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भाग 49: राम-रावण महासंग्राम, 'आदित्य हृदय स्तोत्र', नाभि का रहस्य और दशानन का अंत

महर्षि वाल्मीकि — रामायण9 मिनट का पठन
भाग 49: राम-रावण महासंग्राम, 'आदित्य हृदय स्तोत्र', नाभि का रहस्य और दशानन का अंत

श्रीराम और रावण के बीच वह महासंग्राम आरंभ हुआ, जिसकी तुलना ब्रह्मांड में किसी और युद्ध से नहीं की जा सकती। वाल्मीकि जी लिखते हैं कि "राम-रावण का युद्ध केवल राम और रावण के युद्ध जैसा ही था" (गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः... रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव)।

रावण ने अत्यंत क्रोध में भरकर श्रीराम पर मायावी बाणों की झड़ी लगा दी। उसने श्रीराम पर 'आग्नेयास्त्र' (अग्नि का अस्त्र) छोड़ा, तो श्रीराम ने 'वरुणास्त्र' (जल का अस्त्र) से उसे बुझा दिया। रावण ने सर्पबाण छोड़े, तो राम ने गरुड़ास्त्र से उन्हें नष्ट कर दिया। आकाश बाणों से ढक गया। दोनों के अस्त्र टकराकर भयंकर गर्जना कर रहे थे।

यह युद्ध कई दिनों और रातों तक बिना रुके चलता रहा।

रावण के सिरों का रहस्य: जब श्रीराम ने देखा कि रावण साधारण बाणों से नहीं मर रहा है, तो उन्होंने अपने धनुष पर अचूक बाण चढ़ाए और रावण के सिरों को काटना आरंभ किया।

श्रीराम का बाण रावण के एक सिर को धड़ से अलग कर देता, परंतु वह सिर धरती पर गिरता, उससे पहले ही रावण के धड़ पर एक नया सिर उग आता! श्रीराम ने उसके दस सिर और बीस भुजाएं कई बार काट डालीं, परंतु वे हर बार किसी जादू की तरह वापस जुड़ जाते।

रावण अट्टहास करते हुए राम पर प्रहार कर रहा था। श्रीराम कुछ क्षण के लिए विचार में पड़ गए कि यह कैसा मायावी शत्रु है जिसका अंत ही नहीं हो रहा है? (वास्तव में श्रीराम रावण की तपस्या के प्रभाव को पूरी दुनिया को दिखाना चाहते थे)।

अगस्त्य मुनि और 'आदित्य हृदय स्तोत्र': श्रीराम को युद्ध भूमि में विचारमग्न देखकर, देवताओं के बीच आकाश में खड़े महर्षि अगस्त्य नीचे उतरे। उन्होंने श्रीराम के पास आकर एक अत्यंत गुप्त और शक्तिशाली स्तोत्र का उपदेश दिया।

महर्षि अगस्त्य ने कहा, "हे राम! आप सूर्यवंश के सूर्य हैं। आप 'आदित्य हृदय स्तोत्र' का पाठ करें। यह भगवान सूर्य की अत्यंत शक्तिशाली स्तुति है, जो हर प्रकार के संकट का नाश करती है और विजय दिलाती है।" श्रीराम ने आचमन किया, सूर्य देव की ओर मुख करके तीन बार उस दिव्य स्तोत्र का पाठ किया और फिर एक नए तेज के साथ अपना धनुष उठा लिया।

नाभि में 'अमृत' का रहस्य: श्रीराम के प्रहार फिर भी रावण के सिरों को काट रहे थे, और वे फिर जुड़ रहे थे। तब विभीषण ने देखा कि अब युद्ध को समाप्त करने का समय आ गया है।

विभीषण राम के पास गए और उन्होंने लंकापति का सबसे बड़ा और अंतिम रहस्य खोल दिया: "हे प्रभु! रावण के सिर काटने से उसकी मृत्यु नहीं होगी। जब इसने ब्रह्मा जी की घोर तपस्या की थी, तब ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर इसकी 'नाभि' में 'अमृत' का एक कुंड स्थापित कर दिया था। जब तक वह अमृत इसकी नाभि में सुरक्षित है, इसके प्राण नहीं निकल सकते और इसके अंग जुड़ते रहेंगे। आप पहले अग्निबाण से इसकी नाभि के अमृत को सोख लीजिए, और फिर इसके हृदय पर प्रहार कीजिए!"

