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🏹 रामायण

भाग 33: विभीषण का राज्याभिषेक और सागर तट पर श्रीराम की तपस्या

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 33: विभीषण का राज्याभिषेक और सागर तट पर श्रीराम की तपस्या

हनुमान और अंगद के साथ जब विभीषण श्रीराम के शिविर की ओर बढ़े, तो उनका हृदय ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। जैसे ही उन्होंने सामने देखा—वही सांवला-सलोना रूप, चौड़ी छाती, लंबी भुजाएं, कमल जैसे शांत नेत्र, और शरीर पर तपस्वियों के वल्कल वस्त्र—विभीषण अपनी सुध-बुध खो बैठे।

वे दौड़ते हुए गए और साष्टांग दंडवत करते हुए श्रीराम के चरणों में गिर पड़े। उनके नेत्रों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली जो श्रीराम के चरणों को धोने लगी। विभीषण ने गदगद कंठ से कहा:

"श्रवन सुजस सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर॥" (अर्थात: हे प्रभु! मैं आपके सुयश को सुनकर आपकी शरण में आया हूँ। आप संसार के सभी भयों और जन्म-मरण के चक्र का नाश करने वाले हैं। हे शरणागत को सुख देने वाले रघुवीर! मेरी रक्षा करें! मैं अनाथ हूँ!)

श्रीराम ने तुरंत झुककर विभीषण को उठाया और अपने हृदय से अत्यंत कसकर लगा लिया। राम का वह दिव्य स्पर्श पाते ही विभीषण का रोम-रोम पुलकित हो उठा। उनकी जन्म-जन्मांतर की तपस्या सफल हो गई।

श्रीराम ने विभीषण को अत्यंत आदर के साथ अपने पास बैठाया और एक मित्र की भांति उनका कुशल-क्षेम पूछा। फिर श्रीराम ने अचानक लक्ष्मण की ओर देखा और एक ऐसा आदेश दिया जिसने सुग्रीव सहित पूरी वानर सेना को चकित कर दिया। श्रीराम ने कहा:

"लक्ष्मण! तुरंत समुद्र से पवित्र जल भरकर लाओ। मैं आज ही, इसी क्षण अपने मित्र विभीषण का राज्याभिषेक करूँगा।"

सुग्रीव और वानर सेना आश्चर्य में पड़ गए। युद्ध अभी शुरू भी नहीं हुआ था, रावण अभी जीवित था, लंका का अभेद्य किला अभी सुरक्षित था, परंतु श्रीराम पहले ही एक शरणार्थी को लंका का राजा घोषित कर रहे थे!

गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस प्रसंग पर एक अत्यंत मार्मिक और गहरी बात लिखी है:

"जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ॥" (अर्थात: रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने दस सिर काट-काट कर अग्नि में चढ़ाए थे, तब जाकर उसे लंका की जो असीम संपत्ति और राजपाट मिला था, वही लंका श्रीराम ने विभीषण को बिना कुछ मांगे ही दे दी। और देते समय श्रीराम संकोच कर रहे थे कि 'हे मित्र! मैं तुम्हें केवल यह सोने की लंका ही दे पा रहा हूँ, यह तुम्हारी भक्ति के सामने बहुत कम है')।

लक्ष्मण जल ले आए। श्रीराम ने अपने हाथों से विभीषण के मस्तक पर राजतिलक किया और पूरी सेना के सामने घोषणा की: "हे विभीषण! आज से तुम लंका के नरेश हो। रावण का अंत अब निश्चित है, और यह लंका अब तुम्हारे धर्म के शासन में रहेगी।" वानर सेना ने "लंकापति विभीषण की जय" और "श्रीराम की जय" के नारे लगाए।

राज्याभिषेक के पश्चात, जब सभी सेनापति शांत होकर बैठे, तब श्रीराम ने विभीषण से युद्ध की प्रथम और सबसे बड़ी चुनौती के विषय में चर्चा आरंभ की। श्रीराम ने कहा, "हे लंकापति! अब तुम बताओ, इस सौ योजन (लगभग 800 मील) के भयंकर और अथाह समुद्र को हमारी यह विशाल वानर सेना कैसे पार करेगी? बिना इसे लांघे लंका पर आक्रमण करना असंभव है।"

विभीषण अत्यंत ज्ञानी थे। उन्होंने हाथ जोड़कर एक बहुत ही नीतिपूर्ण सुझाव दिया:

"हे प्रभु! आप साक्षात नारायण हैं। आपके तरकश के एक बाण से यह समुद्र पल भर में सूख सकता है। परंतु मर्यादा का पालन करना ही आपके अवतार का मुख्य उद्देश्य है। यह समुद्र देवता आपके पूर्वज महाराज सगर के पुत्रों द्वारा खोदे जाने के कारण ही इस विशाल रूप में आए थे (इसीलिए समुद्र को 'सागर' कहा जाता है)। इसलिए यह समुद्र आपके इक्ष्वाकु कुल का ऋणी है। आप अपने बाणों का प्रयोग करने से पूर्व, समुद्र के तट पर कुशा (पवित्र घास) बिछाकर तपस्या करें और समुद्र देव से विनयपूर्वक मार्ग देने की प्रार्थना करें। वे अवश्य ही आपके सम्मान में प्रकट होंगे और आपको लंका तक पहुँचने का कोई मार्ग सुझाएंगे।"

विभीषण की यह धर्म और मर्यादा से युक्त बात श्रीराम को अत्यंत उचित लगी। उन्होंने अपना अस्त्र-शस्त्र त्याग दिया। समुद्र के ठीक सामने, रेतीले तट पर कुशा (घास) का आसन बिछाया गया।

श्रीराम हाथ जोड़कर, बिना अन्न-जल ग्रहण किए, समुद्र देव की तपस्या और विनय करने के लिए ध्यान मुद्रा में बैठ गए।

अब तीन दिन और तीन रातें बीतने वाली हैं। श्रीराम अत्यंत विनम्रता से समुद्र से मार्ग मांगेंगे। परंतु जब समुद्र अपनी गहराई और अपने असीम जल के अहंकार में चूर होकर उनकी प्रार्थना पर कोई ध्यान नहीं देगा, तब तीन दिन बाद श्रीराम का वह प्रलयंकारी रौद्र रूप प्रकट होगा, जिसे देखकर तीनों लोकों की आत्मा कांप उठेगी।

🎉 कहानी समाप्त

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