उड़ने वाली खटिया

शेख चिल्ली को उड़ने का बहुत शौक था। उसने परियों की कहानियों में 'उड़ने वाली कालीन' के बारे में सुन रखा था।
गर्मियों की रात थी। शेख चिल्ली अपने घर की एक ऊँची सी छत पर अपनी पुरानी 'चारपाई' पर लेटा हुआ था। रात का सन्नाटा था और ठंडी हवा चल रही थी।
शेख चिल्ली अपनी आदत के अनुसार खयाली पुलाव पकाने लगा। उसने सोचा: "ये उड़ने वाली कालीन तो बहुत महँगी आती होगी। क्यों न मैं अपनी इसी पुरानी चारपाई को उड़ने वाली चारपाई बना लूँ? अगर मैं इसके चारों पायों पर कुछ बड़े-बड़े पंख बाँध दूँ, तो यह भी हवा में उड़ने लगेगी!"
शेख चिल्ली अपनी जगह से उठा। वह घर के आँगन से एक बड़े से मरे हुए पक्षी (चील) के कुछ बड़े-बड़े पंख ले आया। उसने उन पंखों को धागे से चारपाई के चारों पायों पर कसकर बाँध दिया।
फिर शेख चिल्ली बहुत ही गर्व से अपनी उस चारपाई के बिल्कुल बीचों-बीच चौकड़ी मारकर बैठ गया। उसने अपनी आँखें बंद कीं और अपने दोनों हाथ हवा में फैला लिए।
सपनों की दुनिया शुरू हो गई। शेख चिल्ली ने मन ही मन कल्पना की कि उसकी चारपाई ज़मीन से ऊपर उठ रही है। वह हवा में उड़ रहा है! वह अपने गाँव के ऊपर से उड़ता हुआ जा रहा है, लोग नीचे से उसे हैरानी से देख रहे हैं और तालियाँ बजा रहे हैं।
शेख चिल्ली ने हवा में उड़ते हुए अपनी चारपाई को 'तेज़' करने के लिए अपने शरीर को आगे की तरफ ज़ोर से धक्का दिया— "चल मेरी खटिया, और तेज़ चल!"
सपनों में गोते लगाते हुए शेख चिल्ली भूल गया था कि वह हकीकत में एक खुली और ऊँची छत के बिल्कुल किनारे पर बैठा हुआ है।
जैसे ही उसने बंद आँखों से अपनी चारपाई को 'आगे बढ़ाने' के लिए छलाँग लगाई, वह चारपाई के साथ ही सीधे छत के किनारे से नीचे की तरफ गिर पड़ा!
नीचे घर के आँगन में गोबर और मिट्टी का एक बहुत बड़ा और 'मुलायम ढेर' लगा हुआ था।
'धड़ाम... गच्च!'
शेख चिल्ली अपनी उस "उड़ने वाली खटिया" के साथ सीधे उस गोबर के ढेर में औंधे मुँह जा गिरा।
गोबर की बदबू और ज़ोरदार झटके से शेख चिल्ली की 'हवाई यात्रा' का सपना टूट गया। वह गोबर में सना हुआ उठा। उसकी कमर में दर्द हो रहा था।
उसकी अम्मा शोर सुनकर बाहर आईं और शेख चिल्ली को गोबर में सना हुआ देखकर चिल्लाईं, "अरे बेवकूफ़! यह आधी रात को तू छत से नीचे क्यों कूद पड़ा?"
शेख चिल्ली ने गोबर पोंछते हुए बहुत ही उदास मन से कहा, "अम्मा! मैं तो अपनी उड़ने वाली खटिया पर आसमान की सैर कर रहा था। लेकिन लगता है कि मेरी खटिया के पंखों का 'इंजन' खराब हो गया था, इसलिए हम सीधा आकर यहाँ क्रैश हो गए! अगली बार मैं और बड़े पंख लगाऊँगा!"
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