तेनालीरामा और यमराज का दूत — मृत्यु का डर और ठग का पर्दाफाश

विजयनगर में एक बार एक बहुत ही चतुर ठग आया। उसने पूरे काले रंग के भयानक कपड़े पहने हुए थे, माथे पर लाल रंग का बड़ा सा टीका लगाया था और हाथ में एक भारी गदा थी। वह शहर के अमीर व्यापारियों के पास जाता और अत्यंत डरावनी आवाज़ में कहता:
"मैं मृत्यु के देवता 'यमराज का दूत' हूँ! मेरे पास चित्रगुप्त का वह रजिस्टर है, जिसमें लोगों की मौत का समय लिखा होता है। तुम्हारा समय पूरा हो चुका है, कल रात तुम्हारी मृत्यु निश्चित है!"
जब अमीर व्यापारी घबराकर रोने लगते और अपनी जान की भीख मांगते, तो वह ठग कहता: "देखो, यमराज को सोने से बहुत प्रेम है। यदि तुम मुझे 10,000 सोने के सिक्के दान में दे दो, तो मैं यमलोक जाकर चित्रगुप्त की किताब में तुम्हारा नाम नीचे खिसका दूँगा, जिससे तुम्हारी उम्र 10 साल और बढ़ जाएगी!"
मृत्यु के डर से लोग अपनी तिजोरियां खोलकर उस ठग को सारा सोना दे देते थे। धीरे-धीरे उस 'यमदूत' का खौफ पूरे शहर में फैल गया।
तेनालीरामा का पर्दाफाश का प्लान: जब यह बात तेनालीरामा तक पहुँची, तो वे समझ गए कि मौत के नाम पर कोई नीच इंसान लोगों की कमज़ोरी का फायदा उठा रहा है। तेनालीरामा ने उस ठग को उसी की भाषा में सबक सिखाने की ठानी।
उन्होंने पता लगाया कि वह ठग शहर के बाहर एक पुरानी खंडहर हो चुकी सराय में रुकता है।
आधी रात के समय, जब वह ठग अपनी लूटी हुई दौलत को गिनकर खुश हो रहा था, अचानक उसके कमरे का दरवाज़ा भयंकर आवाज़ के साथ टूट कर गिरा।
कमरे के अंदर एक बहुत ही भयानक और विशालकाय आकृति घुसी। उस आकृति ने भैंसे का मुखौटा पहना हुआ था, उसके हाथों में जलती हुई मशालें थीं और वह पूरी तरह से काले रंग में रंगा हुआ था (यह वास्तव में तेनालीरामा द्वारा भेजा गया विजयनगर का सबसे तगड़ा पहलवान था)।
असली यमदूत का आगमन: उस भयानक पहलवान ने अत्यंत कड़क और गूंजती हुई आवाज़ में कहा: "अरे नीच इंसान! मैं यमलोक का 'असली सेनापति' हूँ। स्वयं यमराज ने मुझे भेजा है!"
ठग डर के मारे कांपने लगा। उसकी आवाज़ नहीं निकल रही थी। उसने घुटने टेक दिए।
पहलवान ने आगे कहा: "यमराज महाराज तुझसे बहुत क्रोधित हैं! तू धरती पर उनका नाम बदनाम कर रहा है और उनके नाम पर रिश्वत ले रहा है। यमराज ने कहा है कि ऐसे झूठे दूत को तुरंत गरम तेल के कड़ाहे में तल दिया जाए। चल मेरे साथ यमलोक!"
पहलवान ने उस ठग की गर्दन पकड़ कर उसे हवा में उठा लिया। ठग का दम घुटने लगा। उसने रोते और गिड़गिड़ाते हुए कहा: "मुझे माफ़ कर दो! मैं कोई यमदूत नहीं हूँ! मैं तो बस एक साधारण ठग हूँ। मुझे मत मारो, मैं सारा लूटा हुआ सोना वापस कर दूँगा!"
तभी पीछे से तेनालीरामा कमरे में दाखिल हुए। उन्होंने मुस्कुराते हुए पहलवान को रुकने का इशारा किया।
तेनालीरामा ने उस ठग से कहा: "अरे मूर्ख! जो इंसान अपनी 'मौत' के डर से इतना कांप रहा है, वह दूसरों को मौत का डर कैसे दिखा सकता है? मौत किसी भी सोने या रिश्वत से नहीं टलती।"
अगली सुबह उस ठग को रस्सियों से बांधकर महाराज के दरबार में पेश किया गया। जब शहर के लोगों ने देखा कि वह भयानक 'यमदूत' मौत के डर से कैसे गिड़गिड़ा रहा था, तो उनके मन से सारा अंधविश्वास दूर हो गया। महाराज ने उस ठग से सारा धन वापस लेकर लोगों को लौटाया और उसे कालकोठरी में डाल दिया।
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