भाग 34: श्रीराम का अनुनय और समुद्र का अहंकार

विभीषण के परामर्शानुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने समुद्र के तट पर कुशा का आसन बिछाया और हाथ जोड़कर समुद्र देव से मार्ग देने की प्रार्थना करने लगे। तीन दिन और तीन रातें बीत गईं। श्रीराम ने न कुछ खाया, न पिया और न ही अपनी पलकें झपकाईं। वे एक तपस्वी की भांति शांत भाव से समुद्र के सामने 'विनय' (प्रार्थना) करते रहे।
परंतु समुद्र देव अपने विस्तार और अपनी गहराई के अहंकार में चूर थे। उन्होंने सोचा कि राम तो केवल एक मनुष्य हैं, वे मेरा क्या बिगाड़ लेंगे? तीन दिन बीत जाने के बाद भी जब समुद्र ने कोई उत्तर नहीं दिया और न ही मार्ग दिया, तब श्रीराम का धैर्य समाप्त हो गया।
उनकी आंखों में करुणा के स्थान पर अब प्रलय की ज्वाला धधक उठी। वे अपने आसन से उठ खड़े हुए और लक्ष्मण से बोले, "लक्ष्मण! मेरा 'कोदंड' धनुष और अग्निबाण लाओ! विनय से यह जड़ समुद्र नहीं मानने वाला। जैसे नीच व्यक्ति को समझाने से वह अपनी आदत नहीं छोड़ता, वैसे ही यह समुद्र मेरी प्रार्थना को मेरी कमजोरी समझ रहा है।"
"बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति॥"
श्रीराम ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और जैसे ही 'अग्निबाण' का संधान किया, पूरी सृष्टि कांप उठी। समुद्र का जल खौलने लगा, विशाल लहरें आकाश को छूने लगीं और जल के भीतर रहने वाले भयंकर मगरमच्छ और मछलियां व्याकुल होकर तट पर आने लगे। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो आज समुद्र का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।
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