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🏹 रामायण

भाग 14: मायावी स्वर्ण मृग और रावण द्वारा सीता हरण

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 14: मायावी स्वर्ण मृग और रावण द्वारा सीता हरण

रावण के कठोर आदेश और मृत्यु के भय से विवश होकर, मारीच ने अपनी मायावी शक्तियों का प्रयोग किया। उसने एक ऐसे अद्भुत और अलौकिक 'स्वर्ण मृग' (सोने के हिरण) का रूप धारण किया, जिसकी कल्पना करना भी मानव मस्तिष्क के लिए कठिन था। उस हिरण का शरीर शुद्ध तपाये हुए स्वर्ण के समान दमक रहा था। उसके शरीर पर चांदी की चमकती हुई बूंदों जैसे धब्बे थे। उसके सींग बहुमूल्य रत्नों (नीलम और मूंगे) से जड़े हुए थे और उसकी आंखें खिले हुए नीले कमलों के समान प्रतीत हो रही थीं।

वह मायावी मृग कुलांचें भरता हुआ ठीक उसी स्थान पर पहुँच गया जहाँ पंचवटी में श्रीराम की पर्णकुटी थी। उस समय माता सीता आश्रम के बाहर खिले हुए पुष्प चुन रही थीं। अचानक उनकी दृष्टि उस अद्भुत स्वर्ण मृग पर पड़ी। हिरण कभी घास चरता, कभी चौकड़ी भरता, और कभी आश्रम के बिल्कुल निकट आकर ऐसे खड़ा हो जाता मानो किसी को चिढ़ा रहा हो।

सीता जी उस अलौकिक पशु की सुंदरता पर पूरी तरह मुग्ध हो गईं। उन्होंने उत्साह से पुकार कर श्रीराम और लक्ष्मण को बाहर बुलाया। सीता जी ने श्रीराम से कहा, "हे आर्यपुत्र! देखिए, यह हिरण कितना अद्भुत और सुंदर है। कृपा करके इसे जीवित ही पकड़ लीजिए। जब हमारा चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण होगा, तब हम इसे अपने साथ अयोध्या ले जाएंगे और यह हमारे राजमहल की शोभा बढ़ाएगा।"

लक्ष्मण ने जैसे ही उस हिरण को देखा, उनका माथा ठनक गया। उन्होंने अपने बड़े भाई को सावधान करते हुए कहा, "भैया! यह कोई साधारण पशु नहीं है। प्रकृति में सोने का हिरण कभी नहीं होता। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यह कोई मायावी राक्षस है। शायद यह वही मारीच है जो ऋषियों को धोखा देने के लिए ऐसे रूप धरता है। आप इसके पीछे मत जाइए।"

परंतु नियति ने जो खेल रचा था, उसे तो पूरा होना ही था। सीता जी का हठ इतना प्रबल था कि श्रीराम उन्हें मना नहीं कर सके। श्रीराम ने लक्ष्मण को आज्ञा दी, "हे लक्ष्मण! सीता की यह इच्छा मुझे पूरी करनी ही होगी। तुम अत्यंत सावधानी से अपने धनुष-बाण के साथ सीता की रक्षा करना और वीर जटायु भी यहीं पास में हैं। मैं अभी इस मृग को लेकर आता हूँ।"

श्रीराम ने अपना धनुष उठाया और उस स्वर्ण मृग के पीछे चल पड़े। मारीच का उद्देश्य राम को कुटिया से बहुत दूर ले जाना था। इसलिए वह कभी छिप जाता, कभी राम की बाण की पहुंच से थोड़ा सा आगे निकल जाता और कभी घने पेड़ों के पीछे भाग जाता। राम उस मायावी मृग का पीछा करते-करते आश्रम से मीलों दूर निकल गए।

जब श्रीराम को यह आभास हो गया कि इसे जीवित पकड़ना असंभव है और लक्ष्मण का संदेह सत्य था, तब उन्होंने अपने धनुष पर एक अत्यंत तीक्ष्ण और घातक बाण चढ़ाया और पूरे वेग से छोड़ दिया। बाण सीधे मारीच के हृदय में जा लगा।

बाण लगते ही मारीच धरती पर गिर पड़ा और अपने असली, भयंकर राक्षसी रूप में आ गया। परंतु मरते-मरते उसने रावण की योजना का अंतिम और सबसे खतरनाक चरण पूरा किया। उसने हूबहू श्रीराम के स्वर की नकल की और अत्यंत करुण तथा दर्दनाक आवाज़ में पुकारा— "हा सीते! हा लक्ष्मण! मेरी रक्षा करो!"

