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"नेकी कर दरिया में डाल"

लोक परंपरा5 मिनट का पठन
"नेकी कर दरिया में डाल"

गंगा नदी के किनारे एक बहुत ही सीधा और नेकदिल नाविक रहता था, जिसका नाम था 'मंगल'। मंगल अपनी छोटी सी नाव चलाकर यात्रियों को नदी पार कराता था और जो थोड़े-बहुत पैसे मिलते, उसी से अपने परिवार का पेट पालता था।

एक दिन मंगल की नाव पर शहर का एक बहुत ही बड़ा और घमंडी व्यापारी, 'सेठ किशोरीलाल' आकर बैठा। सेठ जी के पास मोतियों और सोने के सिक्कों से भरा एक भारी थैला था। सेठ जी को अपनी दौलत पर बहुत घमंड था और वे मंगल को बहुत ही नीची नज़र से देख रहे थे।

तूफान और संकट: जब नाव नदी के बिल्कुल बीचों-बीच पहुँची, तो अचानक मौसम बिगड़ गया। आसमान में काले बादल छा गए और तेज़ हवाओं के साथ नदी में खतरनाक लहरें उठने लगीं। मंगल ने नाव को सँभालने की बहुत कोशिश की, लेकिन लहरों का ज़ोर इतना तेज़ था कि नाव एक बड़ी चट्टान से जा टकराई।

झटके से नाव हिली और सेठ किशोरीलाल का संतुलन बिगड़ गया। वे सीधे गहरी और उफनती हुई नदी में जा गिरे— 'छपाक!'

सेठ जी को तैरना नहीं आता था। वे पानी में डूबने और गोते खाने लगे। उनका सोने का थैला भी पानी में गिर गया था। वे अपनी जान बचाने के लिए चिल्ला रहे थे: "बचाओ! कोई मुझे बचाओ! मैं मरना नहीं चाहता!"

निस्वार्थ सेवा: अपनी जान की परवाह किए बिना, मंगल नाविक ने तुरंत उफनती नदी में छलाँग लगा दी। उसने अपनी पूरी ताक़त लगाकर लहरों से लड़ाई लड़ी। मंगल ने डूबते हुए सेठ किशोरीलाल को बालों से पकड़ा और खींचते हुए किनारे की तरफ ले आया। साथ ही, उसने गोता लगाकर सेठ का सोने का थैला भी सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

किनारे पर पहुँचकर मंगल ने सेठ के पेट से पानी निकाला। कुछ देर बाद सेठ किशोरीलाल को होश आ गया। जब सेठ ने देखा कि उसकी जान भी बच गई है और उसका सोने का थैला भी सुरक्षित है, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसका सारा घमंड टूट चुका था।

सेठ ने अपनी पोटली खोली और उसमें से 'दस सोने के सिक्के' निकालकर मंगल की तरफ बढ़ाते हुए कहा: "मंगल भाई! तुमने आज मेरी जान बचाई है। अगर तुम न होते, तो मैं इस दौलत के साथ नदी में डूब गया होता। यह सोने के सिक्के तुम्हारा इनाम हैं, इन्हें रख लो।"

मंगल ने बहुत ही शांति और नम्रता से सेठ के हाथ को पीछे कर दिया और मुस्कुराते हुए कहा: "सेठ जी! इंसान की जान बचाना मेरा धर्म था। मैंने आपकी मदद इसलिए नहीं की कि मुझे इसके बदले में कोई इनाम या सोने के सिक्के चाहिए थे। अगर मैं नेकी के बदले कीमत लूँगा, तो यह व्यापार बन जाएगा, भलाई नहीं।"

सेठ जी हैरान रह गए: "लेकिन मंगल, तुम इतने गरीब हो, फिर भी इतना बड़ा इनाम ठुकरा रहे हो? कम से कम मुझे धन्यवाद तो कहने दो।"

मंगल अपनी नाव की रस्सी खोलते हुए बोला: "सेठ जी! हमारे बुजुर्गों ने सिखाया है कि इंसान को भलाई करके उसे याद नहीं रखना चाहिए। भलाई करो और उसे भूल जाओ, क्योंकि भगवान सब देख रहा है। मेरे लिए तो यही कहावत सच है— 'नेकी कर, और दरिया में डाल!' (यानी नेकी करो और उसे नदी के बहते पानी में बहा दो, उसके बदले में कुछ मत माँगो)।"

यह कहकर मंगल अपनी नाव लेकर लहरों के बीच से वापस चला गया, और सेठ किशोरीलाल उस गरीब नाविक की महान सोच के सामने हाथ जोड़े खड़े रह गए।

🎉 कहानी समाप्त

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