नींद की कीमत — धन-दौलत और सुकून की नींद

विजयनगर के महाराजा कृष्णदेवराय राज्य के काम-काज और युद्ध की चिंताओं में इतने घिरे रहते थे कि धीरे-धीरे उनकी रातों की नींद उड़ गई। वे 'अनिद्रा' (Insomnia) के शिकार हो गए। राजवैद्यों ने कई तरह की जड़ी-बूटियां दीं, संगीतकारों ने मधुर धुनें बजाईं, परंतु महाराज को किसी भी तरह सुकून की नींद नहीं आती थी। वे रात भर अपने कक्ष में टहलते रहते थे।
परेशान होकर एक दिन महाराज ने पूरे राज्य में ढिंढोरा पिटवा दिया: "जो भी व्यक्ति महाराज को 'सुकून की नींद' ला कर देगा, उसे मुँहमांगा इनाम दिया जाएगा!"
यह सुनकर कई तांत्रिक, वैद्य और जादूगर आए, परंतु कोई भी महाराज को सुला नहीं सका।
तेनालीरामा का दावा: अंततः तेनालीरामा ने यह ज़िम्मा उठाया। उन्होंने महाराज से कहा: "महाराज! 'नींद' कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो बाज़ार में सोने के सिक्कों से खरीदी जा सके। परंतु मैं एक ऐसे इंसान को जानता हूँ जो आपको सुकून की नींद दे सकता है। लेकिन इसके लिए आपको मेरे साथ साधारण भेष में, बिना किसी रथ या घोड़े के, पैदल चलना होगा।"
नींद के लिए तरस रहे महाराज तुरंत तैयार हो गए। उन्होंने किसान के कपड़े पहने और चिलचिलाती धूप में तेनालीरामा के साथ पैदल निकल पड़े।
कड़ी मेहनत और पसीना: तेनालीरामा महाराज को राज्य के बाहरी हिस्से में स्थित एक बहुत बड़े खेत में ले गए। वहाँ एक किसान हल जोत रहा था।
तेनालीरामा ने महाराज से कहा: "महाराज! नींद देने वाला वैद्य यही है। परंतु इसकी शर्त यह है कि आपको इसके साथ पूरे दिन खेत में काम करना होगा। आपको मिट्टी खोदनी होगी, पानी भरना होगा और लकड़ियां काटनी होंगी। तभी आपको नींद की दवा मिलेगी।"
महाराज ने कभी इतना शारीरिक श्रम नहीं किया था, परंतु नींद की चाह में उन्होंने फावड़ा उठा लिया। दोपहर से लेकर शाम तक महाराज ने चिलचिलाती धूप में पसीना बहाते हुए कड़ी मेहनत की। उनके हाथों में छाले पड़ गए और शरीर बुरी तरह थक गया।
शाम होते-होते महाराज इतने थक गए कि वे खेत के किनारे एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे ठंडी हवा में बैठ गए।
नींद का असली रहस्य: जैसे ही महाराज ने अपनी पीठ उस खुरदरी ज़मीन और पेड़ के तने से लगाई, उनकी आँखें भारी होने लगीं। कुछ ही पलों में, बिना किसी नरम गद्दे या रेशमी तकिए के, महाराज उसी ज़मीन पर गहरी और सुकून भरी नींद में सो गए! वे इतने ज़ोर से खर्राटे ले रहे थे कि आस-पास के पक्षी भी उड़ गए।
अगली सुबह जब महाराज की आँख खुली, तो वे खुद को बहुत तरोताज़ा महसूस कर रहे थे। उन्हें याद आया कि वे पूरी रात उस मिट्टी पर सोए रहे।
महाराज ने तेनालीरामा को बुलाया और पूछा: "तेनाली! उस किसान ने मुझे नींद की कौन सी दवा दी? मुझे तो याद ही नहीं कि मैंने कुछ खाया हो।"
तेनालीरामा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया: "महाराज! नींद की दवा किसी शीशी में नहीं, बल्कि आपके शरीर के 'पसीने' में होती है। जब इंसान का शरीर कड़ी मेहनत करता है और दिमाग व्यर्थ की चिंताओं से मुक्त होता है, तो नींद खुद-ब-खुद दौड़ी चली आती है। जो इंसान दिन भर शारीरिक श्रम करता है, उसे मखमल के बिस्तर की ज़रूरत नहीं होती। 'कड़ी मेहनत' ही सुकून की नींद की असली कीमत है!"
महाराज कृष्णदेवराय इस बात की गहराई को समझ गए। उन्होंने शारीरिक श्रम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया और उनकी अनिद्रा की बीमारी हमेशा के लिए दूर हो गई।
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