भाग 21: वानर सेना का प्रस्थान, श्रीराम की मुद्रिका और गिद्धराज संपाती से भेंट

लक्ष्मण का क्रोध शांत होने के कुछ ही दिनों भीतर, किष्किंधा के आस-पास का पूरा क्षेत्र एक अभूतपूर्व दृश्य का साक्षी बना। सुग्रीव की आज्ञा पाकर दिशा-दिशा से, पहाड़ों, जंगलों और गुफाओं से करोड़ों की संख्या में वानर और भालू किष्किंधा में एकत्र होने लगे। सुग्रीव ने अपने सभी सेनापतियों को बुलाया और उन्हें चार दलों में विभाजित कर दिया।
सुग्रीव ने पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में अपनी विशाल सेनाएं भेजीं। परंतु सुग्रीव और श्रीराम दोनों ही यह जानते थे कि रावण सीता माता को लेकर दक्षिण दिशा की ओर गया था। इसलिए सुग्रीव ने दक्षिण दिशा के दल में अपने सबसे श्रेष्ठ, बुद्धिमान और बलवान योद्धाओं को चुना। इस विशेष दल के नेता थे युवराज अंगद। उनके साथ परम ज्ञानी जाम्बवंत (भालुओं के राजा), विश्वकर्मा के पुत्र नल और नील, और सबसे महत्वपूर्ण—पवनपुत्र हनुमान शामिल थे।
सुग्रीव ने सभी वानरों को एक अत्यंत कठोर आदेश दिया: "तुम्हारे पास केवल एक मास (महीने) का समय है।"
जब सभी वानर प्रस्थान के लिए तैयार हुए, तब श्रीराम की दृष्टि हनुमान जी पर पड़ी। श्रीराम के अंतर्मन ने यह जान लिया था कि यदि इस पूरे ब्रह्मांड में कोई सीता को खोज सकता है, तो वह केवल और केवल हनुमान है। श्रीराम ने हनुमान को अपने पास बुलाया।
जब हनुमान जी हाथ जोड़कर श्रीराम के सम्मुख झुके, तो श्रीराम ने अपने हाथ से अपने नाम ('राम') से अंकित एक अत्यंत सुंदर स्वर्ण मुद्रिका (अंगूठी) निकाली। श्रीराम ने वह अंगूठी हनुमान जी को सौंपते हुए अत्यंत भावुक स्वर में कहा, "हे हनुमान! सीता राक्षसों के बीच घिरी होगी और डरी हुई होगी। जब तुम उसके पास जाओगे, तो वह तुम्हें भी रावण का भेजा हुआ कोई मायावी राक्षस समझ सकती है। तब तुम उसे मेरी यह मुद्रिका दिखा देना। इसे देखते ही उसे विश्वास हो जाएगा कि तुम मेरे ही भेजे हुए सच्चे दूत हो। और हनुमान... उसे मेरा प्रेम और सांत्वना देना। कहना कि राम उसे भूला नहीं है।"
हनुमान जी ने उस पवित्र मुद्रिका को किसी महाप्रसाद की तरह अपने माथे से लगाया और उसे अत्यंत यत्न से बांध लिया। श्रीराम के चरणों की धूल मस्तक पर लगाकर, "जय श्रीराम" के गगनभेदी जयघोष के साथ, अंगद के नेतृत्व में यह दक्षिण दिशा का दल माता सीता की खोज में निकल पड़ा।
यह वानर सेना दक्षिण के घने जंगलों, विंध्याचल की भयानक घाटियों और पर्वतों की कंदराओं की खाक छानती रही। उन्होंने हर गुफा, हर पेड़ और हर चोटी को देखा, परंतु सीता माता का कोई सुराग नहीं मिला। इसी खोज के दौरान, भूख और प्यास से तड़पते हुए वे एक रहस्यमयी, जादुई गुफा (ऋक्षबिल) में फंस गए। वहां घोर अंधकार था। अंततः उस गुफा में तपस्या कर रही 'स्वयंप्रभा' नाम की एक दिव्य योगिनी ने उनकी रक्षा की। स्वयंप्रभा ने उन्हें भोजन कराया और अपनी तपस्या के बल से आंखें बंद कराकर, पल भर में उस गुफा से बाहर निकालकर सीधे दक्षिण दिशा के अंतिम छोर—महान और अनंत 'दक्षिण सागर' (हिंद महासागर) के तट पर पहुँचा दिया।
जब वानरों ने अपनी आंखें खोलीं, तो उनके सामने अनंत और अथाह समुद्र लहरें मार रहा था। परंतु जब अंगद ने समय की गणना की, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। गुफा में भटकने के कारण सुग्रीव द्वारा दी गई एक महीने की समय सीमा समाप्त हो चुकी थी!
