लपेट कर उसमें आग लगा दी जाए! जब यह बिना पूंछ के अपने राम के पास जाएगा, तो अपनी सूरत भी नहीं दिखा पाएगा!"

रावण का यह आदेश सुनकर सभा के सभी राक्षस अट्टहास (जोर से हंसने) करने लगे। वे नहीं जानते थे कि रावण का यह निर्णय लंका के इतिहास की सबसे भयानक भूल थी। अब हनुमान जी को वह अस्त्र मिल गया था, जिससे वे रावण के अहंकार की उस स्वर्ण नगरी को श्मशान में बदलने वाले थे।

🎉 कहानी समाप्त

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