यह चीत्कार इतनी तेज़ थी कि दूर पंचवटी की कुटिया में बैठी सीता जी के कानों तक स्पष्ट रूप से पहुँच गई। अपने पति के स्वर में ऐसी करुण पुकार सुनकर सीता जी का हृदय कांप उठा। वे घबराहट से रोने लगीं और उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "लक्ष्मण! जल्दी जाओ! तुम्हारे बड़े भाई किसी भारी संकट में हैं। वे तुम्हें पुकार रहे हैं।"

लक्ष्मण शांत खड़े रहे। उन्होंने सीता जी को समझाते हुए कहा, "माता! आप शांत रहें। तीनों लोकों में ऐसा कोई देवता, दानव या राक्षस नहीं है जो मेरे भ्राता राम को पराजित कर सके। यह चीत्कार उनकी नहीं है, यह किसी मायावी राक्षस की चाल है। राम की आज्ञा है कि मैं आपको यहाँ अकेली छोड़कर कहीं न जाऊँ।"

पति के प्राणों की चिंता में सीता जी अपना विवेक खो बैठीं। घबराहट और क्रोध के आवेश में उनके मुख से ऐसे कटु वचन निकल गए जो उनके स्वभाव के बिल्कुल विपरीत थे। उन्होंने लक्ष्मण पर संदेह करते हुए कहा, "लक्ष्मण! क्या तुम अपने भाई की मृत्यु चाहते हो? मैं राम के बिना एक क्षण जीवित नहीं रहूँगी!"

ये कटु वचन लक्ष्मण के हृदय में विष बुझे तीरों के समान लगे। उनके नेत्रों से अश्रु बह निकले। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, "हे माता! मैं तो केवल अपना धर्म निभा रहा था, परंतु आपके इन वचनों ने मुझे विदीर्ण कर दिया है। मैं जा रहा हूँ, वन के देवता आपकी रक्षा करें।"

(यहीं पर लोककथाओं और रामचरितमानस के अनुसार लक्ष्मण ने कुटिया के चारों ओर अपने बाण से एक अभेद्य 'लक्ष्मण रेखा' खींची थी और सीता जी को आदेश दिया था कि किसी भी परिस्थिति में इस रेखा को पार न करें।)

लक्ष्मण के जाते ही वन में सन्नाटा छा गया। रावण, जो एक पेड़ के पीछे छिपा इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था, उसने एक परिव्राजक (संन्यासी/साधु) का रूप धारण किया। उसने भगवा वस्त्र पहने, हाथ में कमंडल और दंड लिया और "भवति भिक्षां देहि" (भिक्षा दें) कहता हुआ कुटिया के द्वार पर आ गया।

सीता जी ने द्वार पर एक साधु को देखकर फल और कंद-मूल लिए और बाहर आईं। परंतु जब वे साधु को भिक्षा देने लगीं, तो रावण लक्ष्मण रेखा के प्रभाव से भस्म होने के डर से पीछे हट गया। उसने क्रोधित होने का नाटक करते हुए कहा, "हे देवी! मैं एक अतिथि और ब्राह्मण हूँ, और तुम मुझे अपनी दहलीज (रेखा) के अंदर से भिक्षा दे रही हो? यह मेरा घोर अपमान है। यदि तुमने बाहर आकर भिक्षा नहीं दी, तो मैं तुम्हें और तुम्हारे वंश को भस्म होने का श्राप दे दूँगा!"

श्राप के भय और अतिथि सत्कार के धर्म से विवश होकर, सीता जी ने जैसे ही लक्ष्मण रेखा पार की, रावण ने अपना साधु का वेश त्याग दिया। वह अपने दस सिरों वाले भयंकर और विशालकाय राक्षसी रूप में प्रकट हो गया।

सीता जी भय से चीख पड़ीं। रावण ने बलपूर्वक उन्हें उठाकर अपने मायावी 'पुष्पक विमान' (जो आकाश में उड़ने वाला रथ था) में डाल लिया। विमान तेजी से दक्षिण दिशा (लंका की ओर) में उड़ने लगा।

सीता जी विलाप कर रही थीं। वे रोते हुए नीचे वन के वृक्षों, गोदावरी नदी, और पशु-पक्षियों को पुकार-पुकार कर कह रही थीं, "हे वन देवताओ! मेरे राम से कहना कि रावण उनकी सीता को चुरा ले गया है!"

सीता जी का यह करुण विलाप सुनकर एक पेड़ पर सो रहे वृद्ध गिद्धराज जटायु की नींद टूट गई। जटायु ने जब देखा कि दुष्ट रावण उनकी पुत्रवधू समान सीता का हरण कर ले जा रहा है, तो उनका खून खौल उठा। जटायु बूढ़े अवश्य थे, लेकिन उनमें गरुड़ के समान बल था।

उन्होंने रावण को ललकारते हुए कहा, "अरे नीच! रुक जा! मैं दशरथ का मित्र जटायु हूँ। जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, तू सीता को नहीं ले जा सकता।"

जटायु ने एक भयंकर आंधी की तरह पुष्पक विमान पर आक्रमण कर दिया। उनकी मजबूत चोंच और पंजों के प्रहार से रावण का विमान डगमगाने लगा। जब रावण ने देखा कि वह इस पक्षी से पार नहीं पा सकेगा, तो उसने अपनी अत्यंत भयानक और अजेय तलवार 'चंद्रहास' निकाली। इससे पहले कि जटायु दूसरा वार करते, रावण ने निर्ममता से जटायु के दोनों पंख काट दिए।

पंख कटते ही जटायु रक्त से लथपथ होकर धरती पर गिर पड़े। रावण अपनी माया शक्ति से आकाश मार्ग में उड़ता हुआ लंका की ओर भाग निकला।

🎉 कहानी समाप्त

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