युवराज अंगद निराशा से टूट गए। उन्होंने अपने साथियों से कहा, "वानर वीरों! हमने एक मास की अवधि पार कर ली है और सीता माता का कोई पता नहीं लगा। अच्छा है कि हम यहीं इसी समुद्र के किनारे 'प्रायोपवेशन' (बिना कुछ खाए-पिए अनशन करके प्राण त्यागना) करें।"
सभी वानर निराश होकर समुद्र तट पर बिछी हुई कुश (घास) पर बैठ गए और मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे। इसी दुख और विलाप के बीच, वानर आपस में श्रीराम की कथा और जटायु के महान बलिदान की चर्चा करने लगे। अंगद ने रोते हुए कहा, "देखो, एक वह महान गिद्ध जटायु था, जिसने राम के लिए अपने प्राण दे दिए, और एक हम हैं जो राम का काम किए बिना ही अभागे होकर मरने जा रहे हैं।"
तभी पास ही स्थित विंध्य पर्वत की एक विशाल कंदरा (गुफा) से एक अत्यंत विशालकाय और डरावना गिद्ध बाहर निकला। उसके शरीर पर पंख नहीं थे और वह बुढ़ापे से जर्जर था। वह गिद्ध वानरों को देखकर प्रसन्न हुआ और बोला, "वाह! विधाता ने बिना परिश्रम किए ही मेरा भोजन यहाँ भेज दिया है। मैं एक-एक करके इन वानरों को खाऊँगा।"
यह सुनकर वानर भयभीत हो गए, परंतु तभी उस गिद्ध के कानों में 'जटायु' का नाम पड़ा। जटायु का नाम सुनते ही वह गिद्ध तड़प उठा और उसने वानरों से पूछा, "अरे वानरों! तुम उस महान जटायु के बारे में क्या जानते हो? वह मेरा सगा छोटा भाई है। कृपा करके मुझे उसके बारे में बताओ।"
यह गिद्ध कोई और नहीं, बल्कि जटायु के बड़े भाई 'संपाती' थे। वानरों ने जब संपाती को जटायु के बलिदान और सीता हरण की पूरी कथा सुनाई, तो संपाती अपने छोटे भाई की मृत्यु का समाचार सुनकर फूट-फूट कर रोने लगे। उन्होंने वानरों से कहा कि वे उन्हें समुद्र तट पर ले चलें ताकि वे अपने भाई जटायु का तर्पण (जलदान) कर सकें।
जटायु का तर्पण करने के पश्चात, संपाती ने वानरों की निराशा देखी। संपाती ने कहा, "हे वानर वीरों! निराश मत होओ। मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। हम गिद्धों की दृष्टि अत्यंत दिव्य और दूर तक देखने वाली होती है। मेरे पास पंख नहीं हैं, अन्यथा मैं ही रावण का वध कर देता। परंतु मेरी दृष्टि मुझे सब कुछ दिखा रही है।"
संपाती ने अपनी अत्यंत तीक्ष्ण आंखों से उस अनंत समुद्र के पार देखा और वानरों को वह बहुप्रतीक्षित सूचना दी: "हे वानरों! मुझे दिख रहा है। यहाँ से ठीक सौ योजन (लगभग 800 मील) पार समुद्र के बीचों-बीच त्रिकूट पर्वत पर रावण की सोने की लंका बसी है। उसी लंका में अशोक वाटिका नाम का एक उपवन है। मुझे माता सीता वहीं दिखाई दे रही हैं। वे एक वृक्ष के नीचे अत्यंत उदास और मलिन अवस्था में बैठी हैं और राक्षसियां उन्हें घेरे हुए हैं। तुम में से जो भी इस सौ योजन के समुद्र को पार कर सकेगा, वही सीता तक पहुँच पाएगा।"
यह सूचना वानरों के लिए अंधकार में एक भयंकर बिजली की चमक के समान थी। सीता माता का पता तो चल गया था, परंतु अब उनके सामने एक ऐसा संकट खड़ा था जो असंभव प्रतीत हो रहा था—सौ योजन का यह भयंकर और गहरा समुद्र लांघकर लंका तक कौन जाएगा?
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भाग 1: सरयू तट की अयोध्या और राजा दशरथ की व्यथा
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