दशानन का अंत (ब्रह्मास्त्र का प्रयोग): विभीषण से यह रहस्य जानकर, श्रीराम ने अपने तरकश से महर्षि अगस्त्य द्वारा दिया गया अत्यंत भयंकर और प्रज्वलित 'ब्रह्मास्त्र' निकाला। वह बाण साक्षात काल के समान था। उसके अग्रभाग में अग्नि धधक रही थी और पंखों में वायु का वेग था।

श्रीराम ने वह बाण अपने 'कोदंड' धनुष पर चढ़ाया। प्रत्यंचा कान तक खींची और पूरी शक्ति के साथ बाण छोड़ दिया।

आकाश को चीरता हुआ वह ब्रह्मास्त्र सीधे रावण की छाती और नाभि पर जाकर लगा।

बाण लगते ही एक भयंकर विस्फोट जैसी आवाज़ हुई। ब्रह्मास्त्र ने सबसे पहले रावण की नाभि के अमृत को सोख कर सुखा दिया, और फिर उसके विशाल हृदय को चीरते हुए निकल गया।

तीनों लोकों को थर्राने वाला, शिव का परम भक्त, देवलोक का विजेता और अहंकार का सबसे बड़ा प्रतीक दशानन रावण—एक भयंकर चीत्कार के साथ अपने रथ से धरती पर गिर पड़ा। रावण के गिरते ही धरती कांप उठी। समुद्र की लहरें शांत हो गईं और हवाएं रुक गईं।

रावण का प्राणहीन शरीर धूल में सना हुआ पड़ा था। तुलसीदास जी लिखते हैं कि रावण के शरीर से एक अत्यंत दिव्य ज्योति (प्रकाश) निकली (रावण को भी श्रीराम के हाथों मोक्ष प्राप्त हुआ, क्योंकि वह नारायण के द्वारपाल 'जय-विजय' का अवतार था)।

देवताओं का हर्ष और विभीषण का शोक: रावण की मृत्यु होते ही आकाश से देवताओं ने नगाड़े बजाए और फूलों की भयंकर वर्षा की। गंधर्व गाने लगे और अप्सराएं नाचने लगीं। ब्रह्मांड से अधर्म का सबसे बड़ा बोझ उतर चुका था। वानर सेना ने अपनी पूरी शक्ति से "सियावर रामचंद्र की जय!" का ऐसा जयघोष किया कि पूरा समुद्र तट गूंज उठा।

परंतु दूसरी ओर, विभीषण अपने भाई रावण के शव के पास बैठकर फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने कहा, "हे भ्राता! मैंने आपको बहुत समझाया था, परंतु आपने काल के वश में होकर मेरी एक न सुनी।"

श्रीराम अत्यंत करुणा के साथ विभीषण के पास गए। उन्होंने विभीषण के कंधे पर हाथ रखकर कहा: "मित्र, शोक मत करो। रावण एक महान योद्धा और परम ज्ञानी था। मृत्यु के बाद सारे बैर (दुश्मनी) समाप्त हो जाते हैं। 'मरणान्तानि वैराणि'—मेरा और इसका बैर इसके प्राणों के साथ ही खत्म हो गया। अब यह तुम्हारा भाई होने के साथ-साथ मेरा भी भाई है। उठो और पूरे वैदिक सम्मान के साथ एक चक्रवर्ती सम्राट की भांति इसका अंतिम संस्कार संपन्न करो।"

श्रीराम की इस असीम करुणा और मर्यादा को देखकर देवता भी नतमस्तक हो गए।

रावण का वध हो चुका था, परंतु श्रीराम का सबसे बड़ा कार्य अभी शेष था—अशोक वाटिका में बैठी, 11 महीनों से अपने राम की प्रतीक्षा कर रही माता सीता की अग्नि परीक्षा और उनका वह ऐतिहासिक पुनर्मिलन।

🎉 कहानी समाप्त

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