भाग 31: विभीषण का धर्मोपदेश, रावण का प्रहार और लंका त्याग

रावण की राजसभा में जब मेघनाद और प्रहस्त जैसे मंत्री अपनी वीरता की झूठी डींगें हांक रहे थे और रावण को भ्रम में डाल रहे थे, तब रावण का सबसे छोटा भाई 'विभीषण' अपने आसन से उठ खड़ा हुआ। विभीषण अत्यंत सात्विक, धर्मपरायण और दूरदर्शी था। पूरी लंका में वह अकेला ऐसा व्यक्ति था जो श्रीराम के वास्तविक स्वरूप (परमेश्वर) को पहचानता था।
विभीषण के उठते ही पूरी सभा में सन्नाटा छा गया। विभीषण ने दोनों हाथ जोड़कर रावण को प्रणाम किया और अत्यंत निर्भय तथा स्पष्ट स्वर में कहा:
"हे बड़े भाई! आपके ये मंत्री आपके हितैषी नहीं, बल्कि आपके सबसे बड़े शत्रु हैं। राजनीति का नियम है कि जो मंत्री राजा को केवल वही बताए जो राजा सुनना चाहता है, वह मंत्री राज्य का विनाश कर देता है। ये आपको झूठा दिलासा देकर मृत्यु के मुख में धकेल रहे हैं।"
विभीषण ने अपनी बात को और तार्किक बनाते हुए कहा, "हे भ्राता! जिस राम के एक साधारण दूत ने अकेले ही हमारे पुत्रों को मार डाला, हमारी सेना को कुचल दिया और हमारी अजेय लंका को भस्म कर दिया, उस राम को आप 'साधारण मनुष्य' समझने की भूल कर रहे हैं? कुंभकर्ण सो रहा है, और आप इन चापलूसों के भरोसे युद्ध जीतना चाहते हैं?"
विभीषण ने लंका में हो रहे अपशकुनों की ओर ध्यान दिलाते हुए चेतावनी दी: "जब से आप उस परम सती सीता को इस लंका में लाए हैं, तब से लंका में अनिष्ट होने लगे हैं। हमारे यज्ञों में रक्त और मांस की वर्षा हो रही है, रात में महल की छतों पर सियार (गीदड़) रोते हैं, और हमारी कुल-देवियों की मूर्तियां आंसू बहा रही हैं। यह सीता कोई साधारण स्त्री नहीं, साक्षात 'कालरात्रि' (विनाश की देवी) है जो लंका को निगलने आई है। मेरी आपसे हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि अपना अहंकार त्याग दें। सीता माता को ससम्मान अनेक रत्नों के साथ श्रीराम को लौटा दें और उनसे क्षमा मांग लें। श्रीराम अत्यंत दयालु हैं, वे आपको क्षमा कर देंगे। इसी में लंका और हमारे राक्षस कुल की भलाई है।"
विभीषण की यह धर्मसम्मत, सत्य और नीतिपूर्ण बात रावण के कान में पिघले हुए सीसे के समान पड़ी। रावण का अहंकार फुफकारते हुए काले नाग की तरह जाग उठा। उसकी दसों आंखें क्रोध से लाल हो गईं और उसके नथुने फड़कने लगे।
रावण ने अपने सिंहासन से उठकर एक भयंकर गर्जना की:
"अरे कायर! तू मेरे ही अन्न पर पलता है, मेरे ही कारण आज तक जीवित है, और भरी सभा में मेरे ही शत्रु का गुणगान कर रहा है? तेरे जैसा कुलद्रोही (गद्दार) मैंने आज तक नहीं देखा! तू बाहर से तो मेरा भाई है, परंतु भीतर से राम का दास है। यदि तू मेरा छोटा भाई न होता, तो मैं अभी इसी क्षण अपनी तलवार से तेरी जीभ काट देता!"
इतना कहते-कहते रावण का क्रोध इस सीमा तक पहुँच गया कि उसकी आंखों पर अज्ञान की पट्टी बंध गई। वह अपने ऊंचे सिंहासन से नीचे उतरा और उसने पूरी सभा के सामने विभीषण की छाती पर एक अत्यंत ज़ोरदार लात (ठोकर) मार दी।
आघात इतना तीव्र था कि विभीषण लड़खड़ा कर धरती पर गिर पड़े। पूरी सभा स्तब्ध रह गई। एक चक्रवर्ती सम्राट द्वारा अपने ही सगे भाई का भरी सभा में ऐसा घोर और शारीरिक अपमान!
परंतु विभीषण ने फिर भी अपना धर्म और अपनी मर्यादा नहीं छोड़ी। वे धीरे से उठे। उनके नेत्रों में आंसू थे, परंतु हृदय में कोई क्रोध या प्रतिशोध नहीं था। उन्होंने हाथ जोड़कर रावण के चरण स्पर्श किए और अत्यंत शांत स्वर में कहा:
"आप मेरे बड़े भाई हैं, पिता के समान हैं। आपने मुझे लात मारी, यह आपका अधिकार है और मैं इसे आपका आशीर्वाद मानता हूँ। परंतु मैं सत्य कहने से नहीं चूकूँगा। आप मृत्यु के वश में आ चुके हैं, इसलिए आपको मेरी अमृत जैसी बातें भी विष लग रही हैं। जब काल (मृत्यु) मनुष्य के सिर पर मंडराता है, तो सबसे पहले उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।"
विभीषण ने एक गहरी सांस ली और अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए कहा, "हे रावण! अब मैं आपको आपके भाग्य पर छोड़ता हूँ। जहाँ धर्म नहीं है, वहां मेरा रहना संभव नहीं है। मैं श्रीराम की शरण में जा रहा हूँ।"
यह कहकर विभीषण अपने चार अत्यंत विश्वस्त मंत्रियों (अनल, पनस, संपाती और प्रभाती) के साथ राजसभा से बाहर निकले और आकाश मार्ग में उड़ चले।
वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि जैसे ही विभीषण ने लंका छोड़ी, लंका की 'राजलक्ष्मी' और 'धर्म' ने भी हमेशा के लिए लंका का त्याग कर दिया। विभीषण ने अपनी जन्मभूमि लंका की ओर एक अंतिम बार अत्यंत दुख और पीड़ा के साथ देखा, और फिर वे उस दिशा की ओर उड़ चले जहाँ धर्म, सत्य और मर्यादा के साक्षात अवतार श्रीराम समुद्र के उस पार अपनी सेना के साथ उपस्थित थे।
रावण की राजसभा में अब केवल मृत्यु का सन्नाटा था। विभीषण का यह प्रस्थान केवल एक भाई का घर छोड़ना नहीं था, बल्कि यह रावण की पराजय का सबसे बड़ा और निर्णायक कूटनीतिक अध्याय था।
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