उधार का गवाह — जब आम के पेड़ ने दी गवाही और सच आया सामने

विजयनगर में रामू और श्यामू नाम के दो दोस्त रहते थे। एक बार श्यामू को व्यापार में घाटा हुआ और उसे पैसों की सख्त ज़रूरत पड़ी। उसने रामू से 1,000 सोने के सिक्के उधार मांगे। रामू ने दोस्ती की खातिर उसे पैसे दे दिए।
यह लेन-देन गाँव के बाहर एक बहुत बड़े और पुराने 'आम के पेड़' के नीचे हुआ था। उस समय वहाँ उन दोनों के अलावा कोई और इंसान मौजूद नहीं था।
कुछ महीने बीत गए। जब रामू ने श्यामू से अपने पैसे वापस मांगे, तो श्यामू के मन में बेईमानी आ गई। उसने साफ मुकरते हुए कहा: "कौन से पैसे? मैंने तुमसे कभी कोई पैसा उधार नहीं लिया! तुम्हारे पास क्या सबूत है?"
रामू बहुत दुखी हुआ और रोता हुआ महाराज कृष्णदेवराय के दरबार में न्याय मांगने पहुँचा। श्यामू को भी दरबार में बुलाया गया।
बिना गवाह का मुकद्दमा: महाराज ने श्यामू से पूछा, तो श्यामू ने कहा: "महाराज, यह आदमी झूठ बोल रहा है। मैंने इससे कोई पैसे नहीं लिए। आप इससे पूछिए कि जब इसने मुझे पैसे दिए थे, तो क्या वहाँ कोई गवाह मौजूद था?"
रामू ने रोते हुए कहा: "नहीं हुज़ूर, वहाँ कोई इंसान नहीं था। हम दोनों गाँव के बाहर उस पुराने आम के पेड़ के नीचे खड़े थे।"
महाराज उलझन में पड़ गए। बिना किसी गवाह या लिखित दस्तावेज़ के वे रामू के पक्ष में फैसला कैसे सुना सकते थे? उन्होंने तेनालीरामा की ओर देखा।
तेनालीरामा की तरकीब: तेनालीरामा ने रामू से कहा: "रामू! तुम कहते हो कि वहाँ कोई नहीं था, परंतु वह 'आम का पेड़' तो वहीं था ना? तुम एक काम करो... अभी दौड़कर उस आम के पेड़ के पास जाओ और उसे विजयनगर के राजदरबार में गवाही देने के लिए बुला लाओ!"
पूरा दरबार यह सुनकर हैरान रह गया। कोई पेड़ कैसे चलकर गवाही देने आ सकता है? रामू भी चकरा गया, परंतु तेनालीरामा ने उसे आँख मारी और जाने का इशारा किया। रामू दरबार से चला गया।
तेनालीरामा ने दरबार की बाकी कार्यवाही शुरू कर दी। बेईमान श्यामू दरबार में आराम से खड़ा यह सोचकर मन ही मन हंस रहा था कि पेड़ तो कभी गवाही देने आ ही नहीं सकता, वह मुकद्दमा जीत गया है।
मनोवैज्ञानिक फंदा: आधा घंटा बीत गया। तेनालीरामा अचानक मुड़े और श्यामू से बिल्कुल सामान्य आवाज़ में पूछा: "श्यामू! रामू को गए हुए काफी देर हो गई है। क्या तुम्हें लगता है कि वह उस आम के पेड़ तक पहुँच गया होगा?"
श्यामू, जो अपनी जीत के घमंड में था, बिना सोचे-समझे तुरंत बोल पड़ा: "नहीं-नहीं मंत्री जी! वह आम का पेड़ तो यहाँ से बहुत दूर है। रामू को वहाँ तक पहुँचने में अभी कम से कम आधा घंटा और लगेगा!"
यह सुनते ही तेनालीरामा ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और महाराज की ओर देखकर कहा: "महाराज! हमें हमारा गवाह मिल गया है। श्यामू का यह जवाब ही सबसे बड़ी गवाही है!"
श्यामू घबरा गया। तेनालीरामा ने गंभीर होकर कहा: "श्यामू! जब तुम कह रहे थे कि तुमने रामू से पैसे नहीं लिए और तुम किसी लेन-देन को नहीं जानते... तो तुम्हें यह कैसे पता कि रामू 'किस' आम के पेड़ के पास गया है? और तुम्हें यह कैसे पता कि वह पेड़ यहाँ से कितनी दूर है? इसका मतलब है कि तुम उस पेड़ के नीचे गए थे और तुमने पैसे भी लिए थे!"
सच का पर्दाफाश: श्यामू का चेहरा पीला पड़ गया। वह अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फंस चुका था। वह राजा के सामने झूठ बोलते हुए रंगे हाथों पकड़ा गया।
श्यामू ने डर के मारे घुटने टेक दिए और अपना गुनाह कबूल कर लिया। महाराज कृष्णदेवराय तेनालीरामा की इस अद्भुत मनोवैज्ञानिक सूझबूझ पर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने श्यामू को पैसे लौटाने का आदेश दिया और साथ ही उसे झूठ बोलने के लिए कड़ी सज़ा भी दी।
बिना किसी इंसान गवाह के, तेनालीरामा ने अपराधी के दिमाग से ही सच उगलवा लिया था!
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