भाग 38: प्रथम दिन का महायुद्ध, भयंकर द्वंद्व और राक्षसी सेनापतियों का वध

वानर सेना का जयघोष सुनते ही रावण की आज्ञा से लंका के चारों द्वार खुल गए और भीतर से काले बादलों की भांति राक्षसों की भयंकर सेना बाहर निकली। राक्षस रथों, हाथियों और घोड़ों पर सवार थे। उनके हाथों में लोहे के भयानक भाले, त्रिशूल और तलवारें चमक रही थीं।
और फिर... दोनों सेनाएं आपस में टकरा गईं! यह टक्कर इतनी भयंकर थी मानो समुद्र और पर्वत आपस में टकरा गए हों। धरती कांपने लगी और धूल का ऐसा बवंडर उठा कि सूर्य की रोशनी छिप गई।
राक्षस लोहे और आग से लड़ रहे थे, जबकि वानर प्रकृति (पेड़ और पत्थर) और अपने नाखूनों तथा दांतों से युद्ध कर रहे थे। वानर छलांग लगाकर रथों पर चढ़ जाते, घोड़ों की गर्दन मरोड़ देते और सारथियों को उठाकर हवा में फेंक देते।
पहले ही दिन के युद्ध में वानर सेनापतियों ने अपना ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि रावण की सेना में हाहाकार मच गया। युद्ध भूमि में जगह-जगह भयंकर द्वंद्व युद्ध होने लगे:
हनुमान बनाम दुर्धर्ष राक्षस: रावण के कई महाबली सेनापति हनुमान जी को रोकने आए। हनुमान जी ने 'दुर्धर्ष' और 'दुर्मुख' जैसे भयंकर राक्षसों का सामना किया। जब दुर्मुख ने हनुमान जी पर तीरों की वर्षा की, तो हनुमान जी ने एक विशाल पर्वत की चोटी उखाड़ी और दुर्मुख के रथ पर दे मारी। दुर्मुख वहीं अपने रथ सहित कुचल कर मारा गया।
अंगद बनाम वज्रदंष्ट्र: रावण का एक अत्यंत क्रूर सेनापति 'वज्रदंष्ट्र' (जिसके दांत वज्र के समान थे) अपनी कुल्हाड़ी लेकर अंगद पर टूट पड़ा। अंगद ने उसके प्रहार को बचाया और एक विशाल वृक्ष उसके सिर पर इतनी ज़ोर से मारा कि वज्रदंष्ट्र का सिर धड़ से अलग होकर धरती पर जा गिरा।
अंगद बनाम मेघनाद (इंद्रजीत): युद्ध भूमि में सबसे भयंकर टक्कर युवराज अंगद और रावण के सबसे बड़े पुत्र मेघनाद के बीच हुई। मेघनाद अपने मायावी रथ पर सवार होकर बाण चला रहा था। अंगद ने एक लंबी छलांग लगाई और मेघनाद के रथ के चारों घोड़ों और उसके सारथी को मार डाला। अंगद ने मेघनाद के धनुष को भी तोड़ दिया। अपने रथ और धनुष को नष्ट होते देख, अजेय मेघनाद को अपने प्राण बचाने के लिए युद्ध भूमि से अदृश्य होकर भागना पड़ा। वानरों ने अंगद की जय-जयकार की।
नील और सुषेण का पराक्रम: वानर सेनापति 'नील' ने रावण के अत्यंत शक्तिशाली योद्धा 'मित्रघ्न' का एक ही प्रहार में वध कर दिया। वहीं, माता तारा के पिता (सुग्रीव के ससुर) महाबली 'सुषेण' ने रावण के मायावी सेनापति 'विद्युन्माली' को एक भारी चट्टान से कुचल कर यमलोक भेज दिया।
श्रीराम का अमोघ बाण: जब रावण के चार भयंकर सेनापति—अग्निकेतु, रश्मिकेतु, सुप्तघ्न और यज्ञकोप—एक साथ श्रीराम पर आक्रमण करने आए, तो श्रीराम ने केवल एक बार अपने धनुष की प्रत्यंचा खींची और चार अचूक बाण छोड़े। पलक झपकते ही उन चारों राक्षसी सेनापतियों के सिर कटकर धरती पर लुढ़क गए।
हर तरफ राक्षसों के शव बिछे हुए थे। रक्त (खून) की नदियां बहने लगीं, जिसमें कटे हुए सिर, हाथ और रथों के पहिए तैर रहे थे। युद्ध भूमि का दृश्य इतना हृदय विदारक था कि आकाश से युद्ध देख रहे देवताओं के भी रोंगटे खड़े हो गए।
पहले दिन के युद्ध में अपनी सेना का यह महाविनाश और दुर्मुख, वज्रदंष्ट्र, विद्युन्माली जैसे अपने चोटी के सेनापतियों की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण का सिंहासन डोल गया। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वानरों ने उसकी अजेय सेना को इस तरह गाजर-मूली की तरह काट दिया है।
रावण समझ गया कि वह आमने-सामने के युद्ध में वानरों से नहीं जीत सकता। उसने अपने पुत्र मेघनाद को बुलाया। मेघनाद, जो अंगद के हाथों अपना रथ गंवा चुका था, अब प्रतिशोध की आग में जल रहा था। रावण ने मेघनाद से कहा, "पुत्र! बल से यह युद्ध नहीं जीता जा सकता। अब अपनी उस विद्या का प्रयोग करो जिसे तुमने देवताओं को हराने के लिए किया था। छिपकर वार करो और राम-लक्ष्मण को समाप्त कर दो!"
पिता की आज्ञा पाकर मेघनाद ने अपनी तामसी माया का आह्वान किया। अब युद्ध भूमि में वह काला जादू और मायावी अस्त्र उतरने वाला था, जो श्रीराम और लक्ष्मण को एक अत्यंत प्राणघातक संकट में डालने वाला था—'नागपाश'।
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