सोने की मोहरें और साधु का वेश — लालच और आस्था की परीक्षा

विजयनगर साम्राज्य में एक बार यह अफवाह फैली कि जंगल के किनारे एक बहुत ही सिद्ध बाबा आए हैं, जो लोगों की हर मुराद पूरी कर देते हैं। धीरे-धीरे लोगों की भीड़ उनके पास जाने लगी। यह खबर महाराज कृष्णदेवराय तक भी पहुँची। महाराज ने सोचा कि यदि सचमुच कोई इतने सिद्ध बाबा राज्य में आए हैं, तो उन्हें शाही सम्मान मिलना चाहिए।
उन्होंने तेनालीरामा को इस बात की सच्चाई पता लगाने का जिम्मा सौंपा। तेनालीरामा समझ गए कि यह ज़रूर कोई ढोंगी है जो लोगों की आस्था का फायदा उठा रहा है।
अगले दिन, तेनालीरामा ने एक साधारण किसान का वेश धरा और अपने साथ एक छोटी पोटली ली, जिसमें कुछ सिक्के खनखना रहे थे। वे उस ढोंगी साधु के पास पहुँचे। बाबा एक पेड़ के नीचे आँखें बंद किए ध्यान लगाने का नाटक कर रहे थे।
तेनालीरामा ने बाबा के चरणों में गिरकर कहा, "बाबा! मैं बहुत गरीब हूँ। मेरी बेटी की शादी है, परंतु मेरे पास धन नहीं है। मैंने सुना है आप मिट्टी को भी सोना बना देते हैं। कृपया मेरी मदद करें।"
बाबा ने धीरे से आँखें खोलीं और तेनालीरामा की खनखनाती हुई पोटली की ओर देखा। बाबा ने गंभीर आवाज़ में कहा, "बच्चा! मैं कोई जादूगर नहीं हूँ, परंतु देवताओं की कृपा से मैं तुम्हारे धन को दुगना कर सकता हूँ। तुम्हारे पास जो भी है, उसे यहाँ रख दो और कल सुबह आकर ले जाना।"
तेनालीरामा की चाल: तेनालीरामा ने अपनी पोटली बाबा के सामने रख दी और कहा, "बाबा, इसमें मेरी जीवन भर की कमाई है। कृपया इसे दुगना कर दीजिए।"
रात को बाबा ने चुपके से वह पोटली खोली। उसे उम्मीद थी कि इसमें सोने या चांदी के सिक्के होंगे। परंतु जब उसने पोटली खोली, तो उसमें सिर्फ लोहे के कुछ टुकड़े और कंकर थे! बाबा को बहुत गुस्सा आया, परंतु उसने सोचा कि शायद यह किसान सचमुच बहुत गरीब है और बेवकूफ भी।
अगली सुबह तेनालीरामा फिर से बाबा के पास पहुँचे। बाबा ने वही पोटली उन्हें वापस कर दी और कहा, "बच्चा! देवताओं ने तुम्हारी परीक्षा ली थी। तुम बहुत लालची हो, इसलिए तुम्हारा धन दुगना नहीं हुआ।"
असली परीक्षा: तेनालीरामा ने पोटली ली और मुस्कुराते हुए कहा, "बाबा! मैंने तो सुना था कि आप अंतर्यामी हैं। क्या आप यह नहीं जान पाए कि इस पोटली में धन था ही नहीं?"
इससे पहले कि बाबा कुछ समझ पाता, तेनालीरामा ने अपने साधारण कपड़े उतार दिए और अपने असली रूप में आ गए। बाबा तेनालीरामा को देखकर कांपने लगा।
तेनालीरामा ने कहा, "तुम लोगों की आस्था के साथ खेलते हो। जो सिद्ध पुरुष होता है, उसे धन की लालसा नहीं होती। तुमने बिना देखे मेरी पोटली इसलिए रख ली क्योंकि तुम्हें उसमें सोने की उम्मीद थी।"
तेनालीरामा ने उस बाबा को महाराज के सामने पेश किया और उसकी असलियत सामने ला दी। महाराज ने उस ढोंगी को राज्य से बाहर निकाल दिया और तेनालीरामा की सूझबूझ की सराहना की